राजस्थान के भरतपुर जिले में कृषि के तौर-तरीकों में एक उपयोगी बदलाव देखने को मिल रहा है। इलाके के काश्तकार अब केवल अपनी पारंपरिक फसलों पर ही निर्भर नहीं हैं, बल्कि वे ऐसी बहुउपयोगी फसलों की तरफ तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं जो खेती के बढ़ते खर्च को घटाने के साथ-साथ परिवार के लिए आमदनी के नए साधन भी तैयार कर सकें। इसी कड़ी में डैचा की फसल स्थानीय किसानों के बीच एक बेहद कारगर और व्यावहारिक विकल्प बनकर उभरी है। जिले के तमाम ग्रामीण हिस्सों में किसानों ने मुख्य फसलों के साथ बड़े पैमाने पर डैचा बोया है, जो इस समय पूरी तरह पकने के करीब पहुंच चुका है और खेतों में इसकी कटाई का काम जोरों पर चल रहा है।
हरी खाद के रूप में मिट्टी की सेहत सुधारने का जरिया
डैचा की खेती की सबसे अहम खासियत इसकी बहुआयामी उपयोगिता है। फसल जब हरी अवस्था में होती है, तब किसान इसे सीधे मिट्टी में जुताई करके मिला देते हैं, जिससे यह प्राकृतिक और जैविक खाद का काम करती है। यह प्रक्रिया भूमि में जैविक तत्वों की मात्रा को तेजी से बढ़ाती है और खेतों की उर्वरा शक्ति को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करती है। रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने और जमीन की उपजाऊ क्षमता को प्राकृतिक ढंग से बेहतर बनाने के लिए स्थानीय काश्तकार डैचा को हरी खाद के रूप में काफी महत्व दे रहे हैं।
घरेलू ईंधन की बचत और चूल्हे का सहारा
खेत में खाद बनाने के अलावा जब डैचा के पौधे बड़े होकर पूरी तरह पक जाते हैं, तो उनका डंठल और सूखी लकड़ियां भी किसानों के बड़े काम आती हैं। ग्रामीण अंचलों में परिवार इन मजबूत सूखी लकड़ियों का इस्तेमाल खाना पकाने और अन्य घरेलू जरूरतों के लिए ईंधन के रूप में करते हैं। इससे ग्रामीणों को बाजार से अलग से ईंधन या लकड़ी खरीदने के भारी-भरकम खर्च से सीधी राहत मिलती है और घर के बजट में बचत होती है।
बाजार में बीज बेचकर मिल रहा अतिरिक्त मुनाफा
डैचा की फलियां तैयार होने के बाद किसानों के लिए सीधी नकदी कमाने का रास्ता खोलती हैं। कटाई के बाद किसान इन फलियों से बीज अलग करते हैं और उन्हें बाजार में ले जाकर बेचते हैं। बाजरा जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की आमदनी के साथ-साथ इन बीजों की बिक्री से किसानों के हाथ में अतिरिक्त नकदी आ जाती है। खेतों की मिट्टी को मजबूत बनाने, घर का ईंधन जुटाने और बाजार से आय देने की इन्हीं खूबियों के चलते भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में किसान डैचा को एक बेहद फायदेमंद और मजबूत फसल विकल्प के रूप में अपना रहे हैं।

















