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गणेश चतुर्थी पर सज गए देश के पांच प्रमुख गजानन धाम, इन खास मंदिरों में उमड़ती है भारी भीड़राजस्थान
13 सित॰ 2026, 9:14 am (58 मिनट पहले)· 1

गणेश चतुर्थी पर सज गए देश के पांच प्रमुख गजानन धाम, इन खास मंदिरों में उमड़ती है भारी भीड़

देशभर में गणेश चतुर्थी का पावन पर्व कल यानी 14 सितंबर को मनाया जाएगा। इस खास मौके पर मुंबई के सिद्धिविनायक से लेकर राजस्थान और आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक गणेश मंदिरों में भव्य उत्सव की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं।

ढोल-नगाड़ों की थाप, फूलों की भव्य सजावट और गजानन के जयकारों के बीच पूरा देश उत्सव के माहौल में रंग चुका है। कल यानी 14 सितंबर को घरों और सार्वजनिक पंडालों में विधि-विधान के साथ भगवान गणेश की प्रतिमाओं की स्थापना की जाएगी और विशेष पूजा-अर्चना का दौर शुरू होगा। हालांकि शुरुआत में यह पर्व मुख्य रूप से महाराष्ट्र और उसके आसपास के क्षेत्रों तक सीमित था, लेकिन समय के साथ यह पूरे देश में समान रूप से उत्साह के साथ मनाया जाने लगा है। इस पावन अवसर पर देश के उन खास और प्रमुख गणेश मंदिरों के दर्शन करना बेहद खास माना जाता है, जहां गणेशोत्सव की धूम सबसे निराली होती है।

मुंबई का प्रसिद्ध सिद्धिविनायक मंदिर देश भर के गजानन भक्तों के लिए सबसे बड़ी आस्था का केंद्र है। प्रभादेवी इलाके में स्थित इस ऐतिहासिक मंदिर में आम दिनों के अलावा भी देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन गणेश चतुर्थी के दौरान यहां भक्तों की लंबी-लंबी कतारें देखने को मिलती हैं। इस दौरान विशेष धार्मिक अनुष्ठान, मंत्रोच्चार और महाआरती का भव्य आयोजन किया जाता है। इस मंदिर की मुख्य प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि बप्पा की सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई है। चतुर्भुज रूप में विराजे गणेशजी के ऊपरी दाएं हाथ में कमल, ऊपरी बाएं हाथ में एक छोटी कुल्हाड़ी, नीचे वाले दाएं हाथ में पवित्र माला और नीचे वाले बाएं हाथ में मोदक से भरा कटोरा सुशोभित है, क्योंकि मोदक भगवान गणेश का अत्यंत प्रिय भोग माना जाता है।

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पुणे में स्थित श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई गणपति मंदिर देश के सबसे समृद्ध और प्रतिष्ठित गणेश मंदिरों में शुमार किया जाता है। गणेश उत्सव के दौरान इस मंदिर परिसर में देश के किसी प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर या भव्य महल की हूबहू प्रतिकृति बनाई जाती है, जो देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती है। इस वर्ष यहां वृंदावन के प्रसिद्ध प्रेम मंदिर की अद्भुत झांकी सजाई जाएगी। सामान्य दिनों में मंदिर के कपाट तय समय पर बंद होते हैं, परंतु गणेशोत्सव के खास दिनों में यह भक्तों के दर्शन के लिए चौबीस घंटे खुला रहता है। इस ऐतिहासिक मंदिर की नींव 19वीं शताब्दी में एक संपन्न हलवाई श्री दगडूशेठ और उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई ने रखी थी, जिन्होंने एक भयानक प्लेग महामारी के दौरान अपने इकलौते बेटे को खो दिया था। उस गहरे शोक से बाहर निकलने के लिए उन्होंने भगवान गणेश की शरण ली थी। इसके अलावा, महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को इसी सार्वजनिक गणेशोत्सव से देश को एकजुट करने की प्रेरणा मिली थी, जिसके बाद उन्होंने इसे बड़े पैमाने पर मनाने की शुरुआत की थी।

राजस्थान के सवाई माधोपुर स्थित रणथंभौर गणेश मंदिर का पावन पर्व पर एक अलग ही आध्यात्मिक महत्व है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर यहां एक विशाल लक्खी मेले का आयोजन होता है, जिसमें हिस्सा लेने के लिए दूर-दराज से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐतिहासिक रणथंभौर दुर्ग के भीतर स्थित इस मंदिर में भगवान गणेश की प्रतिमा त्रिनेत्र रूप में यानी तीन नेत्रों के साथ सुशोभित है। साथ ही, यहां गजानन को आधिकारिक रूप से निमंत्रण भेजने की प्राचीन परंपरा चली आ रही है। यह देश के उन गिने-चुने मंदिरों में शामिल है जहां भगवान गणेश अपनी दोनों पत्नियों रिद्धि और सिद्धि तथा अपने पुत्रों शुभ और लाभ के साथ अपने वाहन मूषक के साथ एक ही स्थान पर विराजमान हैं। मान्यताओं के अनुसार, यहां की यह मूर्ति किसी मनुष्य द्वारा गढ़ी नहीं गई है, बल्कि यह स्वयं प्रकट हुई स्वयंभू प्रतिमा है।

आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित कनिपकम विनायक मंदिर में गणेश चतुर्थी के पावन दिन से ही एक भव्य वार्षिक ब्रह्मोत्सव का शुभारंभ होता है, जो लगातार बीस दिनों तक चलता है। इन बीस दिनों के दौरान भगवान गणेश की उत्सवमूर्ति को विभिन्न प्रकार के रंग-बिरंगे और पारंपरिक वाहनों पर विराजमान कर पूरे क्षेत्र में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। इस स्वयंभू विनायक मूर्ति के बारे में यह लोकमान्यता है कि इसका आकार लगातार बढ़ रहा है, और स्थानीय लोगों का कहना है कि पचास वर्ष पूर्व चढ़ाया गया चांदी का कवच अब मूर्ति पर ठीक से फिट नहीं बैठता है। कनिपकम विनायक मंदिर को आपसी विवादों को सुलझाने और सत्य की परख करने के लिए भी खासी ख्याति प्राप्त है, जहां लोग भगवान को साक्षी मानकर और उनकी शपथ लेकर अपने आपसी मतभेद हमेशा के लिए दूर कर लेते हैं।

महाराष्ट्र की प्रसिद्ध अष्टविनायक यात्रा देश की सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। भगवान गणेश को समर्पित इस पावन यात्रा में श्रद्धालु एक-एक कर आठ प्रतिष्ठित गणेश मंदिरों के दर्शन करते हैं। इस यात्रा में मोरेश्वर, सिद्धटेक का सिद्धिविनायक, पाली का बल्लालेश्वर, महड का वरदविनायक, थेऊर का चिंतामणि, लेण्याद्री का गिरिजात्मज, ओझर का विघ्नेश्वर और राजणगांव का महागणपति मंदिर शामिल हैं। धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन सभी आठ तीर्थस्थलों के दर्शन करने वाले भक्तों पर भगवान गणेश की विशेष कृपा बरसती है और उनके जीवन में आने वाले सभी प्रकार के विघ्न हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं। गणेश उत्सव के पावन दिनों में इन सभी मंदिरों में देश भर से आने वाले श्रद्धालुओं का भारी जनसैलाब उमड़ पड़ता है।

सवाल-जवाब

गणेश चतुर्थी का पर्व कब शुरू हो रहा है?
गणेश चतुर्थी का यह पावन पर्व कल यानी 14 सितंबर से शुरू हो रहा है।
सिद्धिविनायक मंदिर में स्थापित गणेश प्रतिमा की क्या विशेषता है?
सिद्धिविनायक मंदिर में विराजे भगवान गणेश की सूंड दाईं ओर झुकी हुई है और वे चतुर्भुज रूप में हैं।
पुणे के दगडूशेठ हलवाई मंदिर की स्थापना किसने की थी?
इस मंदिर की स्थापना 19वीं सदी में एक समृद्ध हलवाई श्री दगडूशेठ और उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई ने की थी।
रणथंभौर गणेश मंदिर की प्रतिमा क्यों खास है?
रणथंभौर दुर्ग में स्थित यह प्रतिमा त्रिनेत्र रूप में है और यह मनुष्य द्वारा नहीं बल्कि स्वयंभू प्रकट हुई है।
अष्टविनायक यात्रा में कुल कितने मंदिर शामिल हैं?
अष्टविनायक यात्रा के अंतर्गत भगवान गणेश के कुल आठ पवित्र मंदिरों के दर्शन किए जाते हैं।
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