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बाड़मेर के गांवों में गोबर से बन रही रसोई गैस, एलपीजी और लकड़ी के धुएं से मिली बड़ी राहतराजस्थान
22 सित॰ 2026, 11:10 am (46 मिनट पहले)· 0

बाड़मेर के गांवों में गोबर से बन रही रसोई गैस, एलपीजी और लकड़ी के धुएं से मिली बड़ी राहत

राजस्थान के बाड़मेर जिले में मवेशियों के गोबर से बायोगैस बनाकर ग्रामीण अपनी रसोई चला रहे हैं, जिससे एलपीजी सिलेंडर के खर्च और चूल्हे के धुएं दोनों से छुटकारा मिला है।

राजस्थान के बाड़मेर जिले के ग्रामीण इलाकों में अब मवेशियों का गोबर घरों के लिए स्वच्छ ईंधन का सबसे बड़ा जरिया बन रहा है। जिन पशु अपशिष्टों को लोग लंबे समय तक अनुपयोगी मानते थे, अब उन्हीं से बायोगैस संयंत्रों के जरिए रसोई गैस तैयार की जा रही है। इस स्थानीय व्यवस्था से ग्रामीणों की बाजार से मिलने वाले एलपीजी सिलेंडरों पर निर्भरता काफी हद तक कम हो गई है। इसके साथ ही घरों में लकड़ी और उपलों वाले चूल्हों से उठने वाले दमघोंटू धुएं की समस्या भी खत्म होने लगी है, जिससे ग्रामीण परिवेश की महिलाओं को खाना पकाने में आसानी हो रही है।

रसोई के बजट और स्वास्थ्य को मिला दोहरा फायदा

पारंपरिक मिट्टी के चूल्हों पर भोजन बनाते समय महिलाओं को घंटों तक जहरीले धुएं के बीच बैठना पड़ता था, जिसके कारण आंखों में तेज जलन और सांस से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। बायोगैस प्रणाली के आने से इस तरह की रोजमर्रा की तकलीफों से निजात मिली है। दूसरी तरफ, बाजार में एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी सीधे घरेलू आर्थिक संतुलन को बिगाड़ती थी। गोबर से बनने वाली गैस पर निर्भरता बढ़ने के बाद परिवारों को न तो बार-बार नया सिलेंडर भरवाने की चिंता सताती है और न ही चूल्हे की कालिख साफ करनी पड़ती है। सुरक्षा के लिहाज से भी ग्रामीणों को यह तरीका ज्यादा निश्चिंत करता है, क्योंकि इसमें सिलेंडर विस्फोट या अनियंत्रित आग लगने जैसा खतरा न के बराबर रहता है।

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बाड़मेर के इन इलाकों में तेजी से लग रहे हैं संयंत्र

जिले के अनेक ग्रामीण कस्बों और बस्तियों में इस देसी तकनीक को अपनाकर प्लांट स्थापित किए गए हैं। बाड़मेर जिले के भीतर कितनोरिया, धनाऊ, सेड़वा, बाड़मेर मुख्यालय क्षेत्र, जानपालिया, बाखासर, चौहटन, आलमसर और धोरीमन्ना सहित दर्जनों क्षेत्रों में परिवारों ने अपने घरों के आसपास बायोगैस संयंत्र लगाए हैं। इन सभी स्थानों पर पशुपालक परिवार अपनी गायों और भैंसों के गोबर का सदुपयोग करके नियमित रूप से गैस पैदा कर रहे हैं, जिससे पूरे गांव में स्वच्छ ईंधन का एक नया विकल्प तैयार हो रहा है।

टैंक में कैसे बनती है मीथेन युक्त बायोगैस

इस पूरी प्रणाली की कार्यप्रणाली बेहद सीधी और पर्यावरण के अनुकूल है। एक बंद प्लास्टिक टैंक के भीतर गोबर को सामान्य पानी के साथ अच्छी तरह घोलकर डाला जाता है। इस टैंक के अंदर ऑक्सीजन पूरी तरह से बंद रहती है, जिससे वहां मौजूद सूक्ष्मजीव सक्रिय हो जाते हैं और मिश्रण का विघटन शुरू कर देते हैं। इस प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया से मीथेन युक्त ज्वलनशील बायोगैस पैदा होती है। इसके बाद टैंक से पाइपलाइन को सीधे घर की रसोई तक जोड़ दिया जाता है, जहां बर्नर जलाकर परिवार के लिए दोनों समय का भोजन आसानी से तैयार किया जाता है।

संगीता का अनुभव और रोजमर्रा की जिंदगी में बदलाव

जानपालिया गांव की रहने वाली संगीता का कहना है कि पहले जब वे लकड़ियों और उपलों के सहारे चूल्हा जलाती थीं, तब चारों तरफ फैलने वाले धुएं से आंखों में अत्यधिक जलन होती थी और काम करना दूभर हो जाता था। इसके बाद एलपीजी के उपयोग के दौरान बढ़ती दरों ने घर के सामान्य मासिक बजट को प्रभावित किया। हालांकि अब गाय और भैंस के गोबर से संचालित बायोगैस प्लांट लगने से बेहद मामूली खर्च पर पूरे परिवार का भोजन बन रहा है। उनका यह भी मानना है कि इस व्यवस्था में सिलेंडर फटने अथवा आकस्मिक आगजनी जैसी दुर्घटनाओं की कोई आशंका नहीं रहती, जिससे रसोई का काम पूरी तरह सुरक्षित हो गया है।

सवाल-जवाब

बाड़मेर में गोबर से बायोगैस कैसे बनाई जा रही है?
गोबर और पानी को मिलाकर एक बंद प्लास्टिक टैंक में डाला जाता है, जहां ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में सूक्ष्मजीव इसे विघटित कर मीथेन गैस बनाते हैं।
बाड़मेर जिले के किन प्रमुख क्षेत्रों में बायोगैस संयंत्र लगे हैं?
कितनोरिया, धनाऊ, सेड़वा, बाड़मेर, जानपालिया, बाखासर, चौहटन, आलमसर और धोरीमन्ना सहित कई कस्बों में यह संयंत्र लगाए गए हैं।
बायोगैस के इस्तेमाल से महिलाओं को क्या फायदा हुआ है?
महिलाओं को चूल्हे के धुएं और आंखों की जलन से राहत मिली है और एलपीजी सिलेंडर पर होने वाले भारी खर्च से भी छुटकारा मिला है।
क्या बायोगैस प्रणाली को एलपीजी की तुलना में सुरक्षित माना जाता है?
हां, ग्रामीणों के अनुसार इसमें एलपीजी सिलेंडर के फटने या अनियंत्रित आग लगने जैसी दुर्घटनाओं का खतरा नहीं रहता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 मिनट पहले

जानपालिया की संगीता की बात सही लगी, चूल्हे के धुएं से आंख और सांस की दिक्कत कितनी आम है ये ग्रामीण महिलाएं ही जानती हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·8 मिनट पहले

अ अर्जुन जी, बात सही है पर हर जगह गोबर गैस प्लांट लग पाना उतना आसान नहीं लगता जितना बताया जा रहा है।

Rohan Verma@rohan-verma·29 मिनट पहले

बाड़मेर जैसे रेगिस्तानी इलाकों में गोबर गैस से रसोई चलना वाकई कमाल है। इससे महंगाई और धुएं दोनों से राहत मिल रही है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·29 मिनट पहले

रोहन भाई, बात तो सही है पर रेगिस्तान में गर्मियों के दौरान पानी की कमी से इन प्लांट्स का चलना क्या वाकई इतना आसान होगा?

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