राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव का बिगुल बजते ही राज्य का सियासी पारा तेजी से चढ़ गया है। आगामी 11 सितंबर को होने वाले निकाय चुनाव के मतदान से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी की चुनावी राह कठिन होती नजर आ रही है। राजपूत करणी सेना की अगुवाई वाले स्वर्ण न्याय मंच ने सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ खुला मोर्चा खोलते हुए 'कमल का फूल हमारी भूल' नामक एक व्यापक अभियान चलाने की घोषणा कर दी है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से जुड़े मुद्दे पर सरकार की कार्यशैली और कथित वादाखिलाफी से नाराज इस मंच ने निकाय चुनावों में बीजेपी के विरोध में उतरने का पूरा खाका तैयार कर लिया है।
घर-घर जाकर बीजेपी के खिलाफ जनसंपर्क की तैयारी
स्वर्ण न्याय मंच की नई चुनावी रणनीति के तहत संगठन के कार्यकर्ता और पदाधिकारी राज्य भर के नगरीय निकायों के विभिन्न वार्डों में घर-घर जाकर सीधा जनसंपर्क साधेंगे। राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष महिपाल मकराना ने इस अभियान की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए बताया कि मंच से जुड़े लोग आम मतदाताओं के द्वार तक पहुंचेंगे और उनसे बीजेपी प्रत्याशियों के पक्ष में मतदान न करने की अपील करेंगे। संगठन का स्पष्ट रूप से कहना है कि यूजीसी से जुड़े मामले में बीजेपी सरकार ने उनके समुदाय और हितों के साथ धोखा किया है, इसलिए इस जन-आक्रोश को चुनाव के जरिए जनता के सामने ले जाना बेहद जरूरी हो गया है।
लिखित शपथ पत्र देने वाले उम्मीदवारों को ही समर्थन
स्वर्ण न्याय मंच ने इस चुनाव में किसी भी पारंपरिक राजनीतिक दल के सभी प्रत्याशियों का आंख मूंदकर समर्थन करने से साफ इनकार कर दिया है। महिपाल मकराना के अनुसार, मंच का समर्थन केवल उन्हीं विशिष्ट उम्मीदवारों को प्राप्त होगा जो यूजीसी प्रावधानों को वापस लेने (रोल बैक) के मुद्दे पर एक स्पष्ट और लिखित शपथ पत्र देंगे। जो भी प्रत्याशी इस मुद्दे पर अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करते हुए लिखित प्रतिबद्धता दर्शाएगा, मंच उसी की उम्मीदवारी पर विचार करेगा। इसके अतिरिक्त, यदि किसी क्षेत्र में दलगत उम्मीदवार इस शर्त पर सहमत नहीं होते हैं, तो मंच ने उन स्थानों पर अपने स्वतंत्र निर्दलीय प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतारने का विकल्प भी खुला रखा है।
उच्च जातियों के प्रमुख संगठनों का बड़ा गठबंधन
नगरीय निकाय चुनाव में स्वर्ण न्याय मंच की इस सीधी चुनौती को राजनीतिक दृष्टि से काफी संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह मंच मुख्य रूप से अगड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक बड़ा सांझा मोर्चा है, जिसमें राजपूत करणी सेना के साथ-साथ परशुराम सेना और ब्राह्मण महासभा जैसे प्रभावशाली सामाजिक-राजनीतिक संगठन सक्रिय रूप से शामिल हैं। राजस्थान के कई शहरी क्षेत्रों और विशिष्ट स्थानीय निकायों में इन संगठनों का पारंपरिक रूप से मजबूत सामाजिक जनाधार और प्रभाव है। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले इनका बीजेपी के खिलाफ खुलकर घर-घर अभियान चलाना पार्टी के वोट बैंक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
जयपुर लाठीचार्ज और पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग
नीतिगत असंतोष के अलावा, स्वर्ण न्याय मंच की नाराजगी का एक बड़ा कारण जयपुर में आयोजित उनकी रैली के दौरान हुआ लाठीचार्ज भी है। महिपाल मकराना ने इस घटना का उल्लेख करते हुए प्रशासनिक रवैये पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जयपुर रैली के दौरान प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ राज्य प्रशासन ने अभी तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की है। पुलिस अधिकारियों पर अब तक कार्रवाई न होने से मंच से जुड़े कार्यकर्ताओं और समर्थकों में गहरा रोष व्याप्त है, जिसे वे इस चुनाव में एक प्रमुख मुद्दे के रूप में जनता के सामने उठा रहे हैं।
11 सितंबर के मतदान पर टिकीं राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें
आगामी 11 सितंबर को राजस्थान में निकाय चुनाव के लिए वोट डाले जाने हैं, और स्वर्ण न्याय मंच के इस आक्रामक कदम के बाद चुनावी मुकाबले का गणित काफी दिलचस्प हो गया है। मंच ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी मांगों को लेकर किसी भी स्थिति में पीछे हटने वाले नहीं हैं और लिखित शपथ पत्र तथा निर्दलीय उम्मीदवारों के जरिए अपनी बात मजबूती से रखेंगे। अब राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता की निगाहें 11 सितंबर के मतदान पर टिकी हुई हैं कि इस 'कमल का फूल हमारी भूल' अभियान का निकाय चुनाव के नतीजों पर कितना असर पड़ता है।





















