महाराष्ट्र और कर्नाटक की राजनीति में वर्षों तक आमने-सामने रहने वाले दो प्रमुख क्षेत्रीय संगठन अब एक साझा मंच पर साथ आ गए हैं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) और कर्नाटक रक्षणा वेदिके (केआरवी) के बीच लगभग 13 वर्षों से कोई औपचारिक संवाद नहीं हुआ था। मंगलवार को बेंगलुरु में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान दोनों संगठनों के वरिष्ठ नेताओं ने पुरानी तल्खी को भुलाकर एक नई राजनीतिक शुरुआत की है। इस बैठक में एमएनएस नेता संदीप देशपांडे के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने केआरवी प्रमुख टीए नारायण गौड़ा और अन्य प्रमुख पदाधिकारियों के साथ विस्तृत चर्चा की। बातचीत के दौरान क्षेत्रीय सीमाओं के बजाय केंद्र सरकार की नीतियों, राज्यों के अधिकार, केंद्रीय टैक्स वितरण और भाषा जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया। इस ऐतिहासिक मुलाकात के साथ ही 'इंडियन लैंग्वेजेज फोरम' नाम से एक संयुक्त मंच गठित करने का निर्णय लिया गया है, जिसके माध्यम से दोनों संगठन राष्ट्रीय स्तर पर अपनी आवाज बुलंद करेंगे।
13 वर्षों का भाषाई विवाद और रेलवे भर्ती बोर्ड की भिड़ंत
एमएनएस और केआरवी के बीच संबंधों का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पिछले डेढ़ दशक के दौरान दोनों संगठनों ने अपने-अपने राज्यों में क्षेत्रीय अस्मिता और भाषा के मुद्दों को लेकर आक्रामक रुख अपनाया है। दोनों के बीच अंतिम औपचारिक भिड़ंत वर्ष 2013 में हुई थी, जब रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षाओं में भाषाई माध्यम को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। उस समय दोनों संगठनों ने स्थानीय अभ्यर्थियों के अधिकारों का हवाला देते हुए एक-दूसरे के खिलाफ सख्त बयानबाजी की थी। इसके अलावा, महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच बेलगावी क्षेत्र को लेकर जारी पुराना सीमा विवाद भी दोनों संगठनों के बीच टकराव की मुख्य वजह रहा है। अतीत में एमएनएस और केआरवी बेलगावी मुद्दे पर कई बार प्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने आए हैं।
हालांकि, बेंगलुरु बैठक में दोनों पक्षों ने परिपक्वता दिखाते हुए बेलगावी विवाद को फिलहाल पृष्ठभूमि में रखने पर सहमति जताई है। केआरवी नेतृत्व ने स्पष्ट किया कि यदि बेलगावी में रहने वाले लोग अपनी इच्छा से मराठी सीखना चाहते हैं, तो उन्हें इस पर कोई आपत्ति नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने बेलगावी में कन्नड़ भाषा और स्थानीय राज्य की पहचान का सम्मान करने पर भी जोर दिया। दूसरी ओर, महाराष्ट्र के सीमावर्ती जिलों जैसे कोल्हापुर, सांगली और सोलापुर में रहने वाली कन्नड़ भाषी आबादी के मुद्दे पर एमएनएस ने भी सकारात्मक रुख अपनाया। एमएनएस का कहना है कि वहां की स्थानीय संस्कृति का सम्मान किया जाना चाहिए, जबकि वहां के निवासियों को मराठी भाषा भी सीखनी चाहिए। इस समझ से दोनों संगठनों के बीच लंबे समय से जारी भाषाई और क्षेत्रीय तनाव में कमी आने की उम्मीद है।
'इंडियन लैंग्वेजेज फोरम' और दिल्ली राष्ट्रीय सम्मेलन की रूपरेखा
बेंगलुरु में बनी सहमति के आधार पर दोनों संगठनों ने 'इंडियन लैंग्वेजेज फोरम' की नींव रखी है। इस साझा मंच का मुख्य उद्देश्य गैर-हिंदी भाषी राज्यों की आवाज को केंद्र सरकार तक पहुंचाना है। इस फोरम के तहत एक 10 सूत्रीय साझा कार्यक्रम तैयार किया जा रहा है, जिसमें भाषा, कर प्रणाली और प्रशासनिक अधिकारों से जुड़े बिंदुओं को शामिल किया जाएगा। एमएनएस और केआरवी की योजना इस पहल को केवल दो राज्यों तक सीमित रखने की नहीं है, बल्कि इसे एक व्यापक राष्ट्रीय अभियान का रूप देने की है।
इसी रणनीति के तहत अक्टूबर से नवंबर के बीच देश की राजधानी दिल्ली में एक बड़े राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन करने की तैयारी की जा रही है। इस सम्मेलन में महाराष्ट्र और कर्नाटक के अलावा दक्षिण और उत्तर-पूर्व के विभिन्न राज्यों के क्षेत्रीय संगठनों को आमंत्रित करने का प्रस्ताव है। इनमें तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, गोवा, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के प्रमुख क्षेत्रीय दल और भाषाई अधिकार संगठन शामिल हैं। एमएनएस नेताओं ने जानकारी दी है कि वे दक्षिण भारत के अन्य प्रमुख राजनीतिक दलों से संपर्क साध रहे हैं और जल्द ही तमिलनाडु में वहां के स्थानीय नेताओं से मुलाकात की जाएगी। इस पहल का समर्थन करते हुए कार्यकर्ता अरुण जावगल ने X पर लिखा कि यदि कोई व्यक्ति भारतीय संघ की एकता में सच्चा विश्वास रखता है, तो उसे विभिन्न भाषाई समुदायों के एक साथ आने का स्वागत करना चाहिए। उनका कहना था कि जब कन्नड़, मराठी, तमिल, तेलुगु, बंगाली और अन्य भाषा समूह एक-दूसरे की पहचान और अधिकारों का सम्मान करते हुए सहयोग करते हैं, तो इससे देश का संघीय ढांचा मजबूत होता है।
केंद्रीय टैक्स बंटवारे में असमानता पर उठाए गंभीर सवाल
इस नए गठबंधन का एक अन्य प्रमुख स्तंभ राज्यों के वित्तीय अधिकारों की सुरक्षा है। एमएनएस और केआरवी दोनों का तर्क है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे औद्योगिक रूप से उन्नत राज्य केंद्र सरकार को सबसे अधिक राजस्व प्रदान करते हैं। इसके बावजूद, जब केंद्रीय करों के वितरण की बात आती है, तो इन राज्यों को उनके आर्थिक योगदान के अनुपात में उचित लाभ नहीं मिलता है। दोनों संगठनों का मानना है कि वर्तमान कर विभाजन व्यवस्था राज्यों के साथ अन्याय करती है और इसे तुरंत तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए।
बैठक में तय किया गया कि 'इंडियन लैंग्वेजेज फोरम' के माध्यम से केंद्र से यह मांग की जाएगी कि करों के हस्तांतरण में राज्यों के योगदान और उन्हें मिलने वाली वापस हिस्सेदारी के बीच एक न्यायसंगत संतुलन स्थापित किया जाए। संगठनों का कहना है कि अधिक राजस्व पैदा करने वाले राज्यों के बुनियादी ढांचे और स्थानीय कल्याणकारी योजनाओं के लिए पर्याप्त बजटीय सहायता मिलना उनका अधिकार है। इस मुद्दे को दिल्ली सम्मेलन में प्रमुखता से उठाया जाएगा ताकि अन्य राजस्व-दाता राज्यों को भी इस साझा आर्थिक लड़ाई में जोड़ा जा सके।
परिसीमन प्रक्रिया और राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटने की आशंका
केंद्रीय करों के अलावा, देश में प्रस्तावित आगामी लोकसभा परिसीमन प्रक्रिया को लेकर भी दोनों संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। जनसंख्या के आधार पर संसदीय सीटों के पुनर्गठन से दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटने की आशंका जताई जा रही है। एमएनएस और केआरवी का कहना है कि जिन राज्यों ने राष्ट्रीय नीति का पालन करते हुए जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है, उन्हें परिसीमन के कारण संसद में अपनी सीटें खोकर राजनीतिक कीमत नहीं चुकानी चाहिए।
दोनों दलों का तर्क है कि यदि केवल जनसंख्या को सीटों के निर्धारण का आधार बनाया गया, तो उन राज्यों को अनुचित लाभ मिलेगा जहां जनसंख्या वृद्धि दर अधिक रही है। इससे संसद में विकासशील और नीति-पालक राज्यों का प्रभाव कम हो जाएगा। इसलिए, दोनों संगठनों ने मांग की है कि परिसीमन के नियमों में ऐसा संशोधन किया जाए जिससे राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन बिगड़ने न पाए। यह मुद्दा दक्षिण भारत के कई अन्य राज्यों के लिए भी अत्यंत संवेदनशील है, जिसके बल पर यह फोरम एक बड़ा जनाधार बनाने की कोशिश में है।
राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की भूमिका पर आलोचना और क्षेत्रीय राजनीति की राह
एमएनएस और केआरवी ने केंद्र में सत्ता में रही या विपक्ष में बैठी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों पर भी तीखा हमला बोला है। दोनों संगठनों ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों से चुनकर आने वाले सांसद अपने-अपने राज्यों के भाषाई और आर्थिक हितों को संसद में उस मजबूती से नहीं उठाते, जिसकी आज जरूरत है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय दल अक्सर पार्टी हाईकमान के निर्देशों के आगे राज्यों के अधिकारों की अनदेखी कर देते हैं।
इसी वजह से दोनों संगठनों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि क्षेत्रीय ताकतों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए खुद आगे आना होगा और एक स्वतंत्र मंच का निर्माण करना होगा। एमएनएस और केआरवी का मानना है कि यह नया गठबंधन क्षेत्रीय राजनीति में एक नए युग की शुरुआत कर सकता है। यदि यह मंच महाराष्ट्र और कर्नाटक की सीमाओं से परे जाकर तमिलनाडु, तेलंगाना, पंजाब और पश्चिम बंगाल के संगठनों को जोड़ने में सफल रहता है, तो भाषा, टैक्स और संघीय अधिकारों का सवाल देश की मुख्यधारा की राजनीति के केंद्र में आ जाएगा।



















