सार्वजनिक स्थलों, कॉलोनियों और इंटरनेट के मंचों पर इन दिनों कुत्तों को लेकर निरंतर टकराव की स्थिति बनी हुई है। रिहायशी बस्तियों में घूमने वाले आवारा श्वानों को खाना खिलाने, उनके अधिकारों की रक्षा करने और उनकी देखभाल करने वाले पशु प्रेमी एक पाले में खड़े दिखाई देते हैं। ठीक इसके सामने वे नागरिक खड़े हैं जो सुरक्षा, रास्तों पर गंदगी और बच्चों व बुजुर्गों पर होने वाले हमलों को लेकर लगातार चिंता जता रहे हैं। उनका सीधा सवाल है कि सार्वजनिक पार्कों और गलियों में बेरोकटोक घूमने वाले इन जीवों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं, खौफ और काटने की घटनाओं की जवाबदेही किसकी है। यह विवाद अब मात्र सोशल मीडिया पर चलने वाली तीखी प्रतिक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की शीर्ष अदालतों, स्थानीय नगर निगमों और मोहल्लों की सड़कों पर होने वाले रोजमर्रा के झगड़ों में बदल चुका है।
देश की राजधानी दिल्ली समेत कई महानगरों और छोटे कस्बों में यह टकराव आए दिन हिंसक झड़प और कानूनी मुकदमों का कारण बन रहा है। एक तरफ इंसानी जान और नागरिकों की सामान्य दिनचर्या की सुरक्षा है, तो दूसरी तरफ बेजुबान जीवों के प्रति मानवीय संवेदना और सह-अस्तित्व की पुरानी परंपरा। इस जटिल सामाजिक समस्या को केवल दो गुटों के आपसी मतभेद के रूप में नहीं समझा जा सकता। इसके लिए मनुष्य और श्वान के हजारों वर्षों पुराने साझे इतिहास, उनकी विविध नस्लों की कार्यक्षमता और समाज में उनके स्थान को गहराई से समझना जरूरी है। वरिष्ठ लेखक, पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार पुष्परंजन की हालिया शोधपरक कृति 'मेरा मुन्नू' इसी विस्तृत परिप्रेक्ष्य को सामने लाती है, जो महज पशु प्रेम की दास्तान न होकर दोनों प्रजातियों के भावनात्मक और ऐतिहासिक विकास को दर्ज करती है।
मानव सभ्यता और श्वान का सह-अस्तित्व
इंसान और कुत्ते का आपसी बंधन दुनिया के सबसे पुराने और अनूठे संबंधों में गिना जाता है। यह रिश्ता केवल एक मालिक और पालतू जीव के बीच का व्यावसायिक समीकरण नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों के लिए उनका घरेलू श्वान घर का एक अभिन्न सदस्य, सुख-दुख का सच्चा साथी और जीवन के अकेलेपन को दूर करने वाला सबसे विश्वसनीय सहारा बन जाता है। इस जीव के चले जाने के बाद घरों में जो खालीपन पैदा होता है, उसे किसी अन्य चीज से भरना संभव नहीं होता। सभ्यता के विकास क्रम में यह पड़ताल बेहद दिलचस्प है कि कब और किन विशेष परिस्थितियों में एक जंगली शिकारी जीव मानव बस्तियों के नजदीक आया, उसने इंसानों की सुरक्षा और सहयोग का जिम्मा संभाला और समय के साथ दोनों के बीच अटूट विश्वास की नींव पड़ी।
कुत्तों की दुनिया में नस्लों की विविधता उनकी शारीरिक और मानसिक विशेषताओं को दर्शाती है। जर्मन शेफर्ड, लैब्राडोर, गोल्डन रिट्रीवर, बीगल और बुलडॉग जैसी जानी-मानी विदेशी नस्लें अपनी खास खूबियों के कारण पूरी दुनिया में पहचानी जाती हैं। जर्मन शेफर्ड और बुलडॉग जैसी नस्लें अपनी सजगता, शारीरिक ताकत और चौकसी के कारण पुलिस और सैन्य बलों के सुरक्षा कार्यों में तैनात की जाती हैं। वहीं लैब्राडोर और बीगल अपनी अद्भुत घ्राण शक्ति (सूंघने की क्षमता) के चलते मादक पदार्थों, विस्फोटकों और आपदाओं में दबे जीवित व्यक्तियों की तलाश के खोजी अभियानों में अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। कई अन्य नस्लें अपने शांत, धैर्यवान और बच्चों के साथ घुल-मिल जाने वाले मिलनसार स्वभाव के लिए पारिवारिक घरों की पसंद बनती हैं।
विदेशी नस्लों के ग्लैमर के बीच भारत की प्राचीन देशी नस्ल, जिसे इंडियन पैरियाह के नाम से जाना जाता है, विशेष महत्व रखती है। ये देशी श्वान सदियों से भारतीय उपमहाद्वीप की कठोर जलवायु, मौसमी बदलावों और स्थानीय परिवेश के अनुरूप प्राकृतिक रूप से विकसित हुए हैं। इनका रोग प्रतिरोधक तंत्र बेहद मजबूत होता है, इनकी देखरेख में न्यूनतम संसाधन लगते हैं और विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहने की इनकी जीवटता व अनुकूलन क्षमता किसी भी विदेशी नस्ल की तुलना में कहीं अधिक टिकाऊ साबित होती है।
गाइड डॉग: सेवा, विश्वास और सामाजिक उपयोगिता
मनुष्य और श्वान के परस्पर सहयोग का सबसे उत्कृष्ट और प्रेरक रूप दृष्टिबाधित व्यक्तियों की सहायता करने वाले गाइड डॉग्स के रूप में देखने को मिलता है। प्रथम विश्वयुद्ध के भयानक दौर के बाद जब बड़ी संख्या में सैनिक अपनी आंखों की रोशनी गंवा बैठे, तब जर्मनी में दृष्टिबाधित सैनिकों के पुनर्वास और स्वतंत्र जीवन के लिए कुत्तों को विशेष रूप से प्रशिक्षित करने की औपचारिक योजना तैयार की गई। इसी कड़ी में वर्ष 1916 में जर्मनी के ओल्डेनबर्ग शहर में दृष्टिबाधित लोगों के लिए दुनिया का पहला गाइड डॉग स्कूल स्थापित किया गया था।
इस ऐतिहासिक पहल के बाद इन प्रशिक्षित श्वानों ने दृष्टिबाधित नागरिकों को व्यस्त सड़कों, घुमावदार रास्तों, गड्ढों और भौतिक बाधाओं से पूरी तरह सुरक्षित निकालने का अद्भुत कार्य शुरू किया। आज विश्व के अनेक विकसित देशों में यह व्यवस्था दृष्टिबाधित इंसानों को बिना किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर रहे स्वाभिमान और पूर्ण आजादी के साथ घूमने-फिरने की ताकत देती है। यह उदाहरण दिखाता है कि जब इंसान और पशु के बीच विश्वास को वैज्ञानिक प्रशिक्षण और संवेदनशील दृष्टि दी जाती है, तो वह समाज की सबसे बड़ी शारीरिक बाधाओं को भी पार कर सकता है।
1926 में आवारा और हिंसक श्वानों पर महात्मा गांधी का विचार
श्वान विवाद के विमर्श में सबसे विचारोत्तेजक और अप्रत्याशित पहलू महात्मा गांधी का वह दृष्टिकोण है, जो उन्होंने वर्ष 1926 में प्रकट किया था। महात्मा गांधी को पूरे विश्व में सत्य, अहिंसा, करुणा और समस्त जीवों के प्रति दया का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में आज के माहौल में यह तथ्य कई लोगों को स्तब्ध कर सकता है कि बापू ने आवारा और असाध्य रूप से हिंसक अथवा पागल हो चुके कुत्तों को समाप्त करने का सैद्धांतिक समर्थन किया था।
वर्ष 1926 में इस विषय पर अपनी राय रखते हुए गांधीजी ने स्पष्ट किया था कि यदि कोई कुत्ता समाज और आम जनता के लिए अत्यंत गंभीर व जानलेवा खतरा बन चुका हो, और उसे नियंत्रित करने, बांधने, अलग रखने या उसके रोग का उपचार करने का कोई भी व्यावहारिक रास्ता शेष न बचा हो, तो ऐसी स्थिति में उस पशु की अंतहीन पीड़ा और समाज पर मंडराते खतरे को देखते हुए उसका वध करना अनुचित नहीं है। गांधीजी के चिंतन में अहिंसा का तात्पर्य केवल हर परिस्थिति में किसी देह को किसी भी हाल में जीवित बनाए रखना नहीं था। उनके अनुसार अहिंसा में व्यापक जनहित, सामाजिक जिम्मेदारी और उस असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाना भी शामिल था, जिसका कोई तार्किक समाधान उपलब्ध न हो। गांधीजी का यह ऐतिहासिक रुख आज के उस मूल सवाल का जवाब तलाशने में महत्वपूर्ण संदर्भ देता है कि बेजुबान जीवों के प्रति दया भाव और आम नागरिकों की सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन की रेखा कहां खींची जानी चाहिए।
पशु क्रूरता का स्याह पहलू और मौजूदा भारतीय परिप्रेक्ष्य
मानव इतिहास में कुत्तों के साथ इंसान का व्यवहार हमेशा करुणा और आदर का नहीं रहा है। कई स्थानों पर अपने ही साथी जीव के प्रति मनुष्य की घोर संवेदनहीनता और क्रूरता सामने आती रही है। इसका एक वीभत्स और संगठित रूप पड़ोसी देश पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के कुछ ग्रामीण इलाकों में होने वाली कुत्तों की खूनी लड़ाइयों के रूप में देखा जाता है। वहां बुली कुट्टा जैसी बेहद भारी-भरकम, आक्रामक और ताकतवर नस्लों को अखाड़ों में एक-दूसरे के खिलाफ जानलेवा मुकाबलों में उतारा जाता है। इन मुकाबलों में भारी रकम का सट्टा लगाया जाता है और समाज के सामंती तबके में इसे झूठी मर्दानगी व पारिवारिक प्रतिष्ठा के प्रदर्शन से जोड़ दिया जाता है। कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद लचर पुलिस व्यवस्था और निगरानी की कमी के चलते यह हिंसक खेल बेरोकटोक जारी रहता है। जिस जीव को वफादारी का प्रतीक माना गया, उसे केवल कुछ पलों के तमाशे और अवैध कमाई के लिए लहूलुहान कर देना मानवीय संवेदना के पतन को दर्शाता है।
भारत में वर्तमान समय में छिड़ा विवाद भी इसी दोतरफा यथार्थ के बीच संतुलन साधने की मांग करता है। नगरों में आवारा कुत्तों द्वारा बच्चों, कामकाजी महिलाओं, रात में चलने वाले राहगीरों और बुजुर्गों पर जानलेवा हमले, रेबीज का खतरा, सार्वजनिक पार्कों में गंदगी और लोगों में बढ़ता भय कोई काल्पनिक शिकायतें नहीं हैं। ये वास्तविक नागरिक समस्याएं हैं जिन्हें महज कुछ पशु विरोधियों की संकीर्ण सोच कहकर नकारा नहीं जा सकता। वहीं दूसरी तरफ, इन जीवों को क्रूरतापूर्वक मारना, उन्हें भूखा रखना या उनके प्रति हिंसा भड़काना भी किसी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती। समाधान अंध-विरोध या अंधी वकालत में नहीं, बल्कि कड़े वैज्ञानिक प्रबंधन, व्यवस्थित नसबंदी, टीकाकरण और गांधीजी द्वारा रेखांकित व्यावहारिक करुणा के संतुलित रास्ते पर चलने में ही निहित है।



















