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भरतपुर के खेतों में डैचा की फसल से तीनतरफा लाभ, जमीन की सेहत सुधरने के साथ मिल रही अतिरिक्त कमाईराजस्थान
3 अक्तू॰ 2026, 8:28 pm (57 मिनट पहले)· 0

भरतपुर के खेतों में डैचा की फसल से तीनतरफा लाभ, जमीन की सेहत सुधरने के साथ मिल रही अतिरिक्त कमाई

भरतपुर जिले में किसान पारंपरिक फसलों के साथ डैचा उगाकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, घरेलू ईंधन जुटाने और बाजार में बीज बेचकर अतिरिक्त मुनाफा कमाने में जुटे हैं।

राजस्थान के भरतपुर जिले में कृषि के तौर-तरीकों में एक उपयोगी बदलाव देखने को मिल रहा है। इलाके के काश्तकार अब केवल अपनी पारंपरिक फसलों पर ही निर्भर नहीं हैं, बल्कि वे ऐसी बहुउपयोगी फसलों की तरफ तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं जो खेती के बढ़ते खर्च को घटाने के साथ-साथ परिवार के लिए आमदनी के नए साधन भी तैयार कर सकें। इसी कड़ी में डैचा की फसल स्थानीय किसानों के बीच एक बेहद कारगर और व्यावहारिक विकल्प बनकर उभरी है। जिले के तमाम ग्रामीण हिस्सों में किसानों ने मुख्य फसलों के साथ बड़े पैमाने पर डैचा बोया है, जो इस समय पूरी तरह पकने के करीब पहुंच चुका है और खेतों में इसकी कटाई का काम जोरों पर चल रहा है।

हरी खाद के रूप में मिट्टी की सेहत सुधारने का जरिया

डैचा की खेती की सबसे अहम खासियत इसकी बहुआयामी उपयोगिता है। फसल जब हरी अवस्था में होती है, तब किसान इसे सीधे मिट्टी में जुताई करके मिला देते हैं, जिससे यह प्राकृतिक और जैविक खाद का काम करती है। यह प्रक्रिया भूमि में जैविक तत्वों की मात्रा को तेजी से बढ़ाती है और खेतों की उर्वरा शक्ति को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करती है। रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने और जमीन की उपजाऊ क्षमता को प्राकृतिक ढंग से बेहतर बनाने के लिए स्थानीय काश्तकार डैचा को हरी खाद के रूप में काफी महत्व दे रहे हैं।

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घरेलू ईंधन की बचत और चूल्हे का सहारा

खेत में खाद बनाने के अलावा जब डैचा के पौधे बड़े होकर पूरी तरह पक जाते हैं, तो उनका डंठल और सूखी लकड़ियां भी किसानों के बड़े काम आती हैं। ग्रामीण अंचलों में परिवार इन मजबूत सूखी लकड़ियों का इस्तेमाल खाना पकाने और अन्य घरेलू जरूरतों के लिए ईंधन के रूप में करते हैं। इससे ग्रामीणों को बाजार से अलग से ईंधन या लकड़ी खरीदने के भारी-भरकम खर्च से सीधी राहत मिलती है और घर के बजट में बचत होती है।

बाजार में बीज बेचकर मिल रहा अतिरिक्त मुनाफा

डैचा की फलियां तैयार होने के बाद किसानों के लिए सीधी नकदी कमाने का रास्ता खोलती हैं। कटाई के बाद किसान इन फलियों से बीज अलग करते हैं और उन्हें बाजार में ले जाकर बेचते हैं। बाजरा जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की आमदनी के साथ-साथ इन बीजों की बिक्री से किसानों के हाथ में अतिरिक्त नकदी आ जाती है। खेतों की मिट्टी को मजबूत बनाने, घर का ईंधन जुटाने और बाजार से आय देने की इन्हीं खूबियों के चलते भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में किसान डैचा को एक बेहद फायदेमंद और मजबूत फसल विकल्प के रूप में अपना रहे हैं।

सवाल-जवाब

भरतपुर में किसान पारंपरिक फसलों के साथ डैचा क्यों उगा रहे हैं?
किसान खेती की लागत कम करने, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और घरेलू ईंधन व बीज बेचकर अतिरिक्त कमाई हासिल करने के लिए डैचा उगा रहे हैं।
डैचा की फसल से मिट्टी को क्या लाभ होता है?
डैचा की हरी फसल को खेत में जुताई कर मिलाने से जैविक खाद बनती है, जो मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाकर खेत की उपजाऊ क्षमता में सुधार करती है।
डैचा के पकने के बाद किसान इसकी लकड़ियों का क्या करते हैं?
पौधे पकने के बाद किसान सूखी लकड़ियों का उपयोग घरेलू ईंधन के रूप में करते हैं, जिससे बाजार से ईंधन खरीदने का खर्च बचता है।
डैचा से किसानों को सीधी नकदी आमदनी कैसे मिलती है?
फसल तैयार होने के बाद किसान फलियों से बीज निकालकर बाजार में बेचते हैं, जिससे उन्हें मुख्य फसल के अतिरिक्त मुनाफा मिलता है।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·22 मिनट पहले

भरतपुर के किसानों का यह तरीका कमाल का है। जमीन सुधरती है, चूल्हे के लिए लकड़ी मिल जाती है और बीज बेचकर अलग से कमाई भी हो जाती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·21 मिनट पहले

रोहन भाई, बात तो सही है पर इतनी आसानी से सब मान लूँ? खेती में लागत और मेहनत इतनी होती है कि सिर्फ बीज बेचने से सचमुच कितना मुनाफा बचता होगा, इस पर थोड़ा शक है।

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