मानसून के थमते ही ग्रामीण इलाकों के जंगलों और खेतों की मेड़ों पर बांस के नन्हें पौधे जमीन की ऊपरी सतह तोड़कर बाहर आने लगते हैं। शुरुआती दिनों में जमीन से फूटने वाला यह हिस्सा बेहद कोमल, रसदार और खाने योग्य होता है। मध्य भारत के बघेलखंड अंचल में इसी कोमल अंकुर को करील कहा जाता है। आम दिनों में बनने वाली साधारण सब्जियों की दिनचर्या से हटकर यह पारंपरिक व्यंजन अपनी खास बनावट और तीखे देसी मसालों के लिए पहचाना जाता है। स्थानीय खानपान में इस वनस्पति का इस्तेमाल केवल गाढ़ी रसेदार सब्जी बनाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे बेहद स्वादिष्ट भुजिया और साल भर चलने वाला चटपटा अचार भी डाला जाता है। गांव-देहात में पीढ़ियों से चली आ रही इस रेसिपी को लेकर स्थानीय जानकार अंजलि चतुर्वेदी बताती हैं कि यदि बांस के इन कोमल अंकुरों को सही विधि से साफ और पकाया जाए, तो इसकी सब्जी किसी भी खास दावत के मुख्य व्यंजन को मात दे सकती है।
सख्त छिलके उतारने और कूटने का सही तरीका
बांस के करील की सब्जी बनाते समय सबसे पहला और अहम काम होता है सही अंकुरों का चुनाव करना। हमेशा ताजे, मुलायम और बिना रेशे वाले अंकुर ही रसोई में इस्तेमाल किए जाने चाहिए। अंकुरों के ऊपरी हिस्से पर लकड़ी जैसी कई सख्त परतें लिपटी होती हैं, जिन्हें एक-एक करके चाकू की मदद से पूरी तरह छीलकर अलग कर दिया जाता है। इन सख्त पत्तों को हटाने के बाद भीतर का दूधिया सफेद और अत्यंत कोमल गूदा बाहर निकल आता है। इस गूदे को चाकू से छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। बघेलखंड की पारंपरिक रसोई में इन कटे हुए टुकड़ों को सीधे पकाने के बजाय सिलवट्टे पर रखकर हल्के हाथों से कूटा जाता है। सिलवट्टे पर कूटने से बांस के अंदरूनी रेशे हल्के से खुल जाते हैं, जिससे आगे चलकर ग्रेवी और मसालों का पूरा स्वाद इसके भीतरी हिस्से तक आसानी से समा जाता है।
नमक और हल्दी के पानी में उबालकर निकालें कड़वाहट
कच्चे बांस के अंकुरों में प्राकृतिक रूप से कसैलापन और हल्की कड़वाहट मौजूद होती है। इसके अलावा इनमें कुछ ऐसे प्राकृतिक तत्व भी पाए जाते हैं, जिन्हें भोजन में शामिल करने से पहले पूरी तरह निष्प्रभावी करना स्वास्थ्य और स्वाद दोनों के लिहाज से जरूरी होता है। इसी कारण कभी भी करील को सीधे तेल या मसाले में नहीं छौंका जाता। कड़वाहट दूर करने के लिए कूटे हुए टुकड़ों को एक बड़े बर्तन में पर्याप्त पानी डालकर चूल्हे पर चढ़ाया जाता है। इस पानी में थोड़ा सा नमक और हल्दी पाउडर मिलाया जाता है। बर्तन को आंच पर चढ़ाकर करीब 20 से 30 मिनट तक मध्यम आंच पर अच्छी तरह खौलाया जाता है। उबलने के दौरान बांस का सारा कसैलापन पानी में घुल जाता है। इसके बाद उस पानी को छलनी से छानकर पूरी तरह फेंक दिया जाता है। इस प्रक्रिया से करील एकदम सुरक्षित, साफ और मसालों को सोखने के लिए तैयार हो जाता है।
सरसों के तेल और साबुत मसालों का तड़का
देसी करील की सब्जी का असली स्वाद सरसों के तेल में पकाने पर ही निखरकर सामने आता है। एक गहरी कड़ाही में सरसों का तेल डालकर उसे धुआं उठने तक गर्म किया जाता है, जिससे तेल का कच्चापन निकल जाए। इसके बाद आंच धीमी करके उसमें साबुत जीरा और तेजपत्ता डाला जाता है। तड़का चटकते ही कड़ाही में बारीक कटा हुआ प्याज, हरी मिर्च और ताजा अदरक-लहसुन का पेस्ट मिलाया जाता है। इस मिश्रण को तब तक लगातार चलाते हुए भूनते हैं जब तक कि प्याज का रंग सुनहरा न हो जाए। प्याज के अच्छे से पकने के बाद बारीक कटे टमाटर या पिसी हुई टमाटर की प्यूरी डाली जाती है। इसी समय हल्दी, धनिया पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, गरम मसाला और स्वादानुसार नमक भी शामिल किया जाता है। मसाले को धीमी आंच पर तब तक पकाया जाता है जब तक कि वह किनारों से तेल न छोड़ने लगे।
धीमी आंच पर ग्रेवी के साथ पकाने की विधि
जब भुने हुए मसाले से सौंधी खुशबू आने लगे और तेल अलग दिखने लगे, तब इसमें पहले से उबले और छाने हुए बांस के टुकड़े डाले जाते हैं। कड़ाही में करील डालने के बाद उसे मसाले के साथ करीब 4 से 5 मिनट तक लगातार चलाते हुए अच्छी तरह भूनना चाहिए। इस तरह भूनने से मसाले की परत बांस के टुकड़ों पर अच्छी तरह लिपट जाती है। इसके बाद तरी तैयार करने के लिए कड़ाही में जरूरत के मुताबिक लगभग एक से डेढ़ कप पानी डाला जाता है। सभी चीजों को एक बार चलाकर कड़ाही को ढक्कन से ढक दिया जाता है। अब इसे धीमी आंच पर करीब 10 से 15 मिनट तक पकने के लिए छोड़ दिया जाता है। धीमी आंच पर भाप में पकने से करील पूरी तरह गलकर मक्खन जैसा नरम हो जाता है और रसे का गाढ़ापन संतुलित हो जाता है।
गरमा-गरम परोसने के विकल्प
तय समय बाद जब सब्जी से तरी गाढ़ी हो जाए और बांस के टुकड़े पूरी तरह गल जाएं, तब गैस की आंच बंद कर दी जाती है। ऊपर से बारीक कटा हुआ ताजा हरा धनिया डालकर सब्जी को मिलाया जाता है। तैयार बांस के करील की चटपटी सब्जी को गरमा-गरम फूली हुई रोटियों, कुरकुरे पराठों या सादे उबले चावल के साथ परोसा जाता है। बरसात के विदा होते ही मिलने वाली यह मौसमी सब्जी न केवल बघेलखंड के ग्रामीण खानपान की एक अनूठी विरासत है, बल्कि यह सामान्य सब्जियों के स्वाद से ऊब चुके लोगों को एक नया और यादगार देसी अनुभव भी देती है।



















