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अरावली पहाड़ियों में अनूठा रक्षाबंधन, 14 किलोमीटर दूर स्थित मंदिर पहुंचती है जीण माता की राखीराजस्थान
28 अग॰ 2026, 7:41 pm (2 घंटे पहले)· 2

अरावली पहाड़ियों में अनूठा रक्षाबंधन, 14 किलोमीटर दूर स्थित मंदिर पहुंचती है जीण माता की राखी

रक्षाबंधन पर सीकर की अरावली पहाड़ियों में स्थित जीण माता मंदिर से 14 किलोमीटर दूर हर्ष पर्वत पर स्थित हर्षनाथ भैरव मंदिर तक विशेष राखी ले जाई जाती है। भाई और बहन के इस अलौकिक रिश्ते से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और लोककथाएं आज भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र हैं।

राजस्थान के सीकर जिले में रक्षाबंधन के पावन पर्व पर भाई और बहन के रिश्ते का एक अत्यंत दुर्लभ और अद्भुत रूप देखने को मिलता है। जहां देश भर में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं, वहीं अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित सिद्ध पीठ जीण माता मंदिर और हर्षनाथ भैरव मंदिर के बीच एक अनूठी परंपरा सदियों से निभाई जा रही है। इस विशेष दिन पर बहन के स्वरूप में पूजी जाने वाली जीण माता की ओर से उनके भाई हर्षनाथ भैरव को रक्षा सूत्र भेजा जाता है। मंदिर के पुजारी जीण माता के दरबार में तैयार की गई खास राखी को लेकर लगभग 14 किलोमीटर लंबे पहाड़ी रास्ते से होकर हर्ष पर्वत की चोटी पर स्थित मंदिर तक पहुंचते हैं और भैरव देव को राखी बांधते हैं।

सुबह की विशेष पूजा और 14 किलोमीटर का पैदल सफर

रक्षाबंधन के अवसर पर जीण माता मंदिर परिसर में प्रातः काल से ही धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-अर्चना का दौर आरंभ हो जाता है। सबसे पहले जीण माता का भव्य श्रृंगार किया जाता है और विशेष पूजा संपन्न की जाती है। इसके पश्चात मंदिर के पुजारी अपने हाथों से तैयार की गई कई फीट लंबी राखी को गर्भगृह में माता के श्री चरणों में अर्पित करते हैं। गर्भगृह में विधि-विधान से पूजन के बाद इसी पावन राखी को हर्ष पर्वत के लिए रवाना किया जाता है। ढोल-नगाड़ों की गूंज, गाजे-बाजे और माता के जयकारों के बीच पुजारी जीण माता मंदिर से प्रस्थान करते हैं। यह यात्रा अरावली के दुर्गम और पथरीले पहाड़ी रास्तों से होती हुई करीब 14 किलोमीटर की दूरी तय करके हर्ष पर्वत के शिखर पर स्थित हर्षनाथ भैरव मंदिर पहुंचती है।

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हर्ष पर्वत पर राखी समर्पण और श्रद्धालुओं की मान्यता

हर्ष पर्वत पर स्थित हर्षनाथ भैरव मंदिर पहुंचने पर वहां के पुजारी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। इसके बाद जीण माता के दरबार से लाई गई राखी को हर्षनाथ भैरव की कलाई पर विधिपूर्वक बांधा जाता है। राखी बांधने के उपरांत मंदिर में भव्य आरती आयोजित की जाती है। इस अलौकिक दृश्य के साक्षी बनने के लिए मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में भाई-बहन और दूर-दराज से आए श्रद्धालु एकत्र होते हैं। जनमानस में यह दृढ़ विश्वास है कि रक्षाबंधन के दिन जीण माता और हर्षनाथ भैरव के एक साथ दर्शन करने से भाइयों और बहनों के बीच प्रेम का बंधन मजबूत होता है तथा आपसी मनमुटाव व दूरियां समाप्त हो जाती हैं।

चूरू के घांघू गांव से जुड़ी लोककथा

जीण माता और हर्षनाथ भैरव के भाई-बहन के इस पावन संबंध के पीछे एक अत्यंत लोकप्रिय एवं प्राचीन लोककथा जुड़ी हुई है। जनश्रुति के अनुसार जीण माता और उनके भाई हर्ष का जन्म राजस्थान के चूरू जिले के घांघू गांव में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण बड़े भाई हर्ष ने अपनी छोटी बहन जीण का लालन-पालन अत्यधिक स्नेह और जिम्मेदारी के साथ किया। समय बीतने पर जब हर्ष का विवाह हो गया, तो भाई और बहन के बीच के प्रगाढ़ स्नेह को देखकर हर्ष की पत्नी के मन में असंतोष और नाराजगी रहने लगी। एक दिन पारिवारिक विवाद के बाद जीण उदास होकर अपना घर छोड़कर सीकर की पहाड़ियों में चली गईं और कठिन तपस्या में लीन हो गईं। बहन को ढूंढते हुए भाई हर्ष भी उनके पीछे-पीछे पहाड़ों तक पहुंच गए।

वरदान से देव स्वरूप और औरंगज़ेब के हमले की गाथा

वर्षों तक चली कठोर तपस्या के उपरांत देवी दुर्गा ने प्रकट होकर जीण को दिव्य देवी होने का वरदान प्रदान किया, जबकि भगवान शिव ने हर्ष को भैरव रूप में पूजे जाने का आशीर्वाद दिया। इस अलौकिक घटना के बाद से ही दोनों स्थानों पर जीण माता और हर्षनाथ भैरव के रूप में पूजा-अर्चना आरंभ हुई और दोनों मंदिर भाई-बहन के अटूट रिश्ते के प्रतीक बन गए। इसी पौराणिक मान्यता के सम्मान में हर साल रक्षाबंधन पर यह विशेष राखी भेजी जाती है। इसके अतिरिक्त, इस स्थान से एक ऐतिहासिक घटना भी जुड़ी है। मुगल शासक औरंगज़ेब ने हर्ष पर्वत पर स्थित एक हज़ार साल पुराने शिव मंदिर सहित आसपास के कई मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था। इसके बाद जब औरंगज़ेब की सेना ने जीण माता मंदिर पर आक्रमण करने का प्रयास किया, तो माता ने दिव्य मधुमक्खियों की सेना भेजकर मंदिर की रक्षा की। मधुमक्खियों के भीषण हमले से घबराकर औरंगज़ेब की सेना मैदान छोड़कर भाग खड़ी हुई। स्थानीय निवासियों का आज भी मानना है कि इस पवित्र सिद्ध पीठ की सुरक्षा स्वयं वे दिव्य मधुमक्खियां ही करती हैं।

सवाल-जवाब

जीण माता मंदिर और हर्षनाथ भैरव मंदिर कहां स्थित हैं?
ये दोनों प्रसिद्ध मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में अरावली पर्वत श्रृंखला की पहाड़ियों पर स्थित हैं।
जीण माता मंदिर से हर्षनाथ मंदिर तक राखी कैसे पहुंचती है?
रक्षाबंधन के दिन जीण माता मंदिर के पुजारी हाथ से तैयार कई फीट लंबी राखी लेकर लगभग 14 किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता तय करके हर्ष पर्वत की चोटी पर स्थित मंदिर पहुंचते हैं।
जीण माता और हर्षनाथ भैरव का आपस में क्या संबंध है?
लोकमान्यता के अनुसार जीण माता और हर्षनाथ भैरव चूरू के घांघू गांव के रहने वाले भाई-बहन थे, जिन्हें तपस्या के बाद क्रमशः देवी और भैरव का स्वरूप मिला।
जीण माता मंदिर से जुड़ी औरंगज़ेब की ऐतिहासिक घटना क्या है?
औरंगज़ेब द्वारा हर्ष पर्वत के मंदिरों को तोड़ने के बाद जब जीण माता मंदिर पर हमला किया गया, तो दिव्य मधुमक्खियों की सेना ने उसकी सेना को खदेड़ दिया था।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·34 मिनट पहले

अरावली पहाड़ियों में जीण माता और हर्षनाथ भैरव मंदिर के बीच की यह 14 किलोमीटर लंबी धार्मिक यात्रा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन के लिए भी एक संवेदनशील आयोजन है। भारी भीड़ और दुर्गम पहाड़ी रास्तों के कारण इस प्रकार के बड़े मेलों में सुरक्षा प्रबंधों, भीड़ नियंत्रण और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की पुख्ता व्यवस्था करना स्थानीय प्रशासन के समक्ष एक बड़ी चुनौती रहता है।

Rohan Verma@rohan-verma·34 मिनट पहले

अरावली की इन पहाड़ियों में उमड़ने वाली भारी भीड़ और 14 किलोमीटर लंबे दुर्गम रास्तों पर सुरक्षा व भीड़ प्रबंधन पुलिस और प्रशासन के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होता है। इस तरह के मेलों में ट्रैफिक नियंत्रण और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं को चाक-चौबंद रखना अनिवार्य है, ताकि किसी भी अनहोनी से बचा जा सके और इस सांस्कृतिक आयोजन का संचालन शांतिपूर्ण ढंग से पूरा हो सके।

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