अश्वपालकों के लिए घोड़ों के खुरों की तंदुरुस्ती बनाए रखना बेहद अहम जिम्मेदारी होती है। यदि खुरों की सही देखरेख न की जाए तो उनमें दरार पड़ना, आकार का अनियंत्रित बढ़ना, संक्रमण फैलना, चोट लगना अथवा सड़न पैदा होने जैसी गंभीर समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। अत्यधिक गीले तथा गंदगी से भरे वातावरण में लंबे समय तक बंधे रहने से खुरों में बैक्टीरिया व अन्य संक्रमण पनपने की आशंका काफी बढ़ जाती है। इसके विपरीत, बहुत सूखी, पथरीली और कठोर सतह पर लगातार चलने के कारण खुर चटक सकते हैं या उनमें गहरी चोट लग सकती है। शुरुआत में छोटी दिखने वाली यह लापरवाही आगे चलकर पशु के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।
चाल और शारीरिक सक्रियता पर पड़ता है बुरा असर
खुरों की किसी भी बीमारी का सीधा प्रभाव घोड़े की स्वाभाविक चाल और उसकी दिनचर्या पर दिखाई देने लगता है। जब खुर के भीतर दर्द या घाव पनपता है, तो घोड़ा चलने-फिरने में असहज महसूस करता है और लंगड़ाने लगता है। तीव्र पीड़ा के चलते पशु चलना-फिरना कम कर देता है, जिससे उसकी सामान्य शारीरिक सक्रियता एकदम घट जाती है। इतना ही नहीं, दर्द से बचने के चक्कर में घोड़ा अपनी चाल बदल लेता है, जिससे पैरों की दूसरी मांसपेशियों, हड्डियों और जोड़ों पर अनावश्यक अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इस असंतुलन से अन्य अंगों में भी विकृति आ सकती है, इसलिए खुर की बनावट या रंगत में तनिक भी फेरबदल दिखते ही तत्काल सतर्क हो जाना चाहिए।
नियमित साफ-सफाई और सही रखरखाव के नियम
खुर संबंधी विकारों से बचाव का सबसे कारगर उपाय स्वच्छता का कड़ाई से पालन करना है। पशुपालकों को हर रोज नियमित रूप से खुरों का मुआयना करना चाहिए और खुर के निचले हिस्से में फंसे कंकड़, पत्थर, मिट्टी या सड़ी गंदगी को किसी उपयुक्त औजार से सावधानीपूर्वक निकाल देना चाहिए। अस्तबल और खड़े होने के बाड़े को सूखा तथा स्वच्छ रखना अनिवार्य है। दलदल, कीचड़ अथवा मलमूत्र से सनी जमीन पर घोड़े को कतई खड़ा न रखें। इसके अलावा, निश्चित समयांतराल पर खुरों की संतुलित तराशी और कटाई करवाकर उनका प्राकृतिक आकार बनाए रखना जरूरी होता है।
विशेषज्ञ परामर्श और तकनीकी देखभाल की जरूरत
खुरों की पेचीदा समस्याओं में घर पर मनमाना उपचार करने के बजाय किसी प्रशिक्षित नालबंद अथवा अनुभवी पशु चिकित्सक का सहारा लेना चाहिए। यदि खुर असामान्य रूप से बढ़ चुके हों, उनमें गहरा चीरा या दरार पड़ गई हो, दुर्गंध उठ रही हो, प्रभावित हिस्से में गर्माहट व सूजन आ गई हो या घोड़ा एक पैर पर वजन डालने से कतराए, तो तुरंत चिकित्सीय जांच कराएं। आवश्यकता पड़ने पर खुरों की वैज्ञानिक कटाई, आंतरिक घाव की सफाई और नई नाल लगवाने का कार्य केवल कुशल कारीगर से ही करवाना चाहिए। पशु के आसपास की भौगोलिक स्थिति और जमीन की कठोरता को ध्यान में रखकर खुरों के रखरखाव की समय-सारणी निर्धारित करनी चाहिए।
सतर्कता, संतुलित आहार और दैनिक दिनचर्या का महत्व
नियमित निगरानी रखकर पालक कई गंभीर संकटों को समय से पहले भांप सकते हैं। जब घोड़ा असामान्य गति से चले, किसी एक टांग को जमीन पर टिकाने से बचे, बार-बार खुर झटकाए या खुर छूने पर असामान्य गर्म लगे, तो इसे मामूली बात मानकर नजरअंदाज न करें। पोषण युक्त संतुलित चारा, स्वच्छ पेयजल, रोजाना हल्का व्यायाम और साफ-सुथरा बाड़ा घोड़े की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखते हैं। यदि खुर में गंभीर सड़न, मवाद या असहनीय दर्द के लक्षण उभरें, तो बिना देरी किए अधिकृत पशु चिकित्सक से समुचित उपचार शुरू कराएं।




















