लखनऊ की राजनीतिक जमीन पर साल 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है। विपक्षी खेमे की ओर से सत्तारूढ़ दल के हिंदुत्व और कल्याणकारी योजनाओं के नैरेटिव की काट खोजने के लिए सियासी मोर्चेबंदी शुरू कर दी गई है। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक बड़ा कदम उठाते हुए स्वास्थ्य सेवाओं को अपने अभियान के केंद्र में रखा है। महिलाओं, युवाओं और किसानों के बाद अब पार्टी प्रमुख ने गरीब और बीमार तबके को लुभाने के लिए कार्ड-मुक्त और पूरी तरह मुफ्त चिकित्सा का वादा किया है। चुनावी हवा अपने पक्ष में करने के लिए इस नई घोषणा को मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है।
बिना किसी प्रशासनिक झंझट के मिलेगा सीधा इलाज
सार्वजनिक मंचों और बयानों के जरिए यह साफ किया गया है कि सरकार बनने पर मरीजों को अस्पताल में किसी भी तरह के पात्रता कार्ड दिखाने की जरूरत नहीं होगी। वर्तमान में केंद्र या राज्य स्तर की विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ उठाने के लिए लोगों को कई तरह के प्रशासनिक दस्तावेजों और औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है। इस पूरी बाध्यता को खत्म कर हर जरूरतमंद नागरिक को सीधे तौर पर मुफ्त मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस योजना के दायरे में सामान्य सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियों से लेकर कैंसर जैसी बेहद गंभीर और महंगी बीमारियों का इलाज भी शामिल होगा। पार्टी की ओर से यह भी संकेत दिए गए हैं कि इस प्रस्ताव को आगामी 2027 के चुनाव घोषणापत्र का सबसे अहम हिस्सा बनाया जाएगा।
स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य वर्गों के लिए कई वादे
सत्ताधारी दल के कामकाज और शासन मॉडल को कड़ी टक्कर देने के लिए राजनीतिक मैदान में एक के बाद एक कई वादों का पिटारा खोला जा रहा है। महिलाओं के लिए सम्मान राशि और बसों में पूरी तरह सुरक्षित तथा मुफ्त सफर जैसी सुविधाओं का दायरा तय करने की बात कही गई है। इसके अलावा कृषि क्षेत्र के मोर्चे पर फसलों के बकाये का तुरंत भुगतान करने, खेती के लिए मुफ्त बिजली देने और भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में पारदर्शी मुआवजा दिए जाने का संकल्प दोहराया गया है। खेल के क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया जा रहा है, जबकि खाली पड़ी सरकारी नौकरियों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। स्वास्थ्य विभाग के भीतर ही रिक्त पड़े पदों की भारी संख्या का हवाला देते हुए इस पर तत्काल कार्रवाई करने का वादा किया गया है। समाजवादी विचारक डॉ. राममनोहर लोहिया के प्रसिद्ध दाम बांधो सिद्धांत के आधार पर आम इस्तेमाल की वस्तुओं और ईंधन के दामों पर नकेल कसने की बात भी उठाई गई है।
राजनीतिक गलियारों में पीडीए यानी PDA फॉर्मूला लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। साल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान इस संक्षिप्त शब्द का अर्थ मुख्य रूप से पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक तक सीमित रखा गया था। हालांकि जैसे-जैसे साल 2027 का रण नजदीक आ रहा है, इस समीकरण का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है ताकि सवर्ण समाज और अन्य नाराज तबकों को भी साथ जोड़ा जा सके। इसी रणनीति के तहत इस दायरे को पीड़ित वर्ग तक भी विस्तारित करने की कोशिश की गई है। इसके अलावा युवाओं को जोड़ने के लिए इसे अंग्रेजी के शब्दों प्ले, डिवेलप और अचीव यानी खेलो, बढ़ो और हासिल करो के रूप में भी परिभाषित किया जा चुका है। इससे पहले इस शब्द को धैर्य, अनुशासन और कार्रवाई जैसे मूल्यों से भी जोड़ा गया था, जिससे हर वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत की जा सके।
योजनाओं की जंग और चुनावी समीकरण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के आक्रामक रुख से उत्तर प्रदेश का यह मुकाबला सीधे तौर पर योजनाओं की टक्कर में बदल रहा है। सत्ताधारी दल की तरफ से जहां डबल इंजन सरकार और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का हवाला दिया जाता है, वहीं विपक्षी दल स्वास्थ्य ढांचे की बदहाली और डॉक्टरों की कमी जैसे मुद्दों को उठाकर जमीन पर माहौल बदलने में जुटा है। पीडीए के इस बहुआयामी और लचीले स्वरूप के जरिए पारंपरिक कैडर वोट से बाहर निकलकर शहरी गरीबों और मध्यम वर्ग को अपने पाले में खींचने की पूरी कोशिश की जा रही है। इन तमाम रणनीतिक कदमों से यह साफ हो गया है कि आने वाले समय में राज्य का राजनीतिक संघर्ष बेहद दिलचस्प और कड़ा होने वाला है।



















