मणिपुर के तीन जिलों में अवैध जुए पर बड़ा एक्शन, 13 लोग हिरासत में लिए गएसंगरूर की इंसाफ रैली में बरसे राहुल गांधी, कहा पंजाब में सिर्फ नाम के मुख्यमंत्री हैं भगवंत मानअगरतला नगर निगम चुनाव: कांग्रेस ने 49 वार्डों के लिए घोषित किए उम्मीदवार, दो पर फैसला बाकीउदयपुर के दीपोत्सव मेले में कवि सम्मेलन की धूम, शैलेश लोढ़ा और दिग्गजों ने बांधा समांचुनाव आयुक्तों को मुकदमों से आजीवन सुरक्षा देने वाले कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिसदीयों को देर तक रोशन रखने में काम आएगा पारदर्शी नेल पॉलिश का यह घरेलू नुस्खाभगवंत मान सरकार ने बढ़ाया महंगाई भत्ता, पंजाब के कर्मियों और पेंशनरों को मिलेगा 53 फीसदी डीएपूर्णिया की पदयात्रा में राहुल गांधी पर बरसे हिमंता बिस्वा सरमा, हार पर रोने के बजाय संसद में बहस की दी नसीहतडाकघर की 5 साल की बचत योजना से तैयार करें 2.12 लाख का फंड, जानें निवेश और ब्याज का पूरा हिसाबराजस्थान के नाथद्वारा में घर की खिड़की पर दिखा ब्रॉन्जबैक ट्री स्नेक, जानिए इसे क्यों कहते हैं उड़ने वाला सांप
गले के कैंसर से उबरकर रामसिंह ने साथियों संग 250 बीघा बंजर भूमि पर उगाया घना जंगलराजस्थान
4 नव॰ 2026, 4:57 pm (9 मिनट पहले)· 0

गले के कैंसर से उबरकर रामसिंह ने साथियों संग 250 बीघा बंजर भूमि पर उगाया घना जंगल

हरियाणा सीमा के समीप बसे कुलोठ कलां में गले की गंभीर बीमारी से जंग जीतने वाले रामसिंह लखेरा ने बुजुर्ग साथियों के साथ मिलकर 250 बीघा सूखी जमीन पर 2 हजार पेड़ खड़े कर दिए हैं।

जीवन की सांझ में जब अधिकांश लोग विश्राम और शांत दिनचर्या चुनते हैं, उस उम्र में कुछ बुजुर्गों ने अपने हाथों से धरती का भूगोल बदलने की ठान ली। हरियाणा की सीमा से लगे कुलोठ कलां में वरिष्ठ नागरिकों के एक छोटे से समूह ने अपनी अटूट मेहनत से वह कर दिखाया जिसकी मिसाल कम ही मिलती है। जिस सूखी और वीरान पड़ी जोहड़ की जमीन पर कभी धूल उड़ती थी, आज वहां 250 बीघा क्षेत्र में दूर-दूर तक घनी हरियाली छा चुकी है। यहां लगाए गए लगभग 2 हजार पौधे अब विशालकाय वृक्ष बनकर पक्षियों को बसेरा और राहगीरों को ठंडी छांव दे रहे हैं।

गंभीर बीमारी पर विजय और जीवन को मिला नया संकल्प

इस अनूठी पर्यावरणीय क्रांति की नींव 71 वर्षीय रामसिंह लखेरा के व्यक्तिगत संघर्ष से जुड़ी है। उन्हें गले का कैंसर हो गया था, जिसके चलते उन्हें लंबे समय तक कठोर चिकित्सीय उपचार से गुजरना पड़ा। वर्ष 2008 में जब उन्होंने इस जानलेवा बीमारी को परास्त किया, तो परिवार वालों का सुझाव था कि अब वे पूरी तरह विश्राम करें और किसी भी श्रमसाध्य कार्य से दूर रहें। रामसिंह का मानना अलग था। जीवनदान मिलने के बाद उन्होंने शेष आयु को प्रकृति और सामाजिक कल्याण के लिए समर्पित करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। उन्होंने दादा केशव महाराज मंदिर से सटे जोहड़ की पथरीली बंजर भूमि को संवारने का बीड़ा उठाया और पीपल, बड़ तथा नीम के पौधे लगाने आरंभ किए।

ये भी पढ़ें

शुरुआती दौर में यह पूरी यात्रा एकाकी थी। रामसिंह स्वयं बाल्टियों से पौधों की जड़ों तक पानी पहुंचाते, उनकी सुरक्षा के प्रबंध करते और कड़ी धूप में भी उनकी सार-संभाल में लगे रहते। कुछ समय पश्चात जब उस शुष्क धरातल पर हरी कोपलें फूटने लगीं, तो उनके संकल्प को और अधिक संबल मिला।

वरिष्ठ नागरिकों की संगठित शक्ति से खड़ा हुआ जन-आंदोलन

रामसिंह की निस्वार्थ तपस्या देखकर गांव के अन्य वरिष्ठ जन भी धीरे-धीरे इस कार्य से जुड़ने लगे। वर्ष 2011 आते-आते यह प्रयास एक सामूहिक अभियान में रूपांतरित हो गया। उस समय 82 वर्षीय चिरंजीलाल स्वामी, 76 वर्ष के रामनिवास शर्मा, 72 वर्ष के प्रकाशचंद मेचू, 71 वर्षीय हरिसिंह मेचू, 65 वर्ष के शेर सिंह जांगिड़, 54 वर्षीय रघुवीर शर्मा तथा 50 वर्षीय ईश्वर मेघवाल ने आगे आकर कमान संभाली।

इन बुजुर्गों ने आपसी तालमेल से जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन किया। किसी ने गड्ढे खोदकर नए पौधे लगाने का काम संभाला, तो किसी ने आवारा पशुओं से उनकी बाड़ लगाकर रक्षा की, जबकि अन्य साथियों ने प्रतिदिन पानी देने का दायित्व निभाया। वरिष्ठ नागरिकों की इस सम्मिलित लगन का परिणाम यह निकला कि देखते ही देखते करीब 2 हजार पौधे रोपे गए। आज नीम, पीपल और बड़ के वे पौधे फल-फूलकर सघन वटवृक्ष बन चुके हैं, जहां दिनभर पक्षियों का कलरव सुनाई देता है।

ग्रामीण भामाशाह का सहयोग और मूक प्राणियों की सुध

बुजुर्गों की इस निस्वार्थ साधना को देखकर क्षेत्र के एक भामाशाह का दिल भी पसीज उठा। उन्होंने सिंचाई की गंभीर समस्या को दूर करने के लिए मंदिर परिसर के निकट एक नलकूप लगवाया। इस बोरिंग के चालू होने से पेड़ों की नियमित सिंचाई का संकट पूरी तरह समाप्त हो गया।

पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ इन बुजुर्गों ने मूक पशु-पक्षियों की प्यास बुझाने का भी प्रबंध किया। मंदिर के समीप बने पक्के जलाशय को नियमित रूप से पानी से लबालब रखा जाता है, ताकि भीषण गर्मी में वन्य जीवों और मवेशियों को भटकना न पड़े।

केश राणी जोहड़ी तक पहुंचा हरियाली का विस्तार

इस टोली का उत्साह 250 बीघा की उस पहली जमीन तक सीमित नहीं रहा। अपने अभियान का दायरा बढ़ाते हुए उन्होंने गांव की एक अन्य बंजर भूमि केश राणी जोहड़ी का रुख किया। लगभग 25 बीघा में फैली इस बंजर भूमि पर भी उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से बड़, नीम और पीपल के पौधे रोपने शुरू किए। नियमित सार-संभाल के चलते यह इलाका भी अब तेजी से हरे-भरे रूप में तब्दील हो रहा है।

कुलोठ कलां के इन वरिष्ठ नागरिकों ने यह प्रमाणित कर दिखाया है कि कुदरत को लौटाने के लिए किसी प्रशासनिक पद अथवा विपुल संसाधनों की अनिवार्यता नहीं होती, बल्कि अटूट इच्छाशक्ति और निरंतर पसीना बहाना ही सबसे बड़ा संबल होता है।

सवाल-जवाब

यह प्रेरणादायक अभियान किस गांव में चलाया जा रहा है?
यह अभियान हरियाणा सीमा के समीप स्थित कुलोठ कलां गांव में चलाया जा रहा है।
वृक्षारोपण की इस मुहिम की शुरुआत किसने और कब की थी?
इसकी शुरुआत 71 वर्षीय रामसिंह लखेरा ने वर्ष 2008 में गले के कैंसर से उबरने के बाद की थी।
बुजुर्गों ने कितनी बंजर जमीन को हरा-भरा बनाया है?
बुजुर्गों ने जोहड़ की 250 बीघा और इसके अतिरिक्त केश राणी जोहड़ी की करीब 25 बीघा बंजर जमीन को हरा-भरा किया है।
इस क्षेत्र में मुख्य रूप से कौन से पौधे लगाए गए हैं और उनकी संख्या कितनी है?
यहां बड़, पीपल और नीम के लगभग 2 हजार पौधे लगाए गए हैं जो अब बड़े पेड़ बन चुके हैं।
इस अभियान में शामिल होने वाले अन्य प्रमुख बुजुर्ग कौन हैं?
वर्ष 2011 में चिरंजीलाल स्वामी, रामनिवास शर्मा, प्रकाशचंद मेचू, हरिसिंह मेचू, शेर सिंह जांगिड़, रघुवीर शर्मा और ईश्वर मेघवाल इस अभियान से जुड़े।
पौधों की सिंचाई और पानी की व्यवस्था कैसे की गई?
एक स्थानीय भामाशाह ने मंदिर के पास बोरिंग लगवाई जिससे पेड़ों की सिंचाई और पशु-पक्षियों के लिए बने पक्के जलाशय में पानी भरा जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp