उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसा मसूरी शहर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के कई यादगार पलों को खुद में समेटे हुए है। आजादी के संघर्ष के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के इस पर्वतीय स्थल के दौरे केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं थे, बल्कि इस शांत परिवेश से उनका एक गहरा दिली रिश्ता भी जुड़ा था। इतिहास के पन्नों में बापू के मसूरी प्रवास को बड़े आदर के साथ याद किया जाता है, जिसने स्थानीय जनमानस और सामाजिक सुधारों पर गहरी छाप छोड़ी।
साल 1929 में मसूरी का पहला ऐतिहासिक दौरा
देहरादून के शोधकर्ता रविंद्र सिंह गुंसाई के अनुसार, महात्मा गांधी ने पहली बार अक्टूबर 1929 में मसूरी की यात्रा की थी। यह सफर दरअसल देश भर में जनचेतना फैलाने और आजादी के आंदोलन को धार देने की उनकी व्यापक योजना का अहम हिस्सा था। पहाड़ों की रानी मसूरी में कदम रखने से पहले बापू देहरादून रुके थे। वहां 16 अक्टूबर 1929 को उन्होंने तिलक रोड पर स्थित श्रद्धानंद अबला आश्रम का शिलान्यास किया। इसके अगले दिन यानी 17 अक्टूबर को उन्होंने कन्या गुरुकुल का जायजा लिया और राजपुर पहुंचकर केशव देव शास्त्री की याद में एक पौधा भी लगाया था।
हैप्पी वैली का बिड़ला हाउस और प्रार्थना सभाएं
गांधीजी 17 अक्टूबर 1929 को मसूरी पहुंचे और उन्होंने हैप्पी वैली में मौजूद बिड़ला हाउस को अपना ठिकाना बनाया। उनके आगमन की खबर मिलते ही समाज के विभिन्न तबकों के लोग उनके विचारों को जानने और उनसे चर्चा करने के लिए उमड़ पड़े। शुरुआत में बापू की दैनिक प्रार्थना सभाएं हैप्पी वैली में ही रखी जाती थीं। हालांकि, जैसे-जैसे लोगों की तादाद बढ़ने लगी और आम नागरिकों को असुविधा महसूस होने लगी, वैसे ही व्यवस्था को देखते हुए इन सभाओं को पिक्चर पैलेस के पास स्थित सिल्वर्टन मैदान में स्थानांतरित कर दिया गया था।
मजदूरों की पीड़ा और सामाजिक सुधारों की आवाज
अपने पहले प्रवास के दौरान 18 अक्टूबर को बापू ने यूरोपीय नगर पार्षदों की एक बैठक में भाग लिया। इस संबोधन में उन्होंने पर्वतीय नगर में दिन-रात कड़ी मशक्कत करने वाले लाचार कुलियों और श्रमिक वर्ग की बदहाली का मसला उठाया। गांधीजी ने जोर देकर कहा कि इन मेहनतकश लोगों के साथ मानवीय दृष्टिकोण अपनाना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही उन्होंने यूरोपीय महिलाओं व बालिकाओं की एक सभा में स्वदेशी खादी अपनाने और नशाबंदी जैसे गंभीर विषयों पर विस्तार से अपने विचार रखे।
रविंद्र सिंह बताते हैं कि गांधीजी ने सामाजिक बुराइयों पर भी सीधा प्रहार किया। 24 अक्टूबर को आयोजित एक विशाल जनसभा में उन्होंने धार्मिक स्थलों पर तथाकथित अंत्यजों के प्रवेश पर लगी पाबंदियों का पुरजोर विरोध किया। उनका स्पष्ट मत था कि पूजा स्थल और ईश्वर के मंदिर समाज के प्रत्येक वर्ग तथा सभी हिंदुओं के लिए पूरी तरह खुले होने चाहिए। बापू 24 अक्टूबर तक मसूरी में रुके और 25 अक्टूबर को सहारनपुर रवाना हो गए।
कस्तूरबा के निधन के बाद 1946 में शांति की तलाश
साल 1944 में पत्नी कस्तूरबा गांधी के देहांत ने बापू को भीतर तक झकझोर दिया था। इस गहरे व्यक्तिगत आघात से उबरने और मानसिक शांति की खोज में वे करीब दो साल बाद, 28 मई 1946 को एक बार फिर मसूरी पहुंचे। इस दूसरे दौरे के दौरान वे 8 जून तक हैप्पी वैली में बिड़ला परिवार के 'हर्मिटेज' में ठहरे। इस प्राकृतिक शांति के बीच रहकर उन्होंने खुद को संभाला।
वर्ष 1946 के इस प्रवास में भी गांधीजी ने रोजमर्रा की प्रार्थना सभाओं का सिलसिला जारी रखा और स्थानीय नागरिकों से सतत संवाद बनाए रखा। इस दौरान उन्होंने फिर से वंचित तबके, श्रमिकों, कुलियों के जीवन स्तर को सुधारने और खादी के विस्तार पर चर्चाएं कीं। इतिहासकार और मसूरी के निवासी आज भी बापू के इन दोनों यात्राओं को एक प्रेरणादायी धरोहर के रूप में याद करते हैं।
























