झीलों की नगरी उदयपुर में शरद पूर्णिमा का पावन पर्व पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। इस विशेष अवसर पर शहर के तमाम धार्मिक स्थलों पर खास अनुष्ठान हुए, जहां भगवान के मनमोहक श्रृंगार के साथ कई तरह के व्यंजनों का भोग लगाया गया। शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की ठंडी और धवल चांदनी में ठाकुरजी को विराजमान करने की प्राचीन परंपरा का भी पूरी निष्ठा के साथ पालन किया गया। सुबह से ही मंदिरों में भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया था, जिन्होंने भगवान के दर्शन कर अपने परिवार के कल्याण और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की।
जगदीश मंदिर में सजा ठाकुरजी का दरबार
शहर के सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक जगदीश मंदिर में शरद पूर्णिमा के पावन पर्व पर विशेष धार्मिक कार्यक्रमों की श्रृंखला आयोजित की गई। इस खास दिन पर मंदिर के मुख्य देवता ठाकुरजी का सफेद रंग के चमकीले जरी वस्त्रों और अत्यंत आकर्षक मुकुट के साथ अलौकिक श्रृंगार किया गया। इन श्वेत वस्त्रों में सुसज्जित ठाकुरजी के भव्य दर्शन करने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर भक्तिभाव और उत्साह के रंगों से सराबोर नजर आया, जहां मौजूद भक्तों ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में पूरी आस्था के साथ हिस्सा लिया।
501 लीटर दूध से तैयार हुआ महाभोग
मंदिर के पुजारी विनोद ने इस आयोजन की जानकारी देते हुए बताया कि शरद पूर्णिमा के दिन ठाकुरजी की विशेष सेवा और आराधना की जाती है। इसी प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए मंदिर परिसर में महारास की सेवा का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। इसके उपरांत ठाकुरजी को खीर, चपड़ा, ककड़ी और कई अन्य पारंपरिक व्यंजनों का भोग अर्पित किया गया। इस पावन तिथि पर भगवान के लिए विशेष महाभोग बनाने की लंबी तैयारियां की जाती हैं और पूरे कर्मकांड के साथ पूजन होता है। इस वर्ष शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर अकेले जगदीश मंदिर में ही कुल 501 लीटर दूध का उपयोग कर विशेष खीर तैयार की गई थी।
चांदनी रात में भोग और प्रसाद वितरण
संध्या आरती संपन्न होने के बाद ठाकुरजी को नियमानुसार चंद्रमा की धवल चांदनी के बीच खुले प्रांगण में विराजित किया गया। धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार भगवान को इसी अवस्था में खीर का विशेष भोग अर्पित किया गया। शरद पूर्णिमा के पर्व पर खीर का सेवन और उसका भोग लगाना विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए मंदिरों और घरों में इस दिन विशेष रूप से खीर बनाई जाती है। भगवान को भोग लगाने के बाद उपस्थित सभी श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। भक्तों ने इस पवित्र प्रसाद को ग्रहण कर स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली माना। मंदिर के प्रांगण में देर रात तक दर्शन करने और प्रसाद लेने के लिए श्रद्धालुओं का आना-जाना लगातार बना रहा। उदयपुर के इस ऐतिहासिक आयोजन ने एक बार फिर शहर की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की अनूठी झलक पेश की, जहां गहरी आस्था, पूजन और सामूहिक प्रसाद वितरण के साथ शरद पूर्णिमा का पर्व भक्तिमय माहौल में संपन्न हुआ।





















