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1971 में बांग्लादेश निर्माण और इंदिरा गांधी का ऐतिहासिक ऐलान, डॉ. कर्ण सिंह ने साझा की 93000 पाकिस्तानी सैनिकों के सरेंडर की यादेंराजनीति
26 अग॰ 2026, 4:58 am (1 घंटे पहले)· 2

1971 में बांग्लादेश निर्माण और इंदिरा गांधी का ऐतिहासिक ऐलान, डॉ. कर्ण सिंह ने साझा की 93000 पाकिस्तानी सैनिकों के सरेंडर की यादें

1971 के युद्ध और बांग्लादेश की आजादी को याद करते हुए डॉ. कर्ण सिंह ने इंदिरा गांधी के ऐतिहासिक फैसले, 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों के आत्मसमर्पण और मौजूदा दौर के संबंधों पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 1971 की कैबिनेट के एकमात्र जीवित सदस्य डॉ. कर्ण सिंह ने बांग्लादेश के निर्माण और 1971 के ऐतिहासिक युद्ध से जुड़ी अपनी महत्वपूर्ण यादें साझा की हैं। एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश के उदय को याद करते हुए उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी शायद उस दौर की उस अपार खुशी को पूरी तरह महसूस नहीं कर सकती, जो दिसंबर 1971 में पूरे भारत में फैली हुई थी। उन्होंने रेखांकित किया कि बांग्लादेश के गठन में शेख मुजीबुर रहमान की भूमिका बुनियादी थी और यदि वे न होते तो शायद बांग्लादेश का अस्तित्व ही नहीं बन पाता।

बांग्लादेश में शेख मुजीब की प्रतिमा तोड़े जाने पर गहरा दुख

डॉ. कर्ण सिंह ने बांग्लादेश के हालिया घटनाक्रम पर अपनी गहरी संवेदना और चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने दूरदर्शन के समाचारों में कुछ लोगों को हथौड़े लेकर शेख मुजीबुर रहमान की प्रतिमा को खंडित करते देखा, तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से बहुत गहरा आघात पहुंचा। इस दुखद घटना की तुलना भारत के संदर्भ से करते हुए उन्होंने कहा कि शेख मुजीब की प्रतिमा को तोड़ा जाना ठीक वैसा ही है जैसे भारत में कोई महात्मा गांधी की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों की नई पीढ़ी को उस साझा इतिहास का सम्मान करना चाहिए जिसने दक्षिण एशिया का भूगोल बदल दिया था।

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पूर्वी पाकिस्तान का संकट और 1971 के युद्ध की रणनीतिक पृष्ठभूमि

वर्ष 1971 के संकट को याद करते हुए डॉ. कर्ण सिंह ने बताया कि तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में जनरल टिक्का खान के नेतृत्व में हुए अत्याचारों के कारण लाखों की संख्या में असहाय शरणार्थी भारतीय सीमाओं में प्रवेश करने लगे थे। शरणार्थियों की यह संख्या बढ़कर कई लाख तक पहुंच गई थी, जिससे भारत पर भारी सामाजिक और आर्थिक दबाव बन गया था। उस कठिन समय में पूरा देश यह उम्मीद लगाए बैठा था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कब हस्तक्षेप करेंगी और कोई बड़ा कदम उठाएंगी। डॉ. कर्ण सिंह के अनुसार, तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ ने प्रधानमंत्री को सलाह दी थी कि युद्ध के लिए सही समय और अनुकूल परिस्थितियों का इंतजार करना चाहिए ताकि सफलता पूरी तरह सुनिश्चित हो सके।

15 दिनों का निर्णायक युद्ध और 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण

रणनीतिक तैयारी पूरी होने के बाद जब उपयुक्त अवसर आया, तो भारतीय सशस्त्र बलों और मुक्ति बाहिनी ने मिलकर संयुक्त रूप से एक अत्यंत प्रभावी और तेज अभियान चलाया। यह युद्ध केवल 15 दिनों के भीतर अपने अंतिम और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया। अंततः 16 दिसंबर 1971 को एक ऐतिहासिक मोड़ आया जब पाकिस्तानी सेना के पूर्वी कमान के प्रमुख जनरल नियाजी ने ढाका में भारतीय सेना के पूर्वी कमान के प्रमुख जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष बिना शर्त आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। इस अभूतपूर्व सैन्य जीत के दौरान करीब 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने अपने हथियार डाल दिए थे, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था।

संसद में इंदिरा गांधी की वह ऐतिहासिक घोषणा और ढाका की आजादी

डॉ. कर्ण सिंह ने भारतीय संसद के भीतर के उस अविस्मरणीय क्षण का भी सजीव वर्णन किया जब युद्ध में विजय और बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा की गई थी। उन्होंने याद दिलाया कि इंदिरा गांधी आमतौर पर अपने व्यक्तिगत या राजनीतिक मनोभावों को सार्वजनिक रूप से बहुत नियंत्रित रखती थीं। लेकिन उस ऐतिहासिक दिन वह लगभग तेज कदमों से दौड़ते हुए लोकसभा कक्ष में प्रवेश कर गईं। उन्होंने तुरंत अध्यक्ष से आग्रह किया कि उन्हें राष्ट्र के नाम एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूचना देनी है। उनके बोलते ही पूरे सदन में एक गहरा सन्नाटा छा गया। इंदिरा गांधी ने गर्व के साथ ऐलान किया कि भारतीय सेना और मुक्ति बाहिनी ने पूर्ण विजय हासिल कर ली है और ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी बन चुका है।

शेख हसीना को भारत में शरण और दोनों देशों के रिश्तों का भविष्य

इस घोषणा के सुनते ही पूरी लोकसभा में खुशी की लहर दौड़ गई, मेजें थपथपाई जाने लगीं और पूरे देश में जश्न का माहौल बन गया। डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि यह केवल एक सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि दक्षिण एशिया के इतिहास को नया रूप देने वाला एक महान क्षण था। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत में प्रवास से जुड़े मुद्दे पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि वे शेख मुजीबुर रहमान की जीवित पुत्री हैं। भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा हमेशा से विपत्ति में पड़े लोगों को शरण और सुरक्षा प्रदान करने की रही है। यदि वे अपनी सुरक्षा के जोखिम के बावजूद अपने देश लौटने का निर्णय लेती हैं, तो यह उनका अपना व्यक्तिगत फैसला होगा। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि बांग्लादेश की वर्तमान सरकार और वहां की जनता को अपने राष्ट्र निर्माण में भारत के निस्वार्थ योगदान को सदैव याद रखना चाहिए।

सवाल-जवाब

डॉ. कर्ण सिंह 1971 के युद्ध के समय किस पद पर थे?
डॉ. कर्ण सिंह 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल के सदस्य थे और वे उस कैबिनेट के इकलौते जीवित सदस्य हैं।
1971 के युद्ध में कितने पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था?
16 दिसंबर 1971 को ढाका में जनरल नियाजी के नेतृत्व में करीब 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना और मुक्ति बाहिनी के सामने आत्मसमर्पण किया था।
बांग्लादेश की आजादी की घोषणा संसद में किस तरह हुई थी?
इंदिरा गांधी ने लोकसभा में आकर घोषणा की थी कि भारतीय सेना और मुक्ति बाहिनी विजयी हुई हैं तथा ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी बन चुका है।
शेख हसीना के भारत में रहने पर डॉ. कर्ण सिंह ने क्या प्रतिक्रिया दी?
उन्होंने कहा कि शेख हसीना शेख मुजीब की जीवित बेटी हैं और भारत की परंपरा शरण देने की रही है, बाकी उनकी स्वदेश वापसी का निर्णय उनका अपना होगा।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·47 मिनट पहले

डॉ. कर्ण सिंह के ये संस्मरण केवल कूटनीतिक या राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की आंतरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। 1971 के युद्ध, शरणार्थी संकट और सामरिक धैर्य जैसे ऐतिहासिक बिंदुओं पर यह प्रकटीकरण वर्तमान सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण केस स्टडी है, जो यह रेखांकित करता है कि सामरिक तैयारी और राजनीतिक दृढ़ता से ही राष्ट्र की संप्रभुता सुरक्षित रहती है।

Ravikash Gupta@ravikash·47 मिनट पहले

डॉ. कर्ण सिंह के इन संस्मरणों से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सैन्य तैयारियों के साथ-साथ मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति कितनी आवश्यक है। शरणार्थी संकट के दौरान भारत पर बने सामाजिक और आर्थिक दबाव के बीच सामरिक धैर्य बनाए रखने का यह ऐतिहासिक उदाहरण आज भी देश के नीति-निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है। वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में, विशेषकर दक्षिण एशिया के बदलते समीकरणों के बीच, यह विश्लेषण हमें याद दिलाता है कि पड़ोसी देशों में अस्थिरता और राजनीतिक उथल-पुथल सीधे तौर पर भारत की आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करती है, जिसके लिए दूरदर्शी आर्थिक और कूटनीतिक रणनीतियों की आवश्यकता है।

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