दिवाली के पावन अवसर पर बाजारों में आमतौर पर बड़ी और भव्य पूजा थालियों की भरमार दिखाई देती है, लेकिन राजस्थान के उदयपुर शहर में एक ऐसी असाधारण कलाकृति सामने आई है जिसने सभी को चकित कर दिया है। शहर के जाने-माने अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण शिल्पी प्रोफेसर डॉ. इकबाल सक्का ने केवल एक सेंटीमीटर आकार की चांदी की पूजा थाली गढ़ी है। इस सूक्ष्म थाली की बनावट पान के पत्ते जैसी रखी गई है और इसमें पारंपरिक दिवाली अनुष्ठान से जुड़ा हर आवश्यक सामान शामिल किया गया है। थाली में रखे गए छोटे-छोटे कलपुर्जे और सामग्रियां इतनी महीन हैं कि उन्हें केवल खुली आंखों से देख पाना असंभव सा लगता है, जिसके चलते इस पूरी कलाकृति को ठीक से निहारने के लिए आवर्धक लेंस का सहारा लेना पड़ता है।
बारीक शिल्प और सूक्ष्म सामग्रियों का अनूठा संगम
इस नन्हीं सी थाली के भीतर पारंपरिक लक्ष्मी पूजन की पूरी व्यवस्था बेहद नजाकत के साथ की गई है। थाली के मध्य में महज एक मिलीमीटर का सोने का दीया रखा गया है, जिसमें एक सूक्ष्म बत्ती भी लगाई गई है। इस दीये के साथ-साथ सोने का एक अकेला चावल, जल रखने के लिए अत्यंत छोटा कटोरा, सिंदूर अथवा कुमकुम की डिब्बी तथा एक छोटा नारियल भी सोने-चांदी से बनाया गया है। धार्मिक विधान को पूरा करने के लिए थाली में रक्षासूत्र यानी कलावा, बीच में छेद वाला सोने और चांदी का सिक्का तथा चांदी के दो छोटे-छोटे चरण चिह्न यानी पगल्या भी तराशे गए हैं। इनमें से कई वस्तुएं तो सामान्य राई के दाने से भी छोटी हैं, जो शिल्पी की एकाग्रता और सूक्ष्म कारीगरी को बयां करती हैं।
तीन दिनों का कठिन परिश्रम और कीमती धातुओं का उपयोग
प्रोफेसर डॉ. इकबाल सक्का के अनुसार, इस विशिष्ट कलाकृति को संपूर्ण रूप देने में उन्हें लगभग तीन दिन का लगातार समय लगा। इस पूरे निर्माण कार्य में आधा ग्राम चांदी और आधा ग्राम सोने का उपयोग हुआ है। डॉ. सक्का के नाम पर पहले से ही 211 विश्व रिकॉर्ड दर्ज होने का दावा किया जाता है। उनका दावा है कि आकार के लिहाज से यह दुनिया की सबसे छोटी दिवाली पूजा थाली है और इस उपलब्धि के माध्यम से उन्होंने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। किसी सीमित स्थान पर इतनी सारी सूक्ष्म धार्मिक वस्तुओं को सटीक अनुपात में संयोजित करना तकनीकी और कलात्मक रूप से एक कठिन चुनौती मानी जाती है।
सद्भाव और समृद्धि का संदेश देती अनोखी कला
इस कलात्मक प्रयोग के पीछे एक गहरा सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश भी जुड़ा हुआ है। डॉ. सक्का ने बताया कि रोशनी और उल्लास के इस पर्व पर उनका उद्देश्य यह प्रार्थना व्यक्त करना है कि धन की देवी लक्ष्मी का आगमन देश के प्रत्येक परिवार और घर-आंगन में हो। वे चाहते हैं कि समाज में हर वर्ग तक संपन्नता और शांति का प्रसार हो। त्योहारों के मौसम में जहां बाजार फैंसी और भारी थालियों से सजे हैं, वहीं उदयपुर से आई यह सूक्ष्म कलाकृति इस बात का जीवंत प्रमाण बन गई है कि सच्ची कला मजहब और सीमाओं के दायरे से परे होकर सांस्कृतिक उत्सवों की साझा भावना को मजबूत करती है।















