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पश्चिम बंगाल के प्रस्तावित एंटी गुंडा कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं, केंद्र की कानूनी आपत्तियों के बाद पुनर्विचार के लिए लौटाया गया बिलभारत
25 सित॰ 2026, 10:35 am (2 मिनट पहले)· 0

पश्चिम बंगाल के प्रस्तावित एंटी गुंडा कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं, केंद्र की कानूनी आपत्तियों के बाद पुनर्विचार के लिए लौटाया गया बिल

पश्चिम बंगाल सरकार के वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल को राष्ट्रपति ने पुनर्विचार के लिए लौटा दिया है। केंद्र ने NDPS मामलों को गुंडा की परिभाषा में शामिल करने और समानांतर हिरासत व्यवस्था बनने पर आपत्ति जताई है।

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से राज्य में असामाजिक गतिविधियों पर नकेल कसने के उद्देश्य से तैयार किए गए एंटी गुंडा कानून को फिलहाल नई दिल्ली से हरी झंडी नहीं मिल सकी है। राज्य प्रशासन जिस प्रस्तावित कानून को जल्द अमलीजामा पहनाने की तैयारी में जुटा था, उसे राष्ट्रपति की औपचारिक स्वीकृति नहीं मिल पाई है। राष्ट्रपति भवन के स्तर से इस विधेयक को पुनर्विचार के लिए राज्य को वापस भेज दिया गया है। इस पूरे गतिरोध के केंद्र में कुछ ऐसे कानूनी बिंदु हैं, जिन्हें लेकर केंद्र सरकार ने गंभीर सवाल उठाए हैं। मुख्य विवाद नशीले पदार्थों से संबंधित मौजूदा केंद्रीय कानूनों और राज्य के नए मसौदे के बीच अधिकार क्षेत्र के संभावित टकराव को लेकर खड़ा हुआ है। केंद्र का रुख है कि स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ यानी NDPS कानून के दायरे में आने वाले अपराधों को स्थानीय विधेयक में 'गुंडा' की श्रेणी में रखने से एक समानांतर निरोधक व्यवस्था तैयार हो जाएगी, जो मौजूदा कानूनी ढांचे के विपरीत हो सकती है।

संविधान के अनुच्छेद 254 और केंद्रीय कानूनों से टकराव की स्थिति

इस पूरे मामले की जड़ें संविधान के अनुच्छेद 254 से जुड़ी हैं, जो संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए गए कानूनों के बीच टकराव की स्थिति को स्पष्ट करता है। केंद्र की दलील है कि यदि किसी समवर्ती विषय पर पहले से संसद का बनाया कानून प्रभावी है और राज्य उसी मुद्दे पर अपनी समानांतर व्यवस्था खड़ी करता है, तो संवैधानिक विसंगति उत्पन्न होती है। इसी विधिक जटिलता के चलते राष्ट्रपति स्तर पर विधेयक को मंजूरी देने के बजाय वापस भेजना उचित समझा गया। राज्य प्रशासन से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस घटनाक्रम को एक झटका माना है, लेकिन उनका कहना है कि प्रक्रिया पूरी तरह रुकी नहीं है। यदि राज्य विधानसभा में आवश्यक संशोधनों को शामिल कर लिया जाए, तो इस विधेयक को नए सिरे से मंजूरी के लिए केंद्र के पास भेजा जा सकता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि इस बहुचर्चित कानून का भविष्य अब दोबारा राज्य विधानसभा के निर्णय पर निर्भर करेगा।

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जून 2026 में पेश हुआ था विधेयक और क्या थीं मुख्य धाराएं

पश्चिम बंगाल सरकार ने जून 2026 के दौरान विधानसभा के पटल पर 'वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल' रखा था। इसका घोषित लक्ष्य राज्य की सीमाओं के भीतर कानून-व्यवस्था को मजबूत करना और असामाजिक तत्वों पर कड़ा प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करना था। विधेयक के ड्राफ्ट में विस्तार से परिभाषित किया गया था कि किन कृत्यों को 'असामाजिक गतिविधि' का हिस्सा माना जाएगा और किन व्यक्तियों को कानूनी रूप से 'गुंडा' के तौर पर चिह्नित किया जा सकता है। इसके अलावा ऐसे तत्वों की गतिविधियों पर पहले से ही रोक लगाने के लिए निवारक हिरासत और प्रतिबंधात्मक कार्रवाइयों के कई कड़े प्रावधान इस मसौदे का हिस्सा बनाए गए थे।

NDPS कानून और निवारक हिरासत को लेकर केंद्र के ऐतराज

केंद्र सरकार की प्राथमिक आपत्ति सीधे तौर पर नशीले पदार्थों और मादक द्रव्यों की रोकथाम से जुड़ी व्यवस्थाओं पर टिकी है। प्रस्तावित कानून के प्रावधानों में ऐसे व्यक्तियों को भी 'गुंडा' की कानूनी परिभाषा में शामिल कर लिया गया था, जो NDPS अधिनियम 1985 के तहत किसी अपराध को अंजाम देते हैं अथवा उसे अंजाम देने का प्रयास करते हैं। इतना ही नहीं, ऐसे कृत्यों में वित्तीय मदद पहुंचाने, बढ़ावा देने या किसी भी प्रकार का सहयोग देने वालों को भी इसी श्रेणी में रखा गया था।

केंद्र का तर्क है कि भारत में नशीले पदार्थों की अवैध तस्करी रोकने और उससे जुड़े अपराधियों की निवारक हिरासत के लिए संसद पहले ही PTINDPS अधिनियम 1988 के रूप में एक विशेष केंद्रीय कानून लागू कर चुकी है। ऐसे में राज्य के नए विधेयक द्वारा उसी विषय पर अलग से निवारक कार्रवाई की शक्ति तय करने से दोहरे कानूनी ढांचे और अनावश्यक टकराव की नौबत आएगी। संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत उत्पन्न होने वाली इसी विधिक समस्या का हवाला देते हुए केंद्र ने सुझाव दिया है कि विधेयक की धारा 2(d)(iii)(B) से NDPS अधिनियम 1985 के संदर्भों को पूरी तरह से हटा दिया जाए, ताकि यह केंद्रीय वैधानिक प्रावधानों के सीधे विरोध में न आए।

जिले में प्रवेश पर पाबंदी और अधिकारियों को व्यापक अधिकार

प्रस्तावित कानून में सिर्फ असामाजिक तत्वों की पहचान तय करने तक ही सीमित व्यवस्था नहीं थी, बल्कि इसमें कई कठोर प्रशासनिक अधिकार भी प्रस्तावित किए गए थे। विधेयक के तहत सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारियों को यह शक्ति देने का प्रावधान रखा गया था कि वे किसी व्यक्ति को किसी खास इलाके या पूरे जिले की सीमा में प्रवेश करने से रोक सकें। यह अधिकार जिलाधिकारी, पुलिस आयुक्त अथवा राज्य सरकार द्वारा अधिकृत डीआईजी स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों को सौंपने की बात कही गई थी।

प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी अधिकृत अधिकारी को यह पुख्ता आशंका हो कि संबंधित व्यक्ति असामाजिक गतिविधियों में लिप्त है या आगे चलकर गड़बड़ी फैला सकता है, तो उसे उस क्षेत्र से बाहर चले जाने का आदेश दिया जा सकता है। इसके साथ ही ऐसे व्यक्ति को एक साल तक उस निश्चित इलाके या जिले में वापस लौटने से प्रतिबंधित किया जा सकता है। इतना ही नहीं, कानून व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से संबंधित व्यक्ति को अपनी दैनिक गतिविधियों और आवाजाही की नियमित जानकारी प्रशासन को देने का निर्देश देने का अधिकार भी अधिकारियों के पास होता।

विपक्ष की आपत्तियां और सरकारी आश्वासन

विधानसभा में पेश होने के समय से ही इस विधेयक को राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था। विपक्षी दलों ने विशेष रूप से निवारक हिरासत और जिले से बाहर निकालने के प्रावधानों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। विपक्ष का आरोप था कि इतने व्यापक अधिकार मिलने से प्रशासनिक तंत्र नागरिक अधिकारों का हनन कर सकता है। इन तमाम आलोचनाओं के जवाब में राज्य सरकार ने भरोसा दिलाया था कि इस कानून का इस्तेमाल किसी भी सूरत में राजनीतिक बदले की भावना से नहीं किया जाएगा। सरकार ने स्पष्ट किया था कि प्रशासन पूरी तरह विधिक सीमाओं में रहकर काम करेगा और इसके दुरुपयोग की कोई गुंजाइश नहीं रहने दी जाएगी।

कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिकाएं और अदालती फैसला

यह कानूनी विवाद कलकत्ता हाईकोर्ट के दरवाजे तक भी पहुंचा था, जहां प्रस्तावित कानून की वैधानिकता को चुनौती देते हुए तीन अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं। इन याचिकाओं पर 6 अगस्त को न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी चटर्जी की खंडपीठ ने अपना फैसला सुनाते हुए सभी तीनों याचिकाओं को खारिज कर दिया था। अदालत का स्पष्ट मत था कि ये याचिकाएं समय से पहले दाखिल की गई हैं, क्योंकि उस समय तक इस मसौदे को न तो राष्ट्रपति की आवश्यक मंजूरी मिली थी और न ही यह लागू कानून का रूप ले पाया था।

खंडपीठ ने अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया था कि यदि भविष्य में राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाती है और विधेयक औपचारिक रूप से प्रभावी कानून बन जाता है, तो याचिकाकर्ता इसकी संवैधानिक वैधता को फिर से अदालत में चुनौती दे सकते हैं। हाईकोर्ट की इस टिप्पणी ने भी यह साफ किया था कि संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हुए बिना यह केवल एक प्रस्तावित मसौदा ही है।

संशोधन का विकल्प और कानून लागू होने में संभावित देरी

राष्ट्रपति स्तर से विधेयक लौटाए जाने के बाद अब आगे का रास्ता राज्य सरकार की विधिक रणनीति पर टिका है। राज्य प्रशासन के अधिकारियों के अनुसार, यदि सरकार केंद्र की आपत्तियों को स्वीकार करते हुए NDPS से जुड़े विवादित हिस्सों को हटा देती है, तो संशोधित मसौदे को दोबारा विधानसभा में पेश किया जा सकता है। सदन से पारित होने के बाद इसे पुनः राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। हालांकि इस पूरी कवायद के कारण कानून के लागू होने में लंबा विलंब होना तय है, क्योंकि संशोधन की विधायी प्रक्रिया और दोबारा केंद्रीय समीक्षा में पर्याप्त समय लगेगा।

सवाल-जवाब

पश्चिम बंगाल के एंटी गुंडा बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी क्यों नहीं मिली?
केंद्र सरकार ने विधेयक में एनडीपीएस कानून से जुड़े अपराधों को शामिल करने पर आपत्ति जताई है, क्योंकि इससे मौजूदा केंद्रीय कानून के साथ संवैधानिक टकराव पैदा हो रहा था।
विधेयक में किन अधिकारियों को संदिग्धों को जिले से बाहर करने का अधिकार दिया गया था?
प्रस्तावित कानून में जिलाधिकारी, पुलिस आयुक्त और अधिकृत डीआईजी स्तर के अधिकारियों को संदिग्धों को एक साल तक जिले से बाहर रखने का अधिकार देने की बात थी।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस विधेयक के खिलाफ दायर याचिकाओं पर क्या फैसला दिया था?
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिकाओं को समय से पहले दायर मानते हुए खारिज कर दिया था, क्योंकि बिल को उस समय तक राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली थी।
अब राज्य सरकार के पास आगे क्या कानूनी विकल्प मौजूद है?
राज्य सरकार विधेयक की धारा 2(d)(iii)(B) से विवादित प्रावधानों में संशोधन कर इसे दोबारा विधानसभा में पारित करा सकती है और फिर राष्ट्रपति के पास भेज सकती है।
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