नई दिल्ली में अक्सर विरोध प्रदर्शनों और रैलियों के दौरान खाकी वर्दीधारियों द्वारा किए जाने वाले बर्बर लाठीचार्ज की तस्वीरें और वीडियो सामने आते रहते हैं। ऐसे में यह गंभीर सवाल हमेशा खड़ा होता है कि क्या सिर्फ अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर लाठी बरसाने वाले निचले स्तर के पुलिसकर्मी किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई से बच सकते हैं? भारतीय कानून और न्यायशास्त्र के अनुसार इसका जवाब साफ तौर पर नहीं है। यदि कोई भी पुलिस अधिकारी या जवान अवैध, अत्यधिक या बर्बर तरीके से लाठीचार्ज करता है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से दोषी माना जा सकता है और सजा दी जा सकती है, भले ही उस जवान ने अपनी मर्जी से वह आदेश न दिया हो।
भारतीय न्याय प्रणाली में केवल वरिष्ठों के आदेश का हवाला देकर पूरी तरह से आपराधिक या नागरिक जवाबदेही से बचना मुमकिन नहीं है। यदि पुलिस कर्मियों द्वारा इस्तेमाल किया गया बल भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का सीधा उल्लंघन करता है, तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच के साथ-साथ गंभीर आपराधिक मुकदमे भी चलाए जा सकते हैं। कानून किसी भी पुलिसकर्मी को नागरिक अधिकारों को कुचलने की खुली छूट नहीं देता है, और आदेश का पालन करने की आड़ में गैरकानूनी हिंसा को माफ नहीं किया जा सकता है।
कानूनी ढांचा और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश
देश की सर्वोच्च अदालत ने रामलीला मैदान हादसा बनाम गृह सचिव (2012) जैसे ऐतिहासिक फैसलों में यह बात पूरी तरह स्पष्ट की है कि पुलिस बल का प्रयोग केवल निरोधात्मक, न्यूनतम और आनुपातिक होना चाहिए। पुलिस की यह कार्रवाई कभी भी दंडात्मक या बदले की भावना से प्रेरित हिंसा का रूप नहीं ले सकती। कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर भीड़ पर अंधाधुंध अत्याचार करना न्यायिक मानदंडों के खिलाफ है।
इतना ही नहीं, निचले स्तर के अधिकारियों का भी यह कानूनी कर्तव्य बनता है कि वे ऐसे किसी भी आदेश को मानने से साफ इनकार कर दें जो स्पष्ट रूप से अवैध हों। उदाहरण के लिए, किसी पूरी तरह से शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर जानलेवा हमला करने का निर्देश अवैध है। हाल ही में न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी कि सिर्फ विरोध प्रदर्शन आयोजित करना ही पुलिस द्वारा बर्बर लाठीचार्ज करने का कोई औचित्य नहीं बन सकता है।
भीड़ हटाने के लिए तय नियम और प्रोटोकॉल
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 129 और 130 के तहत पुलिस के लिए किसी भी तरह के शारीरिक बल का प्रयोग करने से पहले एक तयशुदा कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य बनाया गया है। इस प्रोटोकॉल के मुख्य चरण इस प्रकार हैं
सबसे पहले भीड़ को गैर-कानूनी घोषित करते हुए उसे वहां से हटने की स्पष्ट चेतावनी देना जरूरी है। इसके बाद लाठीचार्ज करने से पहले वॉटर कैनन यानी पानी की बौछार या फिर आंसू गैस के गोलों जैसे कम नुकसानदेह विकल्पों का प्रयोग किया जाना चाहिए। सबसे अंत में लाठी चलाने के बेहद कड़े नियम आते हैं। लाठीचार्ज हमेशा आखिरी विकल्प होना चाहिए और वार हमेशा कमर से नीचे पैरों पर ही होना चाहिए। सिर, गले या शरीर के अन्य संवेदनशील अंगों पर लाठी चलाना सीधे तौर पर पुलिस मैनुअल का गंभीर उल्लंघन माना जाता है।



















