शारदीय व चैत्र नवरात्र के पावन दिनों में राजस्थान के बीकानेर जिले का देशनोक कस्बा अटूट श्रद्धा और धार्मिक उल्लास से सराबोर नजर आ रहा है। बीकानेर जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद विश्वप्रसिद्ध करणी माता मंदिर में इन दिनों देश के कोने-कोने से शीश नवाने वाले भक्तों का तांता लगा हुआ है। वैसे तो साल भर यहां श्रद्धालुओं की नियमित आवाजाही बनी रहती है, मगर नवरात्रि के नौ दिनों में भक्तों की तादाद कई गुना बढ़ जाती है। पूरे पश्चिमी राजस्थान और बीकानेर अंचल के बाशिंदों के लिए यह धाम अगाध आस्था और कुलदेवीय परंपरा का सबसे बड़ा केंद्र है। दुनिया भर में चूहों वाली देवी के नाम से पहचानी जाने वाली इस पावन पीठ की सबसे अनूठी पहचान मंदिर के भीतर स्वच्छंद घूमते हजारों चूहे हैं।
बीस हजार से अधिक काबा और सफेद चूहे के दर्शन का विशेष महात्म्य
इस पावन तीर्थ की सबसे अद्भुत बात यह है कि समूचे मंदिर प्रांगण में 20 हजार से भी अधिक चूहे बिना किसी रोक-टोक के विचरण करते हैं। स्थानीय राजस्थानी बोली में इन चूहों को आदरपूर्वक ‘काबा’ कहकर पुकारा जाता है। मंदिर आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु जगदम्बा स्वरूपा करणी माता के चरणों में नमन करने के उपरांत इन चूहों को भी श्रद्धापूर्वक भोग और प्रसाद अर्पित करता है। मान्यता है कि यदि किसी श्रद्धालु को परिसर में विचरण करते दुर्लभ सफेद चूहों के दर्शन सुलभ हो जाएं, तो उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं और इसे माता का साक्षात आशीर्वाद माना जाता है। इसी अभिलाषा में भक्त घंटों तक टकटकी लगाए सफेद काबा की एक झलक पाने का इंतजार करते हैं।
सुबह और शाम के समय जब माता की भव्य आरती संपन्न होती है, तब एक साथ अनगिनत काबा गर्भगृह और प्रांगण में बाहर निकल आते हैं, जो देखने वालों को विस्मय में डाल देता है। इस परंपरा के पीछे एक अत्यंत मार्मिक और दृढ़ लोक मान्यता जुड़ी हुई है। जनश्रुति एवं धार्मिक आस्था के अनुसार, देपावत जाति के पूर्वज अथवा वंशज अपनी देहलीला पूर्ण होने के बाद यमपुरी जाने की बजाय सीधे इस धाम में काबा यानी चूहों का चोला धारण कर माता की सेवा में वास करते हैं।
संगमरमर की नक्काशी, चांदी के विशाल किवाड़ और स्वर्णिम छत्र
काबा के अनूठे कौतुक के अलावा देशनोक मंदिर की भव्य वास्तुशिल्प भी आगंतुकों को गहरे तक प्रभावित करती है। मुख्य प्रवेश द्वार पर सफेद संगमरमर के पत्थरों पर अत्यंत बारीक और मनमोहक नक्काशी की गई है। मुख्य द्वार पर लगे भारी-भरकम चांदी के खूबसूरत किवाड़, गर्भगृह में सुशोभित माता का दिव्य स्वर्ण छत्र और चूहों को नैवेद्य परोसने के लिए रखी गई चांदी की विशालकाय परात इस मंदिर के वैभव को चार चांद लगाते हैं। नवरात्रि के पावन दिनों में इन दिव्य प्रतीकों के दर्शन मात्र से भक्तजन भावविभोर हो उठते हैं।
साढ़े छह सौ साल प्राचीन गुफा और बीकानेर रियासत की नींव
धार्मिक इतिहास के पन्नों में करणी माता को मां जगदम्बा का प्रत्यक्ष अवतार स्वीकार किया गया है। आज जहां यह गगनचुंबी और कलात्मक मंदिर विराजमान है, ठीक उसी स्थल पर करीब साढ़े छह सौ वर्ष पूर्व एक प्राकृतिक गुफा हुआ करती थी। उसी गुफा में एकांतवास करते हुए माता करणी अपने आराध्य देव की कठोर तपस्या और नित्य पूजा-अर्चना किया करती थीं।
यह ऐतिहासिक एवं पवित्र गुफा आज भी मंदिर परिसर के भीतर मूल स्वरूप में सुरक्षित है। लोकमान्यताओं के मुताबिक, जब मां करणी ज्योतिर्लीन हुईं, तब उनकी पूर्व इच्छा का सम्मान करते हुए इसी गुफा के भीतर उनकी पावन प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। इसके अतिरिक्त यह ऐतिहासिक तथ्य भी जनमानस में गहरे रचा-बसा है कि बीकानेर राज्य की ऐतिहासिक स्थापना और उसके उत्थान में मां करणी का साक्षात वरदान और आशीर्वाद ही मूल आधार रहा था। यही अद्वितीय रीति-रिवाज, अटूट आस्था और ऐतिहासिक विरासत देशनोक के इस पावन धाम को संपूर्ण विश्व में बेमिसाल बनाते हैं, जिसकी जीवंत बानगी नवरात्रि के इन पावन दिनों में साफ झलकती है।




















