झीलों की पावन नगरी उदयपुर में दीपोत्सव की रौनक अपने चरम पर पहुंच गई, जब नगर निगम परिसर में सजी सांस्कृतिक संध्या में साहित्य और काव्य की अनूठी धारा बही। मेले के सातवें दिन आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में देशभर से आए नामचीन कलमकारों ने अपनी ओजस्वी और व्यंग्य बाणों से सजी रचनाओं के जरिए श्रोताओं को आधी रात के बाद तक बांधे रखा। विशाल पांडाल में उपस्थित जनसमूह कभी गुदगुदाते हास्य पर ठहाके लगाता नजर आया, तो कभी सीमा पर डटे वीर सैनिकों के शौर्य की पंक्तियों पर पूरे जोश से झूम उठा।
समारोह की शुरुआत और जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी
काव्य निशा का विधिवत आगाज़ मां सरस्वती एवं विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की आराधना के साथ हुआ। नगर निगम के महापौर पारस सिंघवी के साथ मंचस्थ विशिष्ट अतिथियों ने पारंपरिक दीप प्रज्वलन कर इस साहित्यिक उत्सव को प्रारंभ किया। इस सांस्कृतिक आयोजन के साक्षी बनने के लिए पूर्व विधायक रामलाल शर्मा, पूर्व विधायक धर्मनारायण जोशी तथा पूर्व विधायक त्रिलोक पूर्बिया सहित शहर के अनेक गणमान्य नागरिक और प्रमुख जनप्रतिनिधि समारोह में उपस्थित रहे। मेला अधिकारी हरि सिंह देवल ने जानकारी दी कि सांझ ढलते ही शहरवासी बड़ी तादाद में कार्यक्रम स्थल पर जुटने लगे थे और कवियों के मंच पर आने से पूर्व ही पूरा परिसर खचाखच भर चुका था।
शैलेश लोढ़ा के व्यंग्य और जीवन के फलसफे
इस पूरी महफिल के केंद्र बिंदु प्रसिद्ध व्यंग्यकार और टीवी अभिनेता शैलेश लोढ़ा रहे। जैसे ही उनका नाम पुकारा गया, समूचे पंडाल ने तालियों की गूंज से उनका भव्य सत्कार किया। अपने जाने-पहचाने अंदाज में उन्होंने आम जिंदगी के छोटे-छोटे प्रसंगों, सामाजिक विसंगतियों, लुप्त होती लोक परंपराओं और दैनिक अनुभवों को छंदों में पिरोकर श्रोताओं के समक्ष पेश किया। उनकी हर एक चुटीली टिप्पणी और अर्थपूर्ण कटाक्ष पर दर्शक हंसी से लोटपोट होते रहे और लगातार दाद देते दिखे।
पारिवारिक आत्मीयता और प्रेम के तराने
दौसा से पधारे कवि संजय झाला ने पारिवारिक ताने-बाने पर आधारित मंचीय प्रस्तुति दी। उन्होंने माता-पिता के त्याग, भाई-बहन के निश्चल स्नेह और घर-परिवार में बेटियों की अहमियत को हास्य और आत्मीयता के अनूठे मेल के साथ उभारा, जिस पर श्रोताओं ने भरपूर समर्थन व्यक्त किया। इसके पश्चात हाथरस के प्रख्यात गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने अपनी रूमानी और दिल को छू लेने वाली रचनाओं से माहौल को भावविभोर कर दिया। मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों की गहराई बयां करते उनके मधुर गीतों ने श्रोताओं की आंखों को नम कर दिया।
श्रृंगार रस और राष्ट्रभक्ति का अप्रतिम संगम
नवाबों के शहर लखनऊ से आई सुप्रसिद्ध कवयित्री शशि श्रेया ने अपनी मधुर वाणी में जब श्रृंगार रस की सुकोमल कविताएं सुनाईं, तो पूरा वातावरण रूमानी अहसास से भर उठा। उनके प्रेम भरे मुक्तकों को उपस्थित साहित्य प्रेमियों ने खूब सराहा। दूसरी तरफ कोटा के ख्यातनाम ओजस्वी रचनाकार जगदीश सोलंकी ने जब भारतीय सेना के जांबाजों के अदम्य साहस और भारत माता के प्रति सैनिकों के समर्पण को मंच से ललकारा, तो श्रोता अपनी सीटों से उठ खड़े हुए। उनकी ओजस्वी वाणी के साथ ही पूरे परिसर में भारत माता की जय के गगनभेदी नारे गूंजने लगे।
मेवाड़ की माटी का स्वाभिमान और ठहाकों की विदाई
स्थानीय मेवाड़ अंचल की ऐतिहासिक गरिमा को कवि राव अजातशत्रु ने अपने काव्य पाठ से पूरी भव्यता के साथ जीवंत किया। उन्होंने वीरांगना रानी पद्मिनी के त्याग, बलिदान, जौहर और चित्तौड़गढ़ के अदम्य स्वाभिमान को याद दिलाकर मेवाड़ के ऐतिहासिक गौरव से जनता को जोड़ दिया। इसके अलावा देश की राजधानी दिल्ली से आए व्यंग्यकार चेतन चर्चित ने समकालीन परिदृश्यों पर सटीक और तीखे व्यंग्य बाण चलाकर महफिल को हंसी के फव्वारों से सराबोर कर दिया। गुलाबी ठंडक के बीच आधी रात के बाद तक चला यह बहुभाषी कवि सम्मेलन इस बार के दीपोत्सव मेले का सबसे यादगार पड़ाव साबित हुआ।


















