पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 1971 की कैबिनेट के एकमात्र जीवित सदस्य डॉ. कर्ण सिंह ने बांग्लादेश के निर्माण और 1971 के ऐतिहासिक युद्ध से जुड़ी अपनी महत्वपूर्ण यादें साझा की हैं। एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश के उदय को याद करते हुए उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी शायद उस दौर की उस अपार खुशी को पूरी तरह महसूस नहीं कर सकती, जो दिसंबर 1971 में पूरे भारत में फैली हुई थी। उन्होंने रेखांकित किया कि बांग्लादेश के गठन में शेख मुजीबुर रहमान की भूमिका बुनियादी थी और यदि वे न होते तो शायद बांग्लादेश का अस्तित्व ही नहीं बन पाता।
बांग्लादेश में शेख मुजीब की प्रतिमा तोड़े जाने पर गहरा दुख
डॉ. कर्ण सिंह ने बांग्लादेश के हालिया घटनाक्रम पर अपनी गहरी संवेदना और चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने दूरदर्शन के समाचारों में कुछ लोगों को हथौड़े लेकर शेख मुजीबुर रहमान की प्रतिमा को खंडित करते देखा, तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से बहुत गहरा आघात पहुंचा। इस दुखद घटना की तुलना भारत के संदर्भ से करते हुए उन्होंने कहा कि शेख मुजीब की प्रतिमा को तोड़ा जाना ठीक वैसा ही है जैसे भारत में कोई महात्मा गांधी की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों की नई पीढ़ी को उस साझा इतिहास का सम्मान करना चाहिए जिसने दक्षिण एशिया का भूगोल बदल दिया था।
पूर्वी पाकिस्तान का संकट और 1971 के युद्ध की रणनीतिक पृष्ठभूमि
वर्ष 1971 के संकट को याद करते हुए डॉ. कर्ण सिंह ने बताया कि तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में जनरल टिक्का खान के नेतृत्व में हुए अत्याचारों के कारण लाखों की संख्या में असहाय शरणार्थी भारतीय सीमाओं में प्रवेश करने लगे थे। शरणार्थियों की यह संख्या बढ़कर कई लाख तक पहुंच गई थी, जिससे भारत पर भारी सामाजिक और आर्थिक दबाव बन गया था। उस कठिन समय में पूरा देश यह उम्मीद लगाए बैठा था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कब हस्तक्षेप करेंगी और कोई बड़ा कदम उठाएंगी। डॉ. कर्ण सिंह के अनुसार, तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ ने प्रधानमंत्री को सलाह दी थी कि युद्ध के लिए सही समय और अनुकूल परिस्थितियों का इंतजार करना चाहिए ताकि सफलता पूरी तरह सुनिश्चित हो सके।
15 दिनों का निर्णायक युद्ध और 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण
रणनीतिक तैयारी पूरी होने के बाद जब उपयुक्त अवसर आया, तो भारतीय सशस्त्र बलों और मुक्ति बाहिनी ने मिलकर संयुक्त रूप से एक अत्यंत प्रभावी और तेज अभियान चलाया। यह युद्ध केवल 15 दिनों के भीतर अपने अंतिम और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया। अंततः 16 दिसंबर 1971 को एक ऐतिहासिक मोड़ आया जब पाकिस्तानी सेना के पूर्वी कमान के प्रमुख जनरल नियाजी ने ढाका में भारतीय सेना के पूर्वी कमान के प्रमुख जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष बिना शर्त आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। इस अभूतपूर्व सैन्य जीत के दौरान करीब 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने अपने हथियार डाल दिए थे, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था।
संसद में इंदिरा गांधी की वह ऐतिहासिक घोषणा और ढाका की आजादी
डॉ. कर्ण सिंह ने भारतीय संसद के भीतर के उस अविस्मरणीय क्षण का भी सजीव वर्णन किया जब युद्ध में विजय और बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा की गई थी। उन्होंने याद दिलाया कि इंदिरा गांधी आमतौर पर अपने व्यक्तिगत या राजनीतिक मनोभावों को सार्वजनिक रूप से बहुत नियंत्रित रखती थीं। लेकिन उस ऐतिहासिक दिन वह लगभग तेज कदमों से दौड़ते हुए लोकसभा कक्ष में प्रवेश कर गईं। उन्होंने तुरंत अध्यक्ष से आग्रह किया कि उन्हें राष्ट्र के नाम एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूचना देनी है। उनके बोलते ही पूरे सदन में एक गहरा सन्नाटा छा गया। इंदिरा गांधी ने गर्व के साथ ऐलान किया कि भारतीय सेना और मुक्ति बाहिनी ने पूर्ण विजय हासिल कर ली है और ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी बन चुका है।
शेख हसीना को भारत में शरण और दोनों देशों के रिश्तों का भविष्य
इस घोषणा के सुनते ही पूरी लोकसभा में खुशी की लहर दौड़ गई, मेजें थपथपाई जाने लगीं और पूरे देश में जश्न का माहौल बन गया। डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि यह केवल एक सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि दक्षिण एशिया के इतिहास को नया रूप देने वाला एक महान क्षण था। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत में प्रवास से जुड़े मुद्दे पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि वे शेख मुजीबुर रहमान की जीवित पुत्री हैं। भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा हमेशा से विपत्ति में पड़े लोगों को शरण और सुरक्षा प्रदान करने की रही है। यदि वे अपनी सुरक्षा के जोखिम के बावजूद अपने देश लौटने का निर्णय लेती हैं, तो यह उनका अपना व्यक्तिगत फैसला होगा। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि बांग्लादेश की वर्तमान सरकार और वहां की जनता को अपने राष्ट्र निर्माण में भारत के निस्वार्थ योगदान को सदैव याद रखना चाहिए।





















