उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में खाली और बंजर पड़ी जमीन को आजीविका का सशक्त जरिया बनाकर कपकोट तहसील के बोरबलड़ गांव की दया दानू ने आत्मनिर्भरता का नया अध्याय लिखा है। एक जागरूक महिला किसान और उद्यमी के रूप में उन्होंने औषधीय वनस्पति कुटकी की पैदावार शुरू की, जिसने न केवल उनके निजी जीवन में आर्थिक स्थिरता लाई, बल्कि समूचे क्षेत्र की 400 से ज्यादा महिलाओं को स्वरोजगार की मुख्यधारा से जोड़ दिया। पहाड़ों की भौगोलिक जटिलताओं और लंबे समय से गैर-इस्तेमाल पड़ी जमीनों को उत्पादक बनाकर उन्होंने साबित कर दिखाया कि स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकता है।
बोरबलड़ से शुरू हुआ औषधीय खेती का विस्तार
कपकोट क्षेत्र के सुदूर बोरबलड़ गांव की रहने वाली दया दानू ने जब कुटकी की खेती की शुरुआत की, तब उन्होंने उन खेतों को चुना जो वर्षों से वीरान पड़े थे। पहाड़ी ढलानों और सर्द मौसम की अनुकूलता को पहचानते हुए उन्होंने औषधीय खेती को तरजीह दी। इस पहल के आगे बढ़ने के साथ ही गांव और आसपास की महिलाओं को भी उत्पादन, देखभाल और कटाई से जुड़ी गतिविधियों में भागीदार बनाया गया। अपने ही घर-आंगन में काम मिलने से ग्रामीण महिलाओं को आमदनी का नियमित जरिया मिला, जिससे वे आर्थिक रूप से सक्षम बनीं और अपने परिवारों की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हुईं।
सहयोग और सामूहिक आय में ऐतिहासिक बढ़त
दया दानू की इस मुहिम को विस्तार देने में सरकारी तंत्र और स्थानीय संस्थाओं ने भी सकारात्मक भूमिका निभाई। उद्यान विभाग और भेषज संघ के निरंतर मार्गदर्शन तथा तकनीकी सहयोग से कपकोट क्षेत्र में कुटकी की पैदावार को संस्थागत मजबूती मिली। संगठित क्लस्टर स्तर पर काम करने का बड़ा नतीजा वित्तीय आंकड़ों में भी साफ झलका। वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान कपकोट क्लस्टर से जुड़े किसानों ने कुटकी की सामूहिक बिक्री कर लगभग 65 लाख रुपये की जोरदार कमाई दर्ज की, जिसने औषधीय खेती को एक मुनाफेदार मॉडल के रूप में स्थापित कर दिया।
पलायन पर रोक और तीलू रौतेली पुरस्कार की पहचान
कुटकी की व्यवस्थित खेती ने पहाड़ के गांवों में रोजगार की कमी से होने वाले पलायन की रफ्तार को धीमा करने में भी सीधी मदद की है। बंजर जमीन के उपयोग में आने से स्थानीय स्तर पर खेती का रकबा बढ़ा और महिलाओं के हाथों में सीधे आर्थिक ताकत आई। ग्रामीण स्वावलंबन और महिला सशक्तीकरण के इस अनुकरणीय मॉडल को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने अगस्त 2026 में दया दानू को राज्य के प्रतिष्ठित तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित किया। वीरान ढलानों पर शुरू हुआ यह प्रयोग आज उत्तराखंड की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का बड़ा केंद्र बन चुका है।



















