सवाई माधोपुर स्थित प्रसिद्ध रणथंभौर नेशनल पार्क में जंगली जीवों के बीच अपने इलाके पर नियंत्रण को लेकर टकराव बढ़ गया है। पार्क के जोन 6 में विचरण के दौरान प्रमुख नर बाघ टी-108, जिसे आमतौर पर 'जय' के नाम से पहचाना जाता है, जख्मी हालत में देखा गया। मौके पर मौजूद वनकर्मियों ने उसके चेहरे और आसपास के हिस्सों पर गहरे घाव देखे, जिससे पूरे वन महकमे में हलचल मच गई है। प्राथमिक अनुमानों के आधार पर यह माना जा रहा है कि अपनी टेरिटरी को सुरक्षित रखने या सीमा विस्तार को लेकर किसी अन्य व्यस्क नर बाघ से उसकी तीखी झड़प हुई थी।
वन विभाग और वन्यजीव अस्पताल की टीमें अलर्ट मोड पर
बाघ के चेहरे पर चोट के निशान दिखने के तुरंत बाद वन अधिकारियों ने पूरे इलाके में चौकसी बढ़ा दी है। टाइगर रिजर्व का गश्ती दल लगातार जंगल में उसके कदमों के निशान और मूवमेंट को ट्रैक कर रहा है, ताकि उसकी शारीरिक स्थिति में आ रहे बदलावों को तुरंत दर्ज किया जा सके। इसके साथ ही वन्यजीव अस्पताल के पशु चिकित्सकों का विशेष दल भी निगरानी अभियान में शामिल हो गया है। चिकित्सा विशेषज्ञ दूर से ही जय की चाल, खान-पान और चोटों की गंभीरता का आकलन करने में जुटे हैं, जिससे जरूरत पड़ने पर उपचार का त्वरित फैसला लिया जा सके।
बाघ की हालत को लेकर रणथंभौर के डीएफओ मानस सिंह ने जानकारी दी कि वन कर्मियों का विशेष दस्ता हर पल उसकी गतिविधियों को ट्रैक कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बाघ की सेहत में किसी भी बदलाव को पकड़ने के लिए चौबीसों घंटे निगरानी रखी जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि फील्ड से लगातार आने वाले इनपुट के आधार पर ही उपचार अथवा किसी प्रकार के चिकित्सकीय हस्तक्षेप का अगला कदम उठाया जाएगा।
बढ़ते कुनबे के साथ टेरिटरी की चुनौती
रणथंभौर के घने जंगलों में बाघों के बीच अपनी निजी जमीन और शिकार के दायरे को लेकर हिंसक झड़पें होना एक प्राकृतिक व्यवहार है। नर बाघ अपने घोषित दायरे में किसी अन्य प्रतिद्वंद्वी की घुसपैठ को कतई बर्दाश्त नहीं करते और अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए जानलेवा मुकाबले तक पहुंच जाते हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में पार्क के भीतर बाघों की आबादी में हुए तेज इजाफे ने इस चुनौती को कई गुना संवेदनशील बना दिया है। सीमित भूभाग में शेरों की बढ़ती तादाद के चलते दोनों पक्षों के बीच बार-बार सीमा विवाद छिड़ रहे हैं।
इस तरह के हिंसक संघर्षों के कारण कई बार ताकतवर बाघ भी गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। ऐसी जटिल परिस्थितियों में वन विभाग के कंधों पर प्रत्येक वन्यजीव की सुरक्षा तय करने और उनके आपसी टकरावों को न्यूनतम रखने की दोहरी जिम्मेदारी आ जाती है। रिजर्व प्रशासन को यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि घायल बाघ संक्रमण या कमजोरी का शिकार न बने।
बाघ टी-108 'जय' की पारिवारिक पृष्ठभूमि
पार्क के गाइडों और सैलानियों के बीच खासा लोकप्रिय टी-108 वास्तव में रणथंभौर के इतिहास के दो दिग्गज बाघों का वंशज है। वह विख्यात बाघिन टी-8 'लाडली' और नर बाघ टी-34 'कुंभा' की संतान है। जंगलात के रिकॉर्ड के मुताबिक जय का मुख्य प्रभाव क्षेत्र जोन 6 से लेकर जोन 10 तक के विशाल भूभाग में फैला हुआ है। अपने इसी विस्तृत इलाके में दबदबा कायम रखने के दौरान वह घायल हुआ है। प्रशासनिक तंत्र पूरी सावधानी के साथ उसके स्वास्थ्य पर केंद्रित है ताकि इस ताकतवर नर बाघ की सुरक्षा पुख्ता रखी जा सके।


















