वाशिंगटन और तेहरान के बीच मध्यस्थ बनकर खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने की पाकिस्तानी रणनीति पूरी तरह बेअसर साबित हुई है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम कराने के उद्देश्य से तेहरान की कई यात्राएं कर चुके थे। इन तमाम कोशिशों के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी नेतृत्व के बीच संभावित बातचीत में इस्लामाबाद को कोई अहम भूमिका नहीं मिल सकी। इस पूरे कूटनीतिक घटनाक्रम में कतर मुख्य मध्यस्थ बनकर सामने आया है और दोनों देशों के बीच दोहा में नए सिरे से संवाद प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
कूटनीतिक प्रभाव पर कर्नल दानवीर सिंह की टिप्पणी
मेजर गौरव आर्य के शो 'कमांड सेंटर' के दौरान रिटायर्ड कर्नल दानवीर सिंह ने इस्लामाबाद की इस कूटनीतिक स्थिति का विस्तृत विश्लेषण किया। उन्होंने पाकिस्तान के प्रभाव की तुलना प्रशासनिक दफ्तर के बाहर मौजूद अर्दली से करते हुए कहा कि उनके पास निर्णय को प्रभावित करने की कोई ताकत नहीं बची है।
"पाकिस्तान की हालत उस चपरासी जैसी है जो कलेक्टर साहब के दफ्तर के बाहर खड़ा रहता है। वो 500 रुपये लेकर आपको मिलवा तो देगा, लेकिन किसी डिसीजन को मुतासर नहीं कर पाएगा क्योंकि उस चपरासी के पास कोई लेवरेज ही नहीं है।"
दानवीर सिंह के अनुसार केवल संपर्क कराने की क्षमता होना कूटनीति में पर्याप्त नहीं होता जब तक कि बातचीत की मेज पर ठोस दबाव बनाने की वास्तविक क्षमता न हो। पाकिस्तान केवल बयानबाजी तक सीमित रह गया जबकि व्यावहारिक फैसलों में उसका कोई प्रभाव नजर नहीं आया।
कतर की मध्यस्थता और क्षेत्रीय तनाव
कूटनीतिक समीकरण बदलने के बाद अब कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता की प्रक्रिया चल रही है। मध्यस्थता के दावे करने वाले असीम मुनीर अपने एलएनजी (LNG) कार्गो जहाज की सुरक्षा तक सुनिश्चित नहीं कर पाए। इसके विपरीत जिस ईरान के साथ रिश्ते सुधारने और शांतिदूत बनने की बात कही जा रही थी, वहां भी पाकिस्तान की नीतियों को लेकर गहरा असंतोष देखा जा रहा है। ट्रंप प्रशासन और ईरानी हुकूमत ने पाकिस्तान को पूरी तरह दरकिनार करते हुए कतर पर भरोसा जताया है, जिससे क्षेत्रीय कूटनीति में इस्लामाबाद का पत्ता साफ हो गया है।
विफलताओं पर बाहरी ताकतों पर दोषारोपण का चलन
चर्चा के दौरान कर्नल दानवीर सिंह ने यह रेखांकित किया कि पाकिस्तानी विश्लेषक और सोशल मीडिया निर्माता अपनी आंतरिक कमजोरियों को छिपाने के लिए अक्सर पड़ोसी देशों पर आरोप मढ़ते हैं। जब भी सुरक्षा या विदेश नीति के मोर्चे पर नाकामी मिलती है, तो उसका जिम्मा बाहरी ताकतों पर डाल दिया जाता है।
पाकिस्तान में कभी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) की गतिविधियों के पीछे भारत का हाथ बताया जाता है, तो कभी संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ईरान को जिम्मेदार ठहराया जाने लगता है। कर्नल दानवीर के अनुसार पाकिस्तानी ओपिनियन मेकर्स अब ईरान पर बलूचिस्तान के लड़ाकों को वित्तीय सहायता देने के आरोप लगा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वास्तविक समाधान ढूंढने के बजाय पड़ोसी देशों पर इल्जाम लगाना और वित्तीय मदद मांगना ही वहां की मुख्य कार्यप्रणाली बनकर रह गई है।



















