हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों की मजबूती को लेकर नई दिल्ली में तीन दिवसीय इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग का आयोजन हुआ। भारतीय नौसेना की मेजबानी में 3 नवंबर से शुरू हुए इस सम्मेलन के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि इस अहम क्षेत्र का भविष्य कोई अकेला मुल्क तय नहीं कर सकता। उन्होंने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को झटकों से बचाने के लिए साझेदार देशों के बीच गहरे तकनीकी और संस्थागत सहयोग का आह्वान किया।
समुद्री व्यापार और चोकपॉइंट्स पर बढ़ता दबाव
सम्मेलन को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने समुद्री व्यापार मार्गों और प्रमुख चोकपॉइंट्स पर पैदा होने वाले अवरोधों की ओर सबका ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि समुद्र में होने वाली किसी भी रुकावट का सीधा असर दुनिया भर की सप्लाई चेन पर पड़ता है। इस समस्या से निपटने के लिए आपूर्ति स्रोतों के विविधीकरण और व्यापक क्षेत्रीय समन्वय को उन्होंने सबसे जरूरी कदम बताया, ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था किसी एक संकट से अचानक न चरमरा जाए।
रक्षा मंत्री ने संबोधन में क्या कहा
राजनाथ सिंह ने अपने वक्तव्य में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अकादमिक साझेदारी को समुद्री चुनौतियों का ठोस समाधान करार दिया। X पर अपने संबोधन का ब्योरा साझा करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि समुद्री लचीलापन केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक नवाचार और साझा समझ से हासिल होगा। उन्होंने भागीदार देशों से संकट के समय एक-दूसरे का संबल बनने और समुद्री नियमों के सम्मान की अपील की।
अकादमिक और तकनीकी सहयोग पर संवाद का केंद्र
इस संवाद सत्र में पूर्व नौसेना उप-प्रमुख संजय महिंद्रू ने भी अकादमिक और रणनीतिक मंथन की अहमियत को सामने रखा। पूरे सम्मेलन के दौरान विज्ञान और तकनीकी आदान-प्रदान के जरिए समुद्री निगरानी तंत्र को आधुनिक बनाने पर विस्तृत चर्चाएं हुईं, जिससे साझेदार देशों के बीच सूचनाओं का त्वरित आदान-प्रदान संभव हो सके।
जनता की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर रक्षा मंत्री के इस रुख का व्यापक स्तर पर स्वागत किया गया। आम लोगों ने इसे सुरक्षित समुद्री व्यापार और विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में एक रणनीतिक कदम बताते हुए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के बढ़ते नेतृत्व की सराहना की।


























