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तृणमूल की पहचान की जंग: कालीघाट और बागी खेमे के दावों पर सोमवार को फैसला लेगा चुनाव आयोगराजनीति
6 जुल॰ 2026, 2:10 am (23 दिन पहले)· 2

तृणमूल की पहचान की जंग: कालीघाट और बागी खेमे के दावों पर सोमवार को फैसला लेगा चुनाव आयोग

तृणमूल कांग्रेस के नाम, चुनाव चिह्न और मुख्यालय पर हक जताने के लिए ममता बनर्जी का कालीघाट खेमा और ऋतब्रत बनर्जी का बागी खेमा सोमवार को चुनाव आयोग के सामने अपने-अपने दस्तावेज पेश करेंगे।

पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर मचा घमासान अब चुनाव आयोग की दहलीज़ तक पहुंच चुका है। पार्टी की स्थापना के 28 साल में पहली बार ऐसा मौका आया है जब दो अलग-अलग गुट खुद को असली तृणमूल कांग्रेस साबित करने के लिए एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं, और इस लड़ाई का फैसला अब मतदाताओं की अदालत में नहीं बल्कि निर्वाचन आयोग के दफ्तर में होगा। पार्टी के नाम, मशहूर 'घास-फूल' चुनाव चिह्न और पूरे संगठनात्मक ढांचे पर अपना-अपना हक जताने के लिए दोनों विरोधी खेमे सोमवार को दस्तावेज लेकर आयोग के सामने पेश होंगे।

28 साल में सबसे बड़ा संकट क्यों?

तृणमूल कांग्रेस के लिए यह सिर्फ एक और आंतरिक कलह नहीं है, बल्कि पार्टी के जन्म के बाद से अब तक का सबसे गंभीर अस्तित्व का संकट है। अब तक पार्टी के भीतर मतभेद या नाराजगी की खबरें आती रही हैं, लेकिन कभी भी दो पक्षों ने एक साथ खुद को असली तृणमूल कांग्रेस घोषित कर आयोग के सामने कानूनी दावा पेश करने की नौबत नहीं आई थी। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी के भीतर सुलगी बगावत अब इतनी बड़ी हो चुकी है कि यह सीधे संगठन के अस्तित्व को चुनौती दे रही है।

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चुनाव आयोग की समय सीमा और मुख्य विवाद

पिछले हफ्ते दोनों विरोधी खेमों की शुरुआती दलीलें सुनने के बाद चुनाव आयोग ने साफ कर दिया कि दोनों पक्षों को छह जुलाई को शाम 5.30 बजे तक अपने दस्तावेज, संगठनात्मक रिकॉर्ड और जनसमर्थन के सबूत जमा करने होंगे। इस पूरे विवाद के केंद्र में पार्टी का चुनाव चिह्न, उसकी संपत्तियां, फंड और कोलकाता स्थित मुख्यालय का भविष्य है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर बगावत की जो चिंगारी सुलगी थी, वह अब इन सभी मुद्दों पर दोनों गुटों के आमने-सामने आ जाने के बाद पूरी तरह भड़क चुकी है।

कालीघाट खेमे बनाम बागी खेमे की रणनीति

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला कालीघाट खेमा अपने दावे के लिए पार्टी की संगठनात्मक निरंतरता और उसकी स्थापना से जुड़ी विरासत का सहारा ले रहा है। इसके उलट, बागी खेमा विधानसभा और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के बीच अपनी संख्या-बल पर भरोसा जता रहा है। यह पूरा टकराव पश्चिम बंगाल में पिछले कई दशकों में देखे गए सबसे बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों में गिना जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि यह संकट शुरुआत में सिर्फ विधायी स्तर की बगावत जैसा दिखा था, लेकिन कुछ ही हफ्तों में यह पूरे संगठन के वजूद के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया।

बगावत की शुरुआत: अरूप रॉय की ताजपोशी

यह पूरा संकट पिछले महीने उस वक्त शुरू हुआ जब बागी खेमे ने एक विशेष सत्र बुलाकर वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को अपना अध्यक्ष चुन लिया और साथ ही एक समानांतर राष्ट्रीय नेतृत्व ढांचा भी पेश कर दिया। बागी खेमे का तर्क था कि पार्टी के मौजूदा नेतृत्व ने अपने ज्यादातर चुने हुए जनप्रतिनिधियों का भरोसा पूरी तरह खो दिया है, इसलिए एक नए नेतृत्व ढांचे की जरूरत है।

58 विधायकों का झटका और ऋतब्रत बनर्जी का दावा

बागी खेमे ने अपनी असली ताकत तब दिखाई जब तृणमूल के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व की तरफ से पेश उम्मीदवार को नकार दिया और इसके बदले विपक्ष के नेता के पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी के दावे का समर्थन कर दिया। यह घटना कालीघाट खेमे के लिए बड़ा झटका साबित हुई। अब बागी खेमे का दावा है कि उसके पास करीब 65 विधायकों का समर्थन मौजूद है, यानी शुरुआती 58 के आंकड़े से भी आगे निकल चुका है।

सांसदों का पाला बदलना, दिल्ली में EC से मुलाकात

विधायकों की बगावत के बाद यह संकट संसद तक जा पहुंचा। काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में लोकसभा के 21 सदस्य 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया' (एनसीपीआई) में शामिल हो गए। इससे संसद में ममता बनर्जी की स्थिति काफी कमजोर हो गई और पार्टी की राजनीतिक वैधता की इस लड़ाई में एक बिल्कुल नया पहलू जुड़ गया। इसके एक दिन बाद बागी खेमे के नेताओं ने नयी दिल्ली पहुंचकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार और दो अन्य चुनाव आयुक्तों से मुलाकात की और पार्टी के नेतृत्व, चुनाव चिह्न, संगठनात्मक ढांचे तथा संपत्ति पर अपना दावा औपचारिक रूप से पेश किया।

तृणमूल भवन पर कब्जा

दिल्ली में चुनाव आयोग से मुलाकात के अगले ही दिन, यानी शुक्रवार को, पार्टी के भीतर चल रही इस खींचतान में एक नाटकीय मोड़ आ गया। बागी खेमे ने कोलकाता स्थित पार्टी मुख्यालय 'तृणमूल भवन' पर सीधे कब्जा कर लिया। उन्होंने भवन के ताले बदल दिए, नए पोस्टर लगा दिए और ऐलान कर दिया कि अब से पार्टी का कामकाज यहीं से चलेगा। यह कदम दिखाता है कि दोनों खेमों के बीच लड़ाई अब सिर्फ कागजी दावों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जमीन पर भी नियंत्रण की जंग शुरू हो चुकी है।

दोनों पक्षों की दलीलें

ऋतब्रत गुट के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "हमने सभी दस्तावेजी सबूत इकट्ठा कर लिये हैं और उन्हें आयोग के सामने पेश करेंगे। हमें भरोसा है कि फैसला तथ्यों, आंकड़ों और संगठनात्मक वैधता पर आधारित होगा।" वहीं दूसरी तरफ, ममता बनर्जी के खेमे ने बागी नेताओं के इन तमाम दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए कड़ी आपत्ति जताई है। इस खेमे का तर्क है कि पार्टी से निकाले जा चुके नेताओं को चुनाव आयोग के सामने पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का कोई कानूनी अधिकार ही नहीं है। बहरहाल, कालीघाट खेमे के लिए इस मामले में दांव पर बहुत कुछ लगा है, क्योंकि पार्टी के वरिष्ठ नेता निजी बातचीत में यह मानने लगे हैं कि चुनाव आयोग का यह फैसला पार्टी की आगे की राजनीतिक पहचान पर बहुत दूरगामी असर डालने वाला है।

सवाल-जवाब

चुनाव आयोग के सामने दस्तावेज जमा करने की आखिरी तारीख और समय क्या है?
दोनों गुटों को छह जुलाई को शाम 5.30 बजे तक दस्तावेज, संगठनात्मक रिकॉर्ड और समर्थन के सबूत चुनाव आयोग के सामने पेश करने हैं।
इस पूरे विवाद की जड़ में क्या है?
पार्टी का नाम, 'घास-फूल' चुनाव चिह्न, संपत्तियां, फंड और कोलकाता स्थित मुख्यालय तृणमूल भवन पर दोनों गुटों का दावा है।
बागी गुट का दावा कितने विधायकों के समर्थन का है?
बागी गुट का दावा है कि उसे तृणमूल कांग्रेस के 80 में से करीब 65 विधायकों का समर्थन हासिल है, जबकि पहले 58 विधायकों ने विपक्ष के नेता पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी के दावे का समर्थन किया था।
लोकसभा में ममता बनर्जी की स्थिति कैसे कमजोर हुई?
काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में लोकसभा के 21 सदस्य नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हो गए, जिससे संसद में ममता बनर्जी की स्थिति कमजोर हो गई।
तृणमूल भवन पर कब्जे की घटना कब हुई?
शुक्रवार को बागी गुट ने कोलकाता स्थित पार्टी मुख्यालय तृणमूल भवन पर कब्जा कर ताले बदल दिए और नए पोस्टर लगा दिए।
बागी गुट ने चुनाव आयोग से कब मुलाकात की थी?
तृणमूल भवन पर कब्जे से एक दिन पहले बागी गुट के नेताओं ने नयी दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार और दो चुनाव आयुक्तों से मुलाकात कर अपना दावा पेश किया था।
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