उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जिला सदियों पुरानी विरासतों, ऐतिहासिक इमारतों और रियासती दौर की स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए है। इसी जिले के विजयपुर इलाके में स्थित एक प्राचीन किला गहरवार राजवंश के गौरवशाली शासन की गवाही देता है। मिर्जापुर और उसके सीमावर्ती भूभाग पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने के मकसद से गहरवार शासकों ने इस किलेनुमा प्रासाद का निर्माण कराया था। इसी मजबूत ठिकाने से कई पीढ़ियों तक इस राजवंश के नरेशों ने पूरे इलाके का शासन संचालित किया और अपनी सत्ता कायम रखी।
बीते दौर की कई उथल-पुथल भरी ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा यह भवन आज भी पूरी मजबूती के साथ अपनी जगह पर कायम है। विजयपुर की यह भव्य संरचना क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्राचीन इमारतों में गिनी जाती है। इसकी दीवारों और मेहराबों पर की गई नक्काशीदार कारीगरी को निहारने के लिए दूरदराज से सैलानी पहुंचते हैं और इसकी पारंपरिक शिल्पकला को देखकर चकित रह जाते हैं।
कन्नौज के बिखराव के बाद विंध्य क्षेत्र में स्थापित हुआ नया केंद्र
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, कन्नौज में गहरवार वंश की सत्ता बिखरने के बाद इस राजवंश के शासकों ने मिर्जापुर जिले का रुख किया और विजयपुर को अपना मुख्य गढ़ बनाया। शुरुआत में विंध्याचल के निकट स्थित कंतित में अपनी शक्ति को संगठित किया गया, जिसे बाद में विजयपुर तक फैला दिया गया। सदियों के लंबे अंतराल में इन राजाओं ने आसपास के बड़े भूभाग पर अपना कड़ा प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखा।
मुगल साम्राज्य के प्रसार के दौर में और बाद में ब्रिटिश हुकूमत के समय भी इस रियासत ने अपने स्थानीय प्रभाव और इलाके की पहचान को महफूज रखने का प्रयास किया। लंबे समय तक गहरवार वंश के विभिन्न उत्तराधिकारियों ने यहां सत्ता संभाली। हालांकि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभुत्व विस्तार के दौरान गहरवार वंश के शासकों को गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इस ऐतिहासिक दौर के महत्वपूर्ण विवरण आज भी सरकारी अभिलेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों में सुरक्षित दर्ज हैं।
कंतित स्टेट की वंशावली और राजा उग्रसेन का निर्माण
इतिहास के जानकार अनिल सिंह के अनुसार, कंतित स्टेट के राजा गुडनदेव, जो राजा माणिकचंद की 16वीं पीढ़ी के वंशज थे, उन्होंने विंध्याचल के पास कंतित को अपनी नई राजधानी के तौर पर स्थापित किया था। राजा गुडनदेव के विवाह के उपरांत दो पुत्र हुए। इनमें बड़े पुत्र राजा उग्रसेन कंतित के सिंहासन पर आसीन हुए, जबकि दूसरे पुत्र राजा भोजराज ने मांडा की सत्ता संभाली।
विजयपुर में मौजूद इस विशेष और विशाल किले की नींव राजा उग्रसेन ने ही रखी थी। यह किला इतने व्यापक क्षेत्रफल में फैला है कि इसका बाहरी विस्तार देखकर ही उस दौर की सुरक्षा रणनीतियों और राजसी वैभव का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। वर्तमान में इस किले के भीतर कोई रिहायश नहीं है और यह भवन खाली पड़ा है, लेकिन सदियों के ऐतिहासिक घटनाक्रमों और रियासती गौरव का प्रतीक बनकर यह आज भी सीना ताने खड़ा है।


















