राजस्थान के राज्य पक्षी गोडावण के संरक्षण अभियान में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर दर्ज होने जा रहा है, जब कृत्रिम प्रजनन केंद्र के सुरक्षित घेरे से निकालकर इन परिंदों को पहली बार खुले आसमान में छोड़ा जाएगा। जैसलमेर जिले के सूदासरी स्थित ब्रीडिंग सेंटर में पले-बढ़े इन गोडावणों को उनके मूल प्राकृतिक पर्यावास में आजाद करने की पूरी तैयारी कर ली गई है। थार के रेगिस्तान की पहचान माने जाने वाले इस दुर्लभ पक्षी को बचाने के प्रयासों के तहत यह एक युगांतरकारी कदम है। देश के केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव खुद इस गौरवशाली पल के साक्षी बनने के लिए मौके पर मौजूद रहेंगे।
लंबे समय से विलुप्ति की कगार पर खड़े इस पक्षी की सुरक्षा को लेकर वन विभाग, वैज्ञानिकों और वन्यजीव विशेषज्ञों की टीमें लगातार जुटी हुई थीं। वर्षों के कड़े अनुसंधान, वैज्ञानिक देखरेख और अथक परिश्रम के बाद आखिरकार यह कामयाबी हासिल हुई है। विशेषज्ञों द्वारा स्वास्थ्य परीक्षण में पूरी तरह खरे और प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल पाए जाने के बाद ही इन गोडावणों को प्राकृतिक पर्यावास में नई जिंदगी शुरू करने की हरी झंडी दी गई है। वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों के बीच इस कदम को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।
आधुनिक जीपीएस तकनीक से चौबीसों घंटे निगरानी का खाका
खुले वातावरण में छोड़े जाने वाले गोडावणों की सुरक्षा और उनके व्यवहार को समझने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। इस पूरी योजना के तहत सभी रिलीज किए जाने वाले पक्षियों पर अत्याधुनिक जीपीएस टैगिंग की व्यवस्था की गई है। इस डिवाइस की मदद से वैज्ञानिक और वन विभाग की टीमें बिना किसी रुकावट के चौबीसों घंटे पक्षियों की प्रत्येक गतिविधि पर पैनी निगाह रख सकेंगी।
जीपीएस ट्रैकिंग के जरिए यह आसानी से पता लगाया जा सकेगा कि गोडावण प्रतिदिन कितनी दूरी तय कर रहे हैं, उनके पसंदीदा भोजन क्षेत्र कौन से हैं और वे विश्राम के लिए किन ठिकानों को चुन रहे हैं। इस पल-पल की डिजिटल मॉनिटरिंग से न केवल पक्षियों के व्यवहार संबंधी महत्वपूर्ण आंकड़े एकत्र होंगे, बल्कि किसी भी अप्रत्याशित खतरे की स्थिति में त्वरित कदम उठाना भी मुमकिन हो सकेगा।
विशेष टनल में दो से तीन महीने तक दी गई कड़ी ट्रेनिंग
ब्रीडिंग सेंटर की चारदीवारी से सीधे खुले जंगल में छोड़ने के बजाय इन पक्षियों को वन्य जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए बाकायदा प्रशिक्षित किया गया है। रिलीज करने से पहले करीब दो से तीन महीने तक इन गोडावणों को एक विशेष रूप से तैयार की गई टनल में रखा गया था, जहां उन्हें प्राकृतिक परिस्थितियों से तालमेल बिठाने का निरंतर अभ्यास कराया गया।
इस विशेष प्रशिक्षण के दौरान पक्षियों ने खुद से लंबी उड़ान भरने, खुले माहौल के उतार-चढ़ाव को समझने और जमीन पर अपने लिए खुद चारा तथा भोजन तलाशने के तौर-तरीके सीखे। जब वन अधिकारियों और शोधकर्ताओं को पूरा यकीन हो गया कि ये पक्षी प्राकृतिक आवास में बिना किसी मानवीय सहारे के सुरक्षित रह सकते हैं और पूरी तरह तंदुरुस्त हैं, तभी उन्हें खुले आसमान में छोड़ने का अंतिम फैसला लिया गया।
हाईटेंशन बिजली लाइनों के खतरे से बचाव की रणनीति
थार क्षेत्र में गोडावणों के जीवन के सामने सबसे बड़ी चुनौती जमीन के ऊपर से गुजरने वाली हाईटेंशन बिजली की लाइनें रही हैं। भारी शरीर और सीमित दृष्टि कोण के चलते ये पक्षी अक्सर तारों से टकरा जाते हैं, जिससे उनकी जान चली जाती है। जीपीएस ट्रैकिंग के माध्यम से वन विभाग उनकी उड़ानों के मार्ग और मूवमेंट पैटर्न को लगातार ट्रैक करेगा, जिससे यह समझा जा सके कि पक्षी किन संवेदनशील तारों के करीब से गुजर रहे हैं। इससे जोखिम भरे इलाकों की पहचान कर सुरक्षात्मक इंतजामों को और पुख्ता बनाने में मदद मिलेगी। सूदासरी की धरती पर रविवार को शुरू होने वाली यह ऐतिहासिक पहल गोडावणों के अस्तित्व को नई जिंदगी और मजबूती देने का मार्ग प्रशस्त करेगी।




















