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तृणमूल कांग्रेस की सत्ता जंग चुनाव आयोग तक पहुंची, ममता और ऋतब्रत खेमे से मांगा गया जवाबराजनीति
2 घंटे पहले· 2

तृणमूल कांग्रेस की सत्ता जंग चुनाव आयोग तक पहुंची, ममता और ऋतब्रत खेमे से मांगा गया जवाब

तृणमूल कांग्रेस पर असली मालिकाना हक को लेकर छिड़ी लड़ाई अब चुनाव आयोग तक पहुंच गई है, आयोग ने ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी दोनों खेमों से 6 जुलाई शाम साढ़े पांच बजे तक जवाब मांगा है।

अर्जुन मेहताअर्जुन मेहताराजनीतिक संवाददाता 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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तृणमूल कांग्रेस के भीतर मचे घमासान ने अब चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटा दिया है। पार्टी पर असली मालिकाना हक किसका है, इस सवाल पर ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी, दोनों खेमों को आयोग ने अलग-अलग चिट्ठी भेजकर अपना पक्ष रखने को कहा है। दोनों नेताओं के पास सोमवार, 6 जुलाई 2026 की शाम साढ़े पांच बजे तक का वक्त है कि वे अपने-अपने दावों को लेकर दस्तावेज़ और जवाब आयोग के सामने पेश करें।

ऋतब्रत बनर्जी ने आयोग की फुल बेंच से की मुलाकात

बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी पार्टी के कुछ और नेताओं को साथ लेकर चुनाव आयोग की फुल बेंच से मिलने पहुंचे। उन्होंने आयोग को बताया कि पार्टी के ज़्यादातर विधायक, पार्षद और कार्यकर्ता अब उनके साथ खड़े हैं, इसलिए असली तृणमूल कांग्रेस उनका ही गुट है और पार्टी का नाम व चुनाव चिन्ह भी उन्हें ही मिलना चाहिए। ऋतब्रत ने आयोग के सामने यह भी रखा कि पार्टी के भीतर हाल ही में बड़ा संगठनात्मक फेरबदल हुआ है। 22 जून को कोलकाता में हुए एक प्रतिनिधि सत्र में नया अध्यक्ष और नया उपाध्यक्ष चुना गया, साथ ही एक नई नेशनल वर्किंग कमेटी भी गठित की गई।

संख्या बल का दावा, दो-तिहाई से ज़्यादा साथ होने का दावा

ऋतब्रत बनर्जी के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष तीनों पदों पर नए चेहरे बैठाए गए हैं और नए दस्तख़तों के साथ नई व्यवस्था लागू हो चुकी है। उन्होंने आयोग को बताया कि 80 में से 65 विधायक अभी उनके साथ हैं। इसमें अगर पार्षदों और ज़िला संगठन से जुड़े लोगों को भी जोड़ लिया जाए, तो पार्टी के दो-तिहाई से ज़्यादा लोग उनके गुट के साथ खड़े नज़र आते हैं। इसी आधार पर ऋतब्रत की मांग है कि उनके गुट को ही असली तृणमूल कांग्रेस के तौर पर मान्यता मिले। इसके बाद चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों धड़ों को चिट्ठी लिखकर 6 जुलाई शाम साढ़े पांच बजे तक अपने-अपने दावों के समर्थन में दस्तावेज़ जमा करने को कहा है।

ऋतब्रत बनर्जी बोले, पार्टी में वंशवाद हावी हो गया

ऋतब्रत बनर्जी ने यह भी साफ किया कि आखिर वो ममता बनर्जी से अलग राह पर क्यों चल पड़े हैं। उनका कहना है कि तृणमूल शब्द का मतलब ही ज़मीनी स्तर होता है, और पार्टी शुरुआत में सच में ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ताओं की पार्टी थी। लेकिन वक्त के साथ ज़मीनी कार्यकर्ताओं की जगह वंशवाद ने ले ली। ऋतब्रत के मुताबिक बंगाल की जनता को यह बदलाव पसंद नहीं आ रहा और पार्टी के भीतर भी कार्यकर्ताओं में नाराज़गी है। यही वजह है कि अब वो खुद तृणमूल कांग्रेस पर दावा ठोक रहे हैं। उनका कहना है कि आगे से पार्टी किसी एक व्यक्ति की पूजा से नहीं बल्कि सामूहिक नेतृत्व के आधार पर चलेगी।

ममता बनर्जी के करीबी नेताओं ने विरोधी खेमे के दावों को नकारा

दूसरी तरफ ममता बनर्जी के करीबी नेता चुनाव आयोग पहुंचे और उन्होंने विपक्षी खेमे के इन तमाम दावों को बेबुनियाद करार दिया। तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने गुरुवार को आयोग से मिलने पहुंचे नेताओं को टुटपुंजिया नेता बताते हुए तीखा हमला बोला। उन्होंने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग की फुल बेंच ने आखिर इन नेताओं को मुलाकात की इजाज़त क्यों दी। सागरिका घोष का कहना है कि किसी भी पार्टी के अधिकृत प्रतिनिधि ही आयोग से मिल सकते हैं, लेकिन जिस तरह इन नेताओं को बुलाकर मुलाकात करवाई गई, उससे साफ लगता है कि चुनाव आयोग बीजेपी के इशारे पर काम कर रहा है।

कांग्रेस भी उतरी ममता बनर्जी के समर्थन में

इस पूरे विवाद में एक दिलचस्प मोड़ यह भी है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी भी इस मसले पर ममता बनर्जी के साथ खड़े नज़र आए। अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि जिन नेताओं ने विद्रोह किया है, वे उसी थाली में छेद कर रहे हैं जिसमें उन्होंने खाया है। उन्होंने कहा कि ये सभी नेता ममता दीदी की मेहनत की बदौलत ही नेता और विधायक बने, लेकिन आज वही लोग उनके साथ गद्दारी कर रहे हैं। अब सबकी निगाहें 6 जुलाई पर टिकी हैं, जब दोनों गुट अपने-अपने दस्तावेज़ और जवाब चुनाव आयोग के सामने पेश करेंगे और आयोग को तय करना होगा कि असली तृणमूल कांग्रेस किसकी मानी जाए।

इसका आप पर असर

यह सियासी लड़ाई सीधे आम आदमी की जेब पर असर नहीं डालती, लेकिन इसका असर बंगाल की राजनीति और आगामी चुनावों पर पड़ सकता है।

  • भारत में: चुनाव आयोग जिस तरह इस विवाद को सुलझाएगा, वह तरीका आगे किसी भी पार्टी में होने वाले आंतरिक झगड़ों को निपटाने के लिए एक मिसाल बन सकता है।
  • पश्चिम बंगाल में: अगर चुनाव आयोग किसी एक गुट को असली तृणमूल कांग्रेस मान लेता है, तो पार्टी का नाम, चुनाव चिन्ह और संगठनात्मक ढांचा उसी गुट के पास चला जाएगा, जिसका सीधा असर आने वाले चुनावों में मतदाताओं की उलझन और पार्टी की रणनीति पर पड़ेगा।

सवाल-जवाब

चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी को जवाब देने के लिए कब तक का समय दिया है?
चुनाव आयोग ने दोनों नेताओं को सोमवार, 6 जुलाई 2026 की शाम साढ़े पांच बजे तक का समय दिया है।
ऋतब्रत बनर्जी कौन हैं?
ऋतब्रत बनर्जी बंगाल विधानसभा में लीडर ऑफ अपोजिशन हैं, जिन्होंने चुनाव आयोग की फुल बेंच से मिलकर तृणमूल कांग्रेस पर दावा किया।
ऋतब्रत बनर्जी के मुताबिक कितने विधायक उनके साथ हैं?
ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि पार्टी के 80 में से 65 विधायक उनके साथ हैं।
22 जून को कोलकाता में क्या हुआ था?
22 जून को कोलकाता में हुए प्रतिनिधि सत्र में नया अध्यक्ष और नया उपाध्यक्ष चुना गया और एक नई नेशनल वर्किंग कमेटी बनाई गई।
सागरिका घोष ने विरोधी खेमे पर क्या आरोप लगाया?
सागरिका घोष ने चुनाव आयोग से मिले नेताओं को टुटपुंजिया नेता बताया और कहा कि आयोग बीजेपी के इशारे पर काम कर रहा है।
अधीर रंजन चौधरी ने इस विवाद पर क्या कहा?
अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि विद्रोही नेता ममता बनर्जी की मेहनत से नेता व विधायक बने, लेकिन अब उन्हीं से गद्दारी कर रहे हैं।
अर्जुन मेहता
लेखक के बारे मेंअर्जुन मेहताराजनीतिक संवाददाता दिल्ली
विशेषज्ञताराजनीतिक समाचार, चुनाव, सरकारी नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध, लोक नीति, संसद, भू-राजनीति, शासन, राजनीतिक विश्लेषण

अर्जुन मेहता एक राजनीतिक संवाददाता हैं जो सरकारी नीतियों, चुनावों, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और ब्रेकिंग राजनीतिक ख़बरों को कवर करते हैं। वे अहम राजनीतिक घटनाक्रमों पर समय पर अपडेट और विश्लेषण देते हैं।

अर्जुन मेहता एक राजनीतिक संवाददाता हैं जो राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सरकारी नीति, चुनाव, कूटनीति और विधायी घटनाक्रमों में विशेषज्ञता रखते हैं। वे ब्रेकिंग राजनीतिक ख़बरों, नीतिगत फ़ैसलों, चुनावी अभियानों और जनचर्चा व शासन को आकार देने वाली भू-राजनीतिक घटनाओं पर रिपोर्ट करते हैं। सटीकता, निष्पक्षता और गहन रिपोर्टिंग पर ज़ोर देते हुए अर्जुन जटिल राजनीतिक मुद्दों और समाज पर उनके असर का स्पष्ट विश्लेषण देते हैं। उनकी कवरेज में संसदीय मामले, राजनीतिक दल, नेतृत्व परिवर्तन, लोक नीति और वैश्विक कूटनीतिक संबंध शामिल हैं।

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