प्राकृतिक आपदाओं के थपेड़ों से इंसानी बस्तियों को बचाने में पर्यावरण की अहमियत कितनी बड़ी हो सकती है, इसकी मिसाल तमिलनाडु का तटीय इलाका आज भी पेश करता है। वर्ष 2004 में हिंद महासागर में उठी भयानक लहरों ने जब भारी तबाही मचाई थी, तब पिचावरम के घने मैंग्रोव जंगलों ने ढाल बनकर कई गांवों का वजूद मिटने से रोक लिया था।
समुद्री लहरों के आगे जीवित दीवार बने थे वन
दिसंबर 2004 की भीषण समुद्री त्रासदी को याद करते हुए कांग्रेस नेता शशि थरूर ने सोशल मीडिया मंच X पर लिखा कि उस समय यह दलदली वन क्षेत्र समुद्र और बस्तियों के बीच एक मजबूत रक्षा कवच बन गया था। उन्होंने बताया कि इस प्राकृतिक सुरक्षा घेरे की वजह से पीछे बसे तमाम रिहायशी इलाके भारी तबाही से सुरक्षित बच गए थे।
ग्रामीणों का संरक्षण और जीवित देवता का दर्जा
इस भयानक आपदा के दो दशक बीत जाने के बाद भी स्थानीय आबादी उस उपकार को भूली नहीं है। जिन पेड़ों ने ग्रामीणों की जान और आशियाने बचाए थे, उन्हें वहां के लोग अब जीवित भगवान की तरह पूजते हैं। थरूर के अनुसार, ग्रामीण पूरी निष्ठा के साथ इस वन संपदा की देखभाल कर रहे हैं और पर्यावरण की हिफाजत को अपनी जिम्मेदारी मानते हैं। तमिलनाडु के तटीय जिलों में हर साल इस त्रासदी की बरसी पर प्रार्थनाएं आयोजित की जाती हैं और जान गंवाने वालों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
जनता की प्रतिक्रिया
थरूर के इस संदेश पर आम लोगों ने भी अपनी सहमति जताई और कहा कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए आधुनिक ढांचों से कहीं ज्यादा ऐसे कुदरती वन कारगर साबित होते हैं, इसलिए इनका संरक्षण बेहद जरूरी है।



























