बिहार की बांकीपुर सीट पर हो रहे उपचुनाव में जनसुराज के प्रशांत किशोर भले ही बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हों, लेकिन पटना की सियासी गलियारों में अब यह सवाल उठने लगा है कि कहीं वह खुद बीजेपी की किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा तो नहीं बन गए हैं। पहली बार खुद चुनावी मैदान में उतरे प्रशांत किशोर इस उपचुनाव को बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के 100 दिनों के कामकाज पर जनता की राय जानने वाले जनमत संग्रह की तरह पेश कर रहे हैं।
बांकीपुर का इतिहास और बीजेपी का किला
बांकीपुर सीट बीजेपी के लिए महज एक सीट नहीं बल्कि दशकों पुरानी राजनीतिक विरासत है। नितिन नवीन के बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष चुने जाने के बाद यह सीट खाली हुई और तभी से यहां उपचुनाव कराने की जरूरत पड़ी। साल 1995 से अब तक इस सीट पर लगातार नितिन नवीन और उनके पिता नवीन किशोर ही विधायक चुने जाते रहे हैं, यानी करीब तीन दशक से यह सीट बीजेपी परिवार के पास ही रही है। ऐसे मजबूत गढ़ में जनसुराज का चुनौती देना अपने आप में एक साहसिक कदम माना जा रहा है।
2025 के नतीजों ने खोली जनसुराज की असलियत
पिछले बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर ने दावा किया था कि उनकी पार्टी जनसुराज प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाएगी। लेकिन वोटिंग जैसे-जैसे नजदीक आती गई, उनका सुर बदलता गया और वह कहने लगे कि उनकी पार्टी या तो सबसे ऊपर रहेगी या फिर पूरी तरह साफ हो जाएगी। जब नतीजे सामने आए तो उनकी दूसरी आशंका ही सच साबित हुई। जनसुराज को एक भी सीट नहीं मिली और पार्टी के करीब 98 फीसदी उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई। इतने बड़े प्रचार अभियान और नए तौर-तरीकों को आजमाने के बावजूद मिली इस करारी हार ने प्रशांत किशोर को यह एहसास करा दिया है कि अगले पांच साल तक नई पार्टी और उसके संगठन ढांचे को संभाले रखना आसान काम नहीं होगा।
प्रशांत किशोर ने खुद क्यों लड़ने का फैसला लिया?
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2025 के चुनाव के दौरान और उसके बाद जनसुराज से जुड़े लोग जिस रफ्तार से पार्टी छोड़कर जा रहे हैं, उसे थामना प्रशांत किशोर के लिए बेहद जरूरी हो गया है। यही वजह है कि उन्होंने बांकीपुर उपचुनाव में खुद उम्मीदवार बनकर एक बड़ा दांव खेला है। प्रशांत किशोर को भी अच्छी तरह पता है कि बांकीपुर जैसी सीट पर किसी और पार्टी के प्रत्याशी का जीतना लगभग नामुमकिन है, लेकिन अगर यहां कोई चमत्कार हो जाए तो वह अपनी पार्टी में नए सिरे से जोश भर सकेंगे। इसके जरिए वह अपनी टीम को यह संदेश भी देना चाहते हैं कि उनका नेता मैदान छोड़कर भागने वालों में से नहीं है, बल्कि आगे बढ़कर लड़ाई लड़ना जानता है।
बीजेपी की चुप्पी के पीछे छिपी रणनीति
दूसरी ओर बीजेपी की रणनीति भी साफ नजर आ रही है। प्रशांत किशोर जिस तेजी से प्रचार में जुटे हैं, बीजेपी उसका सीधा जवाब देने के बजाय विकास कार्यों, एनडीए की एकजुटता और नितिन नवीन के चेहरे पर वोट मांगने में जुटी है। अपनी ताकत दिखाने के लिए प्रशांत किशोर मुस्लिम बहुल इलाकों में भी अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं। इसका सीधा मतलब यह निकाला जा रहा है कि अगर मुस्लिम वोट और सरकार से नाराज वोट बंट जाते हैं, तो बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा की जीत का अंतर काफी बड़ा हो सकता है।
बांकीपुर बना बीजेपी के लिए नए फॉर्मूले की प्रयोगशाला
बीजेपी बांकीपुर उपचुनाव को एक नए राजनीतिक समीकरण को परखने के मौके के तौर पर देख रही है। पार्टी की सोच यह है कि अगर प्रशांत किशोर को आरजेडी की उम्मीदवार रेखा गुप्ता से ज्यादा वोट मिल जाएं, तो विपक्षी वोट बंट जाएगा और इसका सीधा फायदा बीजेपी प्रत्याशी को मिलेगा, जिससे उनकी जीत का अंतर बड़ा हो जाएगा। माना जा रहा है कि अगर यह फॉर्मूला बांकीपुर में कामयाब रहा, तो इसे राज्यभर में लागू करने पर भी विचार किया जा सकता है। बीजेपी को इस बात का अंदाजा है कि जब भी विपक्षी वोट या सत्ता विरोधी वोट बंटते हैं, तब पार्टी की जीत लगभग तय हो जाती है। सिर्फ बिहार ही नहीं, पूरे देश में बीजेपी की कोशिश यही रहती है कि मुस्लिम वोट बंटे रहें, ताकि उसकी जीत की राह आसान बनी रहे।
जनसुराज के लिए हर हाल में मौका
वहीं जनसुराज भी इस उपचुनाव में जीत या कम से कम दूसरे नंबर की पार्टी बनने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। पार्टी को उम्मीद है कि अगर जीत मिलती है तो उनकी पूरी रणनीति सफल साबित होगी। लेकिन अगर हार भी गए और दूसरे नंबर पर रहे, तो जनसुराज खुद को राज्य की मुख्य विपक्षी ताकत के रूप में पेश करने से नहीं चूकेगी। इससे मौजूदा मुख्य विपक्षी दल आरजेडी पर से लोगों का भरोसा कमजोर होता दिख सकता है, जिससे सत्ता विरोधी वोट और बंट जाएंगे और आखिरकार इसका सबसे बड़ा फायदा बीजेपी को ही मिलता रहेगा।


















