राजस्थान के धौलपुर जिले से गुजरने वाली चंबल नदी का इतिहास कभी बागियों और डाकुओं के आतंक से जुड़ा हुआ था। लेकिन आज समय बदल चुका है और यह नदी दुनिया के सामने वन्यजीव संरक्षण की एक बेहद अनूठी और खूबसूरत मिसाल बनकर उभरी है। इन दिनों चंबल के किनारे किसी बड़े जश्न के मैदान जैसे नजर आ रहे हैं, जहां चारों तरफ जिंदगी चहक रही है। नदी के सुरक्षित तटों पर हजारों की संख्या में नन्हे घड़ियाल अपने अंडों से बाहर आ चुके हैं। पानी की हल्की लहरों के बीच अपनी मां के साथ अठखेलियां करते इन मासूम जीवों का नजारा बेहद मनमोहक है। पहली बार तैरने की कोशिश कर रहे इन नन्हे शावकों का अपनी मां की थूथन और विशाल पीठ पर सवारी करना देश और दुनिया के पर्यटकों के लिए एक अद्भुत अनुभव बन गया है। यह दुर्लभ दृश्य यह साफ दिखाता है कि चंबल का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र अब पहले से कहीं अधिक स्वस्थ और सुरक्षित हो चुका है।
सामुदायिक मातृत्व की अनोखी मिसाल
चंबल अभयारण्य से सामने आई इस वन्यजीव गतिविधि में सबसे ज्यादा हैरान करने वाला पहलू घड़ियालों का आपसी तालमेल है। मादा घड़ियाल केवल अपने खुद के बच्चों की ही नहीं, बल्कि नदी में मौजूद अन्य मादाओं के बच्चों की भी उतनी ही ममता और जिम्मेदारी से देखभाल कर रही हैं। नदी के अलग-अलग कोनों में यह अद्भुत नजारा आम हो गया है जहां एक अकेली मादा घड़ियाल अपनी पीठ पर दर्जनों नन्हे बच्चों को लादकर पानी में तैरती दिखाई देती है। वह इन बच्चों को नदी के एक किनारे से दूसरे सुरक्षित छोर तक पहुंचाती है। चूंकि ये नवजात घड़ियाल अभी तैरने की कला में पूरी तरह निपुण नहीं हैं, इसलिए पानी के तेज और खतरनाक बहाव से बचाने के लिए मां की पीठ ही उनका सबसे बड़ा सहारा बनती है। इसके साथ ही वह उन्हें शिकार करने और पानी में सुरक्षित रहने के तरीके भी सिखा रही है। यही कारण है कि अपने शुरुआती जीवन में ये बच्चे अपनी रक्षक मां से एक पल के लिए भी जुदा नहीं होते।
धौलपुर की नेस्टिंग साइटों पर रिकॉर्ड हैचिंग
वन विभाग से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार, धौलपुर जिले में घड़ियालों के अंडों से बच्चों के बाहर आने की वार्षिक हैचिंग प्रक्रिया अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। इस साल विभिन्न संरक्षित नेस्टिंग साइटों पर एक साथ दो हजार से अधिक नन्हे घड़ियालों का जन्म दर्ज किया गया है, जो अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में घड़ियालों की आबादी बढ़ाने का यह सफर आसान नहीं था। इसके लिए वन विभाग के मैदानी कर्मचारियों और अधिकारियों ने पिछले कई महीनों से दिन-रात एक कर रखा था। अंडों को सुरक्षित रखने के लिए चौबीसों घंटे कड़ी चौकसी की किया गया ताकि उन्हें जंगली सूअरों, आवारा मवेशियों, गीदड़ों और रेत का अवैध कारोबार करने वाले तत्वों से बचाया जा सके।
डीएफओ आशीष व्यास ने दी अहम जानकारी
इस संरक्षण अभियान की सफलता पर बात करते हुए जिला वन अधिकारी (DFO) आशीष व्यास ने बताया कि राजस्थान की सीमा में आने वाले अंडवा पुरैनी, कठूमरा, बसई डांग और शंकरपुरा जैसे संवेदनशील इलाकों को विशेष रूप से चिन्हित किया गया था। इन शांत और सुरक्षित स्थलों पर मादा घड़ियालों ने बड़ी संख्या में अंडे दिए थे। उन्होंने बताया कि प्रकृति की अनूठी 'मदर कॉलिंग' प्रक्रिया के पूरी तरह सफल होने के बाद ये नन्हे जीव अंडों से सुरक्षित बाहर आ पाए हैं। 'मदर कॉलिंग' वह प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें अंडों के भीतर से बच्चों की आवाज सुनकर मादा घड़ियाल रेत खोदकर उन्हें बाहर निकालने में मदद करती है। इसे चंबल संरक्षण के इतिहास में एक बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबी माना जा रहा है।
चंबल नदी की सुधरती सेहत का सबसे बड़ा सबूत
पर्यावरण और वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि घड़ियाल मीठे पानी के पर्यावरण के सबसे बड़े और भरोसेमंद सूचक होते हैं। चंबल नदी में इतनी विशाल संख्या में घड़ियाल बच्चों का सुरक्षित जन्म और उनका अनुकूल वातावरण में फलना-फूलना यह साबित करता है कि नदी का पानी पूरी तरह प्रदूषण मुक्त और शुद्ध हो चुका है। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि नवजात बच्चों की सुरक्षा के लिए नदी के किनारे लगातार पेट्रोलिंग की जा रही है ताकि जब तक ये बच्चे आत्मनिर्भर न हो जाएं, इन्हें किसी भी खतरे से बचाया जा सके। इस प्रयास से आने वाले समय में चंबल में घड़ियालों का कुनबा और भी अधिक मजबूत होने की उम्मीद है।













