उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही सियासी पारा तेजी से चढ़ने लगा है। सूबे में होने वाले चुनावी रण से पहले एक बार फिर ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कवायद शुरू हो गई है। राजनीतिक दलों के बीच इस महत्वपूर्ण वोट बैंक को अपने पाले में लाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 5 अगस्त को एक बड़ा राजनीतिक दांव चलते हुए PDA की नई व्याख्या पेश की। उन्होंने इस समीकरण में 'P' का मतलब 'पिछड़ा' की जगह 'पंडित' बताया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2022 के चुनावों में जो फॉर्मूला पिछड़ा वर्ग के इर्द-गिर्द बुना गया था, उसमें यह बदलाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नए और गहरे संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
राजधानी लखनऊ में आयोजित एक विशेष ब्राह्मण सम्मेलन के दौरान अखिलेश यादव ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में ब्राह्मण समुदाय को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने तंज कसा कि विरोधी लगातार PDA के बारे में चर्चा करते रहते हैं और इसके नए अर्थ गढ़ने में लगे रहते हैं। जब से वे इस मोर्चे से मात खाए हैं, तब वे इसे दोबारा परिभाषित करने की जुगत भिड़ा रहे हैं। लेकिन वे इस बात को नजरअंदाज कर रहे हैं कि PDA के भीतर 'PD' का दायरा केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें 'पंडित' भी शामिल हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि विरोधियों की तरफ से जितना अधिक दर्द या पीड़ा दी जाएगी, यह समीकरण उतना ही अधिक मजबूत होकर उभरेगा।
उसी मंच से समाजवादी पार्टी प्रमुख ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने महाकुंभ के प्रबंधन को लेकर प्रशासन की आलोचना की और आरोप लगाया कि व्यवस्थाएं ठीक से नहीं संभाली गईं। उन्होंने एक विशिष्ट घटना का जिक्र करते हुए कहा कि एक शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती तक को स्नान करने से रोका गया। इसके साथ ही उन्होंने विश्वास दिलाया कि अगर उनकी पार्टी भविष्य में सत्ता में आती है, तो वे न केवल इस समुदाय का पूर्ण उत्थान सुनिश्चित करेंगे बल्कि राज्य के युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी मुहैया कराए जाएंगे।
उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात पर ब्राह्मण समुदाय को हमेशा से ही एक बेहद प्रभावशाली और निर्णायक वोट बैंक माना जाता रहा है। राज्य के विधानसभा चुनावों में इनकी भूमिका सरकार बनाने या बिगाड़ने में अहम साबित होती है। विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों के आंकड़ों के अनुसार, सूबे की 115 से अधिक विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता सीधे तौर पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यही मुख्य वजह है कि जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें करीब आती हैं, तमाम राजनीतिक दल इस समुदाय को अपने पाले में करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं।
ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने एक सफल सामाजिक समीकरण के बल पर भारी बहुमत हासिल किया था। बीएसपी ने दलित और ब्राह्मण मतदाताओं के बीच एक मजबूत सोशल इंजीनियरिंग तैयार की थी। उस चुनाव में पार्टी ने कुल 403 में से 206 सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी सरकार बनाई थी। लोकनीति और सीएसडीएस के सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, उस चुनाव में बीएसपी के पाले में करीब 16 प्रतिशत ब्राह्मण वोट आए थे, जिसने उनकी जीत की राह आसान कर दी थी।
इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने भी शानदार प्रदर्शन किया। अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने 224 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता हासिल की थी। लोकनीति और सीएसडीएस की रिपोर्ट बताती है कि इस चुनाव में समाजवादी पार्टी को लगभग 19 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाताओं का समर्थन प्राप्त हुआ था। हालांकि उस समय अन्य दलों की स्थिति देखें तो बीजेपी को 38 प्रतिशत, बीएसपी को 19 प्रतिशत और कांग्रेस को 13 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिले थे। इससे साफ है कि तब यह वोट बैंक किसी एक दल के पाले में पूरी तरह लामबंद नहीं था और बंटा हुआ था।
लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह पलट गए। उस चुनाव में नरेंद्र मोदी की मजबूत लहर के बीच भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड प्रदर्शन करते हुए 300 से ज्यादा सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इस चुनाव में ब्राह्मण वोटों का एक बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ चला गया। लोकनीति और सीएसडीएस के आंकड़ों के अनुसार, भाजपा को लगभग 83 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के खाते में केवल 7 प्रतिशत और बीएसपी के खाते में महज 2 प्रतिशत वोट ही आ सके।
यह रुझान 2012 के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में भी बरकरार रहा, जहां अधिकांश ब्राह्मण मतदाताओं का झुकाव भाजपा की तरफ ही देखा गया। चुनावी सर्वे के मुताबिक, उस वर्ष भाजपा को करीब 89 प्रतिशत ब्राह्मण वोट प्राप्त हुए, जबकि समाजवादी पार्टी को मात्र 6 प्रतिशत वोटों से ही संतोष करना पड़ा था। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि पिछले दो विधानसभा चुनावों में यह पूरा वर्ग लगभग एकतरफा रूप से भाजपा के साथ खड़ा नजर आया है।
जैसे-जैसे 2027 का अगला विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, विपक्षी दल यह दावा कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार के खिलाफ ब्राह्मण समाज के एक वर्ग में असंतोष की भावना पनप रही है। विपक्ष की तरफ से यह आरोप भी समय-समय पर लगाए जाते रहे हैं कि मौजूदा सरकार में ठाकुर समुदाय को तुलनात्मक रूप से अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा से इस संभावित नाराजगी का मतलब यह कतई नहीं है कि ब्राह्मण वोटर स्वतःस्फूर्त तरीके से समाजवादी पार्टी या किसी अन्य विपक्षी दल के पाले में शिफ्ट हो जाएगा।
समाजवादी पार्टी के सामने इस समय सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती यही है कि उसके मुस्लिम तुष्टीकरण के कथित राजनीतिक रवैये को लेकर ब्राह्मण मतदाताओं के एक बड़े हिस्से में अब भी असहजता बनी हुई है। यही कारण है कि अखिलेश यादव की यह रणनीति केवल कुछ चुनिंदा ब्राह्मण सम्मेलन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे 2027 के चुनाव के मद्देनजर एक बड़े और सुनियोजित सोशल इंजीनियरिंग अभियान का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
केवल समाजवादी पार्टी ही नहीं, बल्कि बहुजन समाज पार्टी भी एक बार फिर अपने पुराने फॉर्मूले को जमीन पर उतारने की कोशिश कर रही है। मायावती एक बार फिर से वर्ष 2007 वाले अपने उस पुराने ब्राह्मण-दलित समीकरण को दोबारा मजबूत करने में जुटी हैं। पार्टी ने अपने एक प्रमुख ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा को कानूनी मामलों, मीडिया प्रबंधन और चुनाव आयोग से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी हैं। बीएसपी अच्छी तरह जानती है कि इसी सामाजिक ताने-बाने ने उन्हें अतीत में जबरदस्त सियासी फायदा पहुंचाया था।
दूसरी तरफ, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी भी इस पूरे घटनाक्रम और ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर पूरी तरह सतर्क और मुस्तैद नजर आ रही है। पार्टी ने आरएसएस के वरिष्ठ विचारक नागेंद्र नाथ त्रिपाठी को राष्ट्रीय संगठनकर्ता की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। राजनीतिक गलियारों में इस नियुक्ति को जमीनी स्तर पर पार्टी के पुराने और पारंपरिक समर्थक वर्ग के साथ अपने संपर्कों को और अधिक मजबूत करने की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
इन तमाम राजनीतिक गतिविधियों से यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश का सियासी रण सिर्फ भाजपा और विपक्ष के बीच सीधी जंग तक सीमित नहीं रहने वाला है। यह मुकाबला उससे कहीं आगे बढ़कर ब्राह्मण वोट बैंक को अपने साथ मजबूती से जोड़ने की एक खुली राजनीतिक होड़ बनता जा रहा है। अखिलेश यादव ने PDA के भीतर 'पंडित' शब्द को जोड़कर इस छिपी हुई होड़ को अब सबके सामने ला दिया है। अब आने वाला वक्त ही यह तय करेगा कि क्या ब्राह्मण मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा से छिटककर सपा या बसपा के पाले में जाता है, या फिर 2017 और 2022 की तरह भाजपा का दबदबा पूरी तरह कायम रहता है। इस बीच सुहेलभा समाज पार्टी के नेता ओपी राजभर के एक बयान ने भी सूबे की सियासत को गरमा दिया है, जिसमें उन्होंने समाजवादी पार्टी के अंदर जल्द ही बड़ी टूट होने का दावा किया है।



















