राजस्थान के जालोर जिले के सायला उपखंड में एक बेहद खास धार्मिक स्थल स्थित है, जिसे स्थानीय लोग मिनी रामदेवरा के नाम से जानते हैं। जालोर के दूदवा गांव में बना मिजलिया नाड़ा लोक देवता बाबा रामदेवजी के अनुयायियों के लिए गहरी आस्था का बड़ा केंद्र बन चुका है। जैसे ही भादवा महीने की दूज और दशमी के दिन नजदीक आते हैं, इस इलाके का माहौल पूरी तरह से बदल जाता है। यहां दूर-दराज के इलाकों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए आते हैं। अपनी मन्नत पूरी होने पर कई भक्त पैदल यात्रा करते हैं, तो कुछ लोग दंडवत प्रणाम करते हुए पूरी श्रद्धा के साथ दरबार में पहुंचते हैं और आशीर्वाद मांगते हैं।
डेढ़ सौ साल पुरानी ऐतिहासिक कहानी
क्षेत्र के बुजुर्गों और स्थानीय निवासियों के अनुसार, मिजलिया नाड़ा का इतिहास करीब 150 साल पुराना है। लोक मान्यताओं में यह बात गहराई से जुड़ी है कि बाबा रामदेवजी ने इसी विशेष स्थान पर एक जाळ के पेड़ के नीचे रामाजी रेबारी को अपने साक्षात दर्शन दिए थे और अपना चमत्कार दिखाया था। उस प्राचीन घटना के बाद से ही इस पावन स्थल के प्रति लोगों का विश्वास और सम्मान लगातार बढ़ता चला गया। आज भी मिजलिया नाड़ा वही पवित्र भूमि है, जहां उस चमत्कार की कहानियां बुजुर्गों की जुबान पर आसानी से सुनी जा सकती हैं और नई पीढ़ी को सुनाई जाती हैं।
खारे पानी के बीच मीठे जल का चमत्कार
इस धाम की प्रसिद्धि सिर्फ इसके प्राचीन मंदिर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े कई अनूठे प्रसंग भी भक्तों के विश्वास को और मजबूत करते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक करीब 20 साल पहले इस पूरे इलाके में पीने के पानी की बहुत बड़ी समस्या थी और पानी भारी किल्लत से जूझ रहा था। पानी की तलाश में कई जगहों पर ट्यूबवेल खोदे गए, लेकिन हर बार खारा पानी निकला या असफलता हाथ लगी। आखिरकार ग्रामीणों ने बाबा रामदेवजी का स्मरण कर एक और ट्यूबवेल की खुदाई का काम शुरू किया। हैरानी की बात यह रही कि वहां से अचानक मीठा पानी निकल आया, जिसे आज भी लोग बाबा रामदेवजी की विशेष कृपा और चमत्कार मानते हैं।
भादवा दूज और दशमी पर लगता है बड़ा मेला
हिंदू पंचांग के अनुसार भादवा महीने में बाबा रामदेवजी के मेलों और आयोजनों का विशेष महत्व होता है। स्थानीय निवासी चतराराम और डुंगराराम चौधरी के अनुसार, दूदवा गांव में स्थित इस मंदिर परिसर में भादवे की दूज और दशमी के मौके पर विशाल मेला भरता है। इन खास दिनों में मंदिर से लगभग एक किलोमीटर पहले ही भक्तों की लंबी कतारें और भारी भीड़ नजर आने लगती है। दशमी के दिन सुबह सवेरे से ही श्रद्धालुओं का सैलाब मिजलिया नाड़ा की तरफ उमड़ पड़ता है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह अवश्य पूरी होती है, और यही अटूट विश्वास हर साल हजारों लोगों को यहां खींच लाता है।
संकरे रास्तों के बीच अडिग रहती है भक्तों की आस्था
मेले के दौरान उमड़ने वाली भारी भीड़ के कारण कुछ बुनियादी परेशानियां भी सामने आती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर तक जाने वाली सड़क काफी संकरी है, जिसकी वजह से वाहनों की आवाजाही बढ़ने पर अक्सर लंबा जाम लग जाता है और पैदल चलने वाले श्रद्धालुओं को कठिनाई होती है। हालांकि, स्थानीय युवा और ग्रामीण पूरी मुस्तैदी से ट्रैफिक और अन्य व्यवस्थाओं को संभालते हैं ताकि भक्तों को दिक्कत न हो। तमाम शारीरिक कष्टों और रास्तों की इन दुश्वारियों के बावजूद लोगों का उत्साह कम नहीं होता। मिजलिया नाड़ा में गूंजते पारंपरिक भजन और बाबा के जयकारे पूरे परिवेश को भक्तिमय बना देते हैं। सायला, जीवाणा और बागोड़ा जैसे आसपास के कई गांवों से लोग टोलियों के रूप में यहां पहुंचते हैं। मेले के दौरान पूरे मंदिर परिसर को भव्य तरीके से सजाया जाता है, जो मारवाड़ और जालोर की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक धरोहर को जीवंत करता है।


















