बिहार के सियासी गलियारों में राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के कुनबे की आंतरिक उठापटक एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में आ गई है। सिंगापुर में करीब 11 महीने बिताने के बाद अपने पिता के बुलावे पर गुरुवार को पटना लौटीं रोहिणी आचार्य ने सीधे अपने मामा और पूर्व सांसद साधु यादव के आवास का रुख कर सबको चौंका दिया। यह वही साधु यादव हैं, जिन्हें कभी रोहिणी ने तीखी तल्खी के बीच 'कंस मामा' की संज्ञा दी थी। बरसों से बंद संवाद के बाद अचानक भांजी का मामा की चौखट पर पहुंचना और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेना सामान्य शिष्टाचार भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे सूबे की राजनीति में एक नए शक्ति संतुलन की तलाश के रूप में देखा जा रहा है।
पारिवारिक कड़वाहट और पुरानी दूरियों का लंबा इतिहास
बिहार के राजनीतिक इतिहास में एक दौर ऐसा था जब राबड़ी देवी की हुकूमत के समय उनके भाइयों साधु यादव और सुभाष यादव की सत्ता तथा संगठन में तूती बोलती थी। लालू प्रसाद यादव के बेहद विश्वासपात्र रहे साधु यादव कालांतर में सत्ता संरचना से बाहर होते चले गए। खासकर तेजस्वी यादव के हाथों में पार्टी की मुकम्मल बागडोर आने के बाद पुराने दिग्गज पूरी तरह हाशिये पर धकेल दिए गए। इसके चलते दोनों परिवारों के दरमियान सार्वजनिक स्तर पर कड़वाहट इतनी बढ़ गई कि भाई-बहन और साले-बहनोई के बीच बातचीत का सिलसिला पूरी तरह टूट गया। जब तेजस्वी यादव का विवाह हुआ था, तब साधु यादव ने कटु टिप्पणियां की थीं, जिसके जवाब में रोहिणी आचार्य ने मोर्चा संभालते हुए उन पर जोरदार हमला बोला था। अब उसी कड़वे अतीत को दरकिनार कर दोनों का एक मंच पर दिखना संकेत देता है कि वक्त के साथ सियासी जरूरतें बदल चुकी हैं।
सारण की जमीन और भविष्य की चुनावी बिसात
सारण संसदीय क्षेत्र के चुनावी मुकाबले में मिली शिकस्त के बाद से ही रोहिणी आचार्य के भीतर पार्टी के रणनीतिकारों को लेकर नाराजगी पनप रही थी। उनका मानना रहा है कि चुनाव के दौरान उन्हें पार्टी के अंदरूनी तंत्र से वह समर्थन हासिल नहीं हुआ, जिसकी दरकार थी। सारण के इलाके में साधु यादव का पुराना जमीनी रसूख और मजबूत जनाधार आज भी असरदार माना जाता है। भविष्य में दोबारा छपरा की जमीन से चुनावी समर में उतरने की मंशा रखने वाली रोहिणी के लिए साधु यादव का साथ एक मजबूत ढाल साबित हो सकता है। तेजस्वी यादव के एकछत्र फैसलों के सामने अपने पारंपरिक आधार को एकजुट कर रोहिणी यह संदेश देना चाहती हैं कि वे अलग-थलग नहीं हैं, बल्कि परिवार के पुराने सिपहसालारों को जोड़कर अपनी स्वतंत्र ताकत खड़ी कर सकती हैं।
मामा के सुर बदले और मिला जीत का खुला आशीर्वाद
दरवाजे पर पहुंची भांजी का साधु यादव ने गर्मजोशी से स्वागत किया और वर्षों की तल्खी पर मिट्टी डालते हुए मीडिया के सामने उनका खुला बचाव किया। साधु यादव ने कहा, "रोहिणी मेरी भगिनी है। वह फिर से छपरा से चुनाव लड़ेगी और जीतकर सांसद बनेगी। हमारा पूरा आशीर्वाद उसके साथ है।" अपने पुराने तेवरों से उलट साधु यादव ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी बहन राबड़ी देवी और उनके बीच मन में कोई दूरी कभी नहीं रही, क्योंकि घर की बेटी जब देहरी पर लौटती है तो हर किसी को खुशी होती है। इस बदले हुए रुख से संकेत मिलता है कि रोहिणी सिर्फ अपने लिए सियासी जमीन ही नहीं तलाश रहीं, बल्कि लालू-राबड़ी और साधु यादव के बीच बिखरे रिश्तों को समेटने में मध्यस्थ की भूमिका भी निभा सकती हैं।
आरजेडी के भीतर कई मोर्चों पर सुलगती कलह
यह अप्रत्याशित घटनाक्रम पार्टी के भीतर गहराते शक्ति संघर्ष के समय सामने आया है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बाद परिवार की अंदरूनी खींचतान उस वक्त सतह पर आ गई थी, जब रोहिणी आचार्य ने राजनीति और परिवार से दूरी बनाने का ऐलान करते हुए अपने साथ हुए दुर्व्यवहार का दर्द साझा किया था। उस नाजुक मोड़ पर भी साधु यादव खुलकर रोहिणी के समर्थन में उतरे थे और पार्टी के फैसलों पर मंथन की वकालत की थी। उधर तेज प्रताप यादव लंबे समय से अपनी जुदा राह अख्तियार किए हुए हैं, जबकि मीसा भारती को भी अहम फैसलों से दूर रखे जाने की टीस रही है। ऐसे में रोहिणी और साधु यादव का यह नया तालमेल पार्टी के एकाधिकारवादी नेतृत्व को चुनौती देने वाले एक नए धड़े की शुरुआत बन सकता है।



















