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श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में नरेंद्र मोदी के भाषण से फिर क्यों छिड़ी बहस, क्या वापस लौट आया पुराना करिश्माराजनीति
7 सित॰ 2026, 10:36 pm (2 घंटे पहले)· 2

श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में नरेंद्र मोदी के भाषण से फिर क्यों छिड़ी बहस, क्या वापस लौट आया पुराना करिश्मा

नरेंद्र मोदी के हालिया श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के भाषण ने उनके राजनीतिक प्रभाव और युवाओं के बीच वापसी को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। इस पर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असली राजनीतिक परीक्षा उत्तर प्रदेश में होगी।

श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में नरेंद्र मोदी के संबोधन ने राजनीतिक हलकों में उनके करिश्मे की वापसी को लेकर नए सिरे से बहस छेड़ दी है। भारतीय जनता पार्टी के सामने हाल के महीनों में युवाओं के साथ जुड़ाव और संगठनात्मक मोर्चे पर कुछ कठिनाइयां जरूर सामने आई हैं, लेकिन पार्टी का मुख्य मतदाता वर्ग अभी भी उससे पूरी तरह अलग नहीं हुआ है। अब सभी की निगाहें उत्तर प्रदेश पर टिकी हुई हैं, जहां नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, योगी आदित्यनाथ का प्रभाव और सरकार के खिलाफ जमीनी असंतोष, इन तीनों की बड़ी परीक्षा होनी है। एक लोकप्रिय कार्यक्रम में इस बात पर मंथन किया गया कि क्या प्रधानमंत्री का पुराना जादुई अंदाज एक बार फिर लौट आया है।

बारा साल की सत्ता के बाद भी क्या नरेंद्र मोदी का जादू कायम है

कार्यक्रम के दौरान उपस्थित जानकारों ने नरेंद्र मोदी के हालिया श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स वाले भाषण की तुलना उनके वर्ष 2013 के बहुचर्चित संबोधन से की। उस वक्त नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल रहे थे और साल 2014 के आम चुनावों से पहले विपक्ष में रहते हुए तत्कालीन सरकार के खिलाफ राजनीतिक माहौल को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रहे थे। इस पूरी चर्चा के दौरान कार्यक्रम के संचालक के साथ वरिष्ठ पत्रकार अजीत द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री और राजनीतिक विश्लेषक सज्जन कुमार ने अपनी बात रखी।

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विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2013 और मौजूदा समय की परिस्थितियों में एक बहुत बड़ा फर्क यह है कि तब नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में नहीं थे, जबकि अब उनके बारह वर्षों के शासनकाल का लेखा-जोखा देश की जनता के सामने है। यही वजह है कि उनका आज का भाषण केवल पुराने आश्वासनों और भविष्य के दृष्टिकोण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके बीते वर्षों के कामकाज के आधार पर भी आंका जाता है।

युवा वर्ग से दोबारा जुड़ाव स्थापित करने की कवायद

चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि पिछले कुछ महीनों का समय भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं रहा है। खासकर युवा वर्ग के बीच एक प्रकार की निराशा और संवाद में कमी की बातें खुलकर सामने आईं। इसके बाद प्रधानमंत्री की ओर से युवाओं के साथ सीधे संवाद स्थापित करने के स्पष्ट प्रयास दिखाई दिए हैं।

दिल्ली के जंतर-मंतर के घटनाक्रम के बाद प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया वीडियो, युवाओं से सीधी अपील और संवाद के अन्य माध्यमों को इसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों को भी युवाओं के साथ मेलजोल बढ़ाने और संपर्क मजबूत करने के निर्देश दिए जाने की बात कही गई है। श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के कार्यक्रम में छात्रों की तरफ से मिले सकारात्मक रुझान को इसी दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

वडोदरा के एक आयोजन का हवाला देते हुए बताया गया कि वहां डिजिटल माध्यम से केवल एक घंटे के भीतर ही सभी सीटें बुक हो गईं और बड़ी संख्या में लोग प्रतीक्षा सूची में बने रहे। इसके अलावा भी युवा केंद्रित कई अन्य कार्यक्रमों के आयोजन की रूपरेखा पर बात हुई।

उत्तर प्रदेश का चुनावी मैदान तय करेगा असली इम्तिहान

विश्लेषकों का कहना है कि दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे युवा बहुल शिक्षण संस्थानों के चुनाव भले ही कुछ संकेत देते हों, लेकिन राजनीतिक ताकत की असली परीक्षा उत्तर प्रदेश की जमीन पर होगी। इसकी मुख्य वजह यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद उत्तर प्रदेश से लोकसभा सांसद हैं और संसद में इस राज्य का सियासी वजन सबसे अधिक है। ऐसे में आगामी राजनीतिक मुकाबलों में नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ दोनों के ही प्रभाव का कड़ा इम्तिहान होना तय है।

चर्चा के दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता में कोई बड़ी गिरावट दर्ज नहीं की गई है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी को लेकर पहले जैसा चुनावी उत्साह कुछ हद तक कम हुआ जरूर है। आम जनता के मन में यह बात तो साफ है कि भारतीय जनता पार्टी चुनाव जीत सकती है, मगर उस जीत को लेकर वैसा जोश नजर नहीं आ रहा है जैसा पहले हुआ करता था।

संगठन की अंदरूनी चुनौतियां और विरोधी दलों की रणनीति

लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद संगठन के भीतर आए बदलावों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। पार्टी नेताओं द्वारा अपने परिवार के सदस्यों को राजनीति में आगे बढ़ाने की प्रवृत्ति, टिकट बंटवारे को लेकर अनिश्चितता का माहौल और जमीनी कार्यकर्ताओं से बढ़ती दूरी को लेकर चिंता जाहिर की गई। सत्ता का लंबा सुख भोगने के बाद नेताओं और कार्यकर्ताओं में एक खास प्रकार का हक जताने का भाव आने की बात भी कही गई।

उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक तंत्र और निचले स्तर के संगठनात्मक ढांचे के बीच कथित तालमेल के अभाव को भी एक बड़ी बाधा बताया गया। हालांकि यह भी जोड़ा गया कि भारतीय जनता पार्टी के पारंपरिक मतदाताओं के पास फिलहाल कोई ठोस और मजबूत विकल्प मौजूद नहीं है। समाजवादी पार्टी को लेकर पार्टी के निष्ठावान मतदाताओं के एक बड़े हिस्से में सहजता का अभाव होने की बात भी सामने आई।

विपक्षी नेताओं की अपनी सियासी चालें

चर्चा के दौरान राहुल गांधी की राजनीतिक शैली और उनके पिछड़े, दलित एवं शोषित वर्ग पर केंद्रित एजेंडे पर भी बात हुई। जानकारों के अनुसार राहुल गांधी की रणनीति में जातिगत जनगणना, आरक्षण के दायरे को बढ़ाने और आबादी के अनुपात में अधिकार देने जैसे मुद्दे सबसे आगे रहे हैं। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी की तरफ से युवाओं के बीच शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं, नौकरियों और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर लगातार अभियान चलाए जाने का जिक्र किया गया।

दूसरी तरफ, अखिलेश यादव की चुनावी रणनीति में पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर विशेष ध्यान दिए जाने की बात कही गई। जाट और गैर-जाट जातियों का समीकरण साधने, मुस्लिम मतदाताओं को जोड़ने और अन्य क्षेत्रीय सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने की कोशिशों को उनकी रणनीति का अहम हिस्सा बताया गया। जयंत चौधरी को लेकर दिए गए एक बयान पर भी चर्चा हुई और उसे अनावश्यक टिप्पणी करार दिया गया।

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में योगी आदित्यनाथ की स्थिति

परामर्श के अंतिम दौर में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की वर्तमान राजनीतिक स्थिति का भी जायजा लिया गया। विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के प्रति आम जनता की नाराजगी की खबरों के बावजूद मुख्यमंत्री योगी का ग्राफ नीचे गिरता हुआ नजर नहीं आ रहा है। यहाँ तक कहा गया कि पार्टी से उपजी नाराजगी का कुछ राजनीतिक लाभ मुख्यमंत्री योगी को भी मिल सकता है, क्योंकि उन्हें खुद भारतीय जनता पार्टी के भीतर ही एक सशक्त विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

ब्राह्मण समाज के मतदाताओं को लेकर भी चर्चा हुई जिसमें यह निष्कर्ष निकला कि इस वर्ग में कुछ नाराजगी या शिकवे-शिकायतें भले ही हों, लेकिन वे भारतीय जनता पार्टी से पूरी तरह छिटककर दूर जाते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं। राजपूत समुदाय का समर्थन भी भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री योगी के साथ मजबूती से बना हुआ बताया गया। कुल मिलाकर इस पूरी चर्चा का केंद्र यही सवाल रहा कि क्या नरेंद्र मोदी युवाओं के बीच अपना खोया हुआ पुराना जुड़ाव और करिश्मा फिर से हासिल करने में सफल हो रहे हैं। श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में मिला जनसमर्थन इस दिशा में एक बड़ा संकेत अवश्य माना गया है, लेकिन इसका अंतिम और पुख्ता फैसला चुनावी परिणाम ही सुनाएंगे। विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे यह स्पष्ट करने में निर्णायक होंगे कि नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ का सियासी जादू कितना बाकी है और जनता की नाराजगी वास्तव में कितने वोटों में तब्दील होती है।

सवाल-जवाब

नरेंद्र मोदी के हालिया भाषण ने किस संस्थान में चर्चा को जन्म दिया?
नरेंद्र मोदी के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में दिए गए भाषण ने राजनीतिक चर्चा को फिर हवा दी है।
चर्चा के दौरान मुख्य रूप से किस राज्य की चुनावी स्थिति पर जोर दिया गया?
चर्चा के दौरान उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्थिति और वहां होने वाले आगामी चुनावों को सबसे बड़ा टेस्ट बताया गया।
कार्यक्रम में किन वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों ने भाग लिया?
कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार अजीत द्विवेदी, विनोद अग्निहोत्री और राजनीतिक विश्लेषक सज्जन कुमार ने हिस्सा लिया।
विपक्ष की रणनीति में किन मुद्दों को प्रमुखता दी जा रही है?
विपक्षी रणनीति में जाति जनगणना, आरक्षण, शिक्षा, और युवाओं के रोजगार से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की स्थिति को लेकर क्या कहा गया?
चर्चा में बताया गया कि पार्टी से असंतोष के बावजूद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक ग्राफ नीचे गिरता हुआ नहीं दिख रहा है।
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