वर्ष 2003 में नई दिल्ली स्थित देश के शीर्ष सुरक्षा कार्यालय परिसर में हुए एक अत्यंत दर्दनाक लिफ्ट हादसे के मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने भारत की खुफिया एजेंसी अनुसंधान एवं विश्लेषण विंग (RAW) के तत्कालीन निदेशक विपिन हांडा के परिजनों को 3.01 करोड़ रुपये से अधिक का कुल मुआवजा प्रदान करने के राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के आदेश को पूरी तरह से बरकरार रखा है। सर्वोच्च न्यायालय में जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय पीठ ने लिफ्ट निर्माण एवं नियमित देखरेख से जुड़ी जानी-मानी बहुराष्ट्रीय कंपनी ओटिस एलिवेटर कंपनी (इंडिया) लिमिटेड की ओर से दाखिल अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने सुनवाई के दौरान अत्यंत कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कहा कि किसी भी सार्वजनिक या निजी इमारत में लिफ्ट की सुरक्षा व्यवस्था एक मूलभूत गारंटी होती है और रखरखाव करने वाली एजेंसियों को इसके प्रति अत्यंत सतर्क रहना चाहिए।
2003 के लोधी रोड लिफ्ट हादसे का पूरा घटनाक्रम
यह दुखद मामला 20 मार्च 2003 का है, जब 46 वर्षीय वरिष्ठ अधिकारी विपिन हांडा देश की प्रतिष्ठित खुफिया संस्था रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) के नई दिल्ली में लोधी रोड स्थित मुख्यालय में एक महत्वपूर्ण आधिकारिक बैठक समाप्त करके बाहर आ रहे थे। बैठक खत्म होने के बाद विपिन हांडा अपने 12 अन्य साथी अधिकारियों के साथ परिसर की लिफ्ट में सवार हुए। लिफ्ट के चलने के कुछ ही क्षणों बाद अचानक उसमें गंभीर तकनीकी खराबी आ गई और वह सातवीं और छठी मंजिल के बीच अचानक ठप हो गई। लिफ्ट के रुकते ही अंदर फंसे अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए तुरंत आपातकालीन बचाव अभियान शुरू किया गया। बचाव दल ने विपिन हांडा से ठीक पहले एक अन्य अधिकारी को तो बाहर निकाल लिया, लेकिन विपिन हांडा को निकाले जाने से पहले ही हादसा घटित हो गया। बाकी अधिकारियों को बाद में तब सुरक्षित बाहर निकाला जा सका जब लिफ्ट नीचे की ओर गिरकर आखिरकार छठी मंजिल पर जाकर रुकी।
तकनीकी जांच समिति का निष्कर्ष और जानलेवा इंसानी चूक
हादसे के असली कारणों की पड़ताल करने के लिए गठित एक विशेष तकनीकी जांच समिति ने अपनी गहन जांच रिपोर्ट सौंपी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि शुरुआती चरण में बिजली के वोल्टेज में अचानक आए उतार-चढ़ाव की वजह से लिफ्ट मंजिलों के बीच में जाकर अटक गई थी। हालांकि हादसे में हुई जनहानि की मुख्य वजह लिफ्ट का रुकना नहीं, बल्कि उसके बाद की गई गंभीर लापरवाही थी। रिपोर्ट के अनुसार जब लिफ्ट में फंसे लोगों को निकालने का प्रयास चल रहा था, उसी दौरान कोई अज्ञात व्यक्ति इमारत की 11वीं मंजिल पर बने मशीन रूम के भीतर दाखिल हो गया। उस व्यक्ति ने वहां उपलब्ध विशेष ब्रेक रिलीज की (चाबी) का इस्तेमाल करते हुए लिफ्ट के मुख्य मैकेनिकल ब्रेक खोल दिए। ब्रेक हटते ही लिफ्ट बिना किसी नियंत्रण के तेजी से नीचे की ओर गिरते हुए हादसे का शिकार हो गई। उपभोक्ता आयोग ने अपने निष्कर्ष में पाया कि ब्रेक रिलीज की से ब्रेक का खोला जाना ही इस हादसे का एकमात्र मुख्य कारण था और यह एक निर्विवाद मानवीय भूल थी।
उपभोक्ता आयोग का फैसला और मुआवजे का बंटवारा
इस हादसे के बाद वर्ष 2005 में दिवंगत अधिकारी विपिन हांडा की पत्नी रश्मि हांडा और उनके दो बच्चों सृष्टि तथा क्षितिज ने इंसाफ की आस में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के समक्ष अपनी याचिका दाखिल की थी। मामले की लंबी कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों की जांच के पश्चात आयोग ने सेवा में गंभीर स्तर की कमी पाए जाने पर पीड़ित परिवार को 3.01 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा देने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही आयोग ने हादसे के लिए उत्तरदायी पक्षों के बीच मुआवजे की राशि का बंटवारा भी तय किया था। इसमें लिफ्ट का नियमित रखरखाव करने वाली ओटिस एलिवेटर कंपनी पर 70 प्रतिशत, निर्माण व इंफ्रास्ट्रक्चर की देखरेख करने वाली मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज (MES) पर 25 प्रतिशत और स्वयं RAW पर 5 प्रतिशत की वित्तीय जिम्मेदारी तय की गई थी।
ओटिस की लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC द्वारा तय किए गए मुआवजे के इस बंटवारे को पूर्णतः न्यायसंगत और उचित ठहराया। पीठ ने अपने फैसले में कहा कि जिम्मेदारी का यह विभाजन प्रत्येक संबंधित पक्ष की जानकारी, उपकरण पर नियंत्रण और प्रशासनिक दायित्व के वास्तविक स्तर को पूरी तरह सही ढंग से प्रदर्शित करता है। लिफ्ट निर्माता व रखरखाव कंपनी ओटिस को फटकार लगाते हुए अदालत ने कहा कि जो पक्ष किसी ऐसी जटिल मशीनरी के पूरे रखरखाव की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेता है, उसका मशीन का उपयोग करने वाले आम लोगों के प्रति बहुत अधिक सावधानी बरतने का कानूनी दायित्व होता है। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि ओटिस उस तकनीकी समस्या से भली-भांति वाकिफ थी जिसके कारण यह दुर्घटना हुई, क्योंकि कंपनी ने खुद ही पूर्व में इस खराबी के निवारण का सुझाव दिया था। अदालत ने टिप्पणी की कि समस्या का समाधान खुद प्रस्तावित करने के बाद भी यह सुनिश्चित न करना कि वह समाधान वास्तव में लागू हुआ है या नहीं, या समाधान लागू होने तक लिफ्ट को सुरक्षित बनाने के वैकल्पिक उपाय न करना, ओटिस की ओर से सेवा में गंभीर कमी को साबित करता है।



















