हरियाणा विधानसभा के मॉनसून सत्र के पहले ही दिन सदन के भीतर और बाहर अभूतपूर्व हंगामा देखने को मिला। राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के सभी विधायक विरोध दर्ज कराने के लिए काले कपड़े पहनकर विधानसभा परिसर पहुंचे। विपक्ष ने नीट परीक्षा आंदोलन के दौरान जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई और प्रसिद्ध राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मामले को लेकर जोरदार नारेबाजी की। इस दौरान विधानसभा परिसर के बाहर पुलिस बल और कांग्रेस विधायकों के बीच तीखी धक्कामुक्की हुई, जिसमें कांग्रेस पक्ष का दावा है कि उनके कई विधायकों को चोटें आई हैं। हंगामे के कारण सदन की कार्रवाई को पहले कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ा और बाद में फिर से दोपहर 12.30 बजे तक के लिए मुल्तवी कर दिया गया।
विधानसभा परिसर के बाहर मार्च और पुलिस से टकराव
गुरुवार की सुबह मॉनसून सत्र की शुरुआत से पहले ही कांग्रेस के तमाम विधायक एकजुट होकर विधानसभा की ओर पैदल मार्च करते हुए निकले। विपक्षी विधायक नीट पेपर लीक और राम मंदिर चढ़ावा चोरी के गंभीर मुद्दों पर राज्य सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों को विधानसभा भवन में प्रवेश करने से रोकने के लिए पुलिस प्रशासन की ओर से जगह-जगह मजबूत बैरिकेडिंग की गई थी। जब विधायकों ने बैरिकेड्स पार करने का प्रयास किया, तो पुलिस बल द्वारा रोक लगाए जाने के बाद स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गई।
कांग्रेस की ओर से जारी आधिकारिक वक्तव्य में आरोप लगाया गया कि पुलिस ने विधायकों को रोकने के लिए अत्यधिक बल प्रयोग और धक्कामुक्की की। विपक्ष का कहना है कि पुलिस के इस रवैये के कारण कई विधायकों को शारीरिक चोटें पहुंचीं। सदन के भीतर प्रश्नकाल शुरू होते ही कांग्रेस सदस्यों ने इस घटनाक्रम और जनहित के मुद्दों को लेकर हंगामा शुरू कर दिया, जिसके चलते सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायकों में तीखी नोकझोंक हुई और सदन की कार्यवाही को 12.30 बजे तक के लिए स्थगित करना पड़ा।
स्पीकर का आश्वासन, रघुबीर कादियान और महिपाल ढांडा के आरोप
सदन में हुए इस भारी बवाल पर विधानसभा स्पीकर ने संज्ञान लेते हुए कहा कि वे इस पूरे वाकये की विस्तृत जानकारी एकत्र करेंगे और मौके के सभी वीडियो फुटेज निकलवाकर जांच करेंगे। स्पीकर ने विपक्षी विधायकों को अपने चेंबर में आने का निमंत्रण देते हुए आश्वस्त किया कि वे स्वयं व्यक्तिगत रूप से पूरे मामले की समीक्षा करेंगे। स्पीकर ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें मिली प्राथमिक जानकारी के अनुसार विधायक हाथों में लिखित तख्तियां लेकर सदन के अंदर प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे, जिसके कारण सुरक्षाकर्मियों द्वारा उन्हें रोका गया था।
इस बीच, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रघुबीर कादियान ने आरोप लगाया कि विधानसभा परिसर में विधायकों के साथ दुर्व्यवहार किया गया और उनके विशेषाधिकार का गंभीर हनन हुआ है। उन्होंने सुरक्षा बल के व्यवहार पर कड़ा एतराज जताया। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष के नेता महिपाल ढांडा ने पलटवार करते हुए विपक्षी सदस्यों पर निशाना साधा। महिपाल ढांडा ने कहा कि कांग्रेस के विधायक पूरी तरह बेकाबू हो गए थे और उन्होंने विधानसभा के कर्मचारियों व सुरक्षाकर्मियों के साथ बेहद गलत व्यवहार किया।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का पलटवार और सीसीटीवी फुटेज की मांग
पूरे घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने विपक्ष के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के विधायक मारपीट किए जाने और कोहनी मारे जाने जैसी मनगढ़ंत बातें कहकर सदन को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं। जिस समय मुख्यमंत्री सदन को संबोधित कर रहे थे, उस दौरान भी कांग्रेस विधायक लगातार नारेबाजी करते रहे।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने विधानसभा अध्यक्ष को सुझाव दिया कि वे अपने चेंबर में सत्ता पक्ष यानी बीजेपी और विपक्ष यानी कांग्रेस, दोनों दलों के विधायकों को एक साथ बुलाएं। मुख्यमंत्री ने कहा कि चेंबर में सभी की मौजूदगी में सीसीटीवी फुटेज और वीडियो रिकॉर्डिंग की गहन जांच की जानी चाहिए और जो भी तथ्य सामने आएं, उनके आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई की जाए। उन्होंने उल्टे विपक्ष पर हमला बोलते हुए कहा कि वास्तविक रूप से गुंडागर्दी और अराजकता का आचरण कांग्रेस के विधायकों द्वारा ही किया जा रहा है। इसके उपरांत मुख्यमंत्री ने सदन में शोक प्रस्ताव पेश किया, जिसे सभी सदस्यों द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया।
भूपेंद्र सिंह हुड्डा का सरकार पर करारा हमला और संवैधानिक अधिकारों की बात
सदन की कार्यवाही के बीच बाहर आकर पूर्व मुख्यमंत्री व नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने मीडिया के सामने राज्य सरकार की कड़े शब्दों में भर्त्सना की। भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि जंतर-मंतर का विरोध प्रदर्शन हो या विधानसभा तक का मार्च, देश के प्रत्येक नागरिक और जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि को अपनी आवाज उठाने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ किसी भी प्रकार का बल प्रयोग करना संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बुनियादी मूल्यों के सीधे खिलाफ है।
नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने आरोप लगाया कि जिस प्रकार पुलिसकर्मियों द्वारा उन्हें और उनके साथी विधायकों को धक्के मारे गए, उससे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सरकार ने पुलिस की वर्दी में जानबूझकर उपद्रवियों को भेज रखा था। उन्होंने कहा कि नीट पेपर लीक का राष्ट्रीय मुद्दा हो या फिर राम मंदिर चढ़ावा चोरी की घटना, बीजेपी सरकार शुरुआत से ही इन मामलों से आंखें चुराती रही है। विपक्ष द्वारा आवाज बुलंद किए जाने और जनता के सडकों पर उतरने के बाद ही सरकार ने जांच का महज औपचारिकता भरा नाटक किया है, जिस पर अब कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले की जांच समय-सीमा पर उठे गंभीर सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मामले पर बेहद गंभीर सवाल उठाते हुए एक निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा भगवान राम के प्रति अगाध श्रद्धा रखने वाले करोड़ों देशवासियों की आस्था को ठेस पहुंचाने वाला है, इसलिए किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाना चाहिए। भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने जांच प्रक्रिया की समय-सीमा पर सवाल उठाते हुए पूरा ब्योरा प्रस्तुत किया
- आरोपों का सार्वजनिक होना: इस मामले में गंभीर आरोप जून 2026 के शुरुआती दिनों में सार्वजनिक रूप से सामने आए थे।
- एसआईटी का गठन: मामले की गंभीरता को देखते हुए 13 जून को विशेष जांच टीम यानी एसआईटी का गठन किया गया।
- प्रारंभिक रिपोर्ट: एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट 23 जून को प्रस्तुत की।
- एफआईआर दर्ज होना: प्रारंभिक रिपोर्ट आने के दो दिन बाद यानी 25 जून को जाकर औपचारिक एफआईआर दर्ज की गई।
भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने सवाल दागा कि जब आरोप जून 2026 की शुरुआत में ही सामने आ गए थे, तो एफआईआर दर्ज करने में इतनी लंबी देरी क्यों की गई? क्या इस विलंब के पीछे साक्ष्यों को नष्ट करने या प्रभावित करने की कोई साजिश थी? उन्होंने एसआईटी की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि पैसे की गिनती की प्रक्रिया के दौरान अनिवार्य एसओपी का पालन नहीं किया गया। गिनती स्थल पर सुरक्षा गार्ड तैनात नहीं थे, कर्मचारियों की फ्रिस्किंग यानी तलाशी नहीं ली गई, और पॉकेट रहित कपड़े पहनने के नियम का उल्लंघन हुआ। सबसे बड़ा सवाल यह है कि नियम के मुताबिक 180 दिन की सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखनी अनिवार्य थी, जबकि फुटेज केवल 45 दिनों तक ही रखी गई। हुड्डा ने पूछा कि ये सुरक्षा व्यवस्थाएं क्यों विफल हुईं और जिम्मेदार अधिकारियों तथा ट्रस्ट प्रबंधन पर अब तक कोई प्रशासनिक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
इसके साथ ही उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि इस बहुचर्चित मामले में बड़े चेहरों को किस आधार पर क्लीन चिट दे दी गई? उन्होंने कहा कि क्या केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई करके मामला दबाना उचित है, जबकि इतने हाईटेक और बहुस्तरीय सुरक्षा घेरे के भीतर करोड़ों रुपये की चोरी अकेले निचले स्तर के कर्मचारियों के बस की बात नहीं हो सकती।
नीट आंदोलन, जंतर-मंतर लाठीचार्ज और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर रुख
दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट अभ्यर्थियों पर हुए पुलिस बल प्रयोग का जिक्र करते हुए भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि सरकार की क्रूर मंशा उसी समय उजागर हो गई थी, जब पैलेट गन से घायल हुए एक छोटे बच्चे की एफआईआर दर्ज करने से भी पुलिस ने साफ इनकार कर दिया था। उन्होंने याद दिलाया कि जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस अन्याय का कड़ा विरोध किया और स्वयं थाने के बाहर धरने पर बैठ गए, तब जाकर सरकार को मजबूरन एफआईआर दर्ज करनी पड़ी थी। हुड्डा ने कहा कि राहुल गांधी के इस दृढ़ संकल्प ने साबित कर दिया कि सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह होना ही पड़ेगा, और हरियाणा कांग्रेस भी सड़क से लेकर सदन तक इस लड़ाई को लड़ेगी।
केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का स्वागत करते हुए भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने इसे देश के युवाओं और छात्रों के अनवरत संघर्ष की ऐतिहासिक जीत करार दिया। उन्होंने कहा कि यदि धर्मेंद्र प्रधान शुरुआत में ही नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इस्तीफा दे देते, तो मासूम विद्यार्थियों को पुलिस के लाठीचार्ज का दर्द नहीं सहना पड़ता और न ही इतना लंबा संघर्ष करना पड़ता। हुड्डा ने मांग की कि सरकार को उन निर्दोष बच्चों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए जिन पर लाठीचार्ज करवाया गया था। इसके साथ ही उन्होंने छात्रों पर लाठीचार्ज करने और पैलेट गन दागने वाले पुलिसकर्मियों व अधिकारियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करने तथा प्रदर्शनकारी छात्रों पर दर्ज सभी मुकदमे तुरंत वापस लेने की मांग की। उन्होंने कहा कि देश में पेपर लीक एक महामारी बन चुका है और बीजेपी सरकार की उदासीनता के कारण ही युवाओं को सड़कों पर उतरना पड़ा है।





















