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पाली में सोमनाथ मंदिर के पास मुस्लिम कारीगर गढ़ रहे आस्था के प्रतीक त्रिशूल और कुपेड़ाराजस्थान
20 सित॰ 2026, 7:25 pm (29 मिनट पहले)· 0

पाली में सोमनाथ मंदिर के पास मुस्लिम कारीगर गढ़ रहे आस्था के प्रतीक त्रिशूल और कुपेड़ा

पाली के ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के निकट मुस्लिम परिवार की एक सदी पुरानी लोहार की दुकान गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश कर रही है, जहां पूजा और आरती के औजार पूरी श्रद्धा से तैयार किए जाते हैं।

राजस्थान के पाली में स्थित ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के निकट एक छोटी सी दुकान सामाजिक सौहार्द और साझी संस्कृति की मिसाल पेश कर रही है। देश की आजादी से पहले शुरू हुई लोहे के औजार बनाने की यह कार्यशाला लगभग 100 वर्षों से अनवरत चल रही है। यहां चलने वाली पारंपरिक भट्टी को कभी परिवार के दादा और पिता ने सुलगाया था, और आज उसी पुश्तैनी हुनर को उस्मान, इब्राहिम तथा 60 वर्षीय अय्यूब पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। इस दुकान की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि घरेलू उपयोग के बर्तनों के साथ-साथ यहां हिंदू आस्था और शिव भक्ति का प्रमुख प्रतीक त्रिशूल भी लोहे को तपाकर विशेष बारीकी से बनाया जाता है।

एक सदी पुरानी विरासत और आजादी के दौर का आशियाना

यह दुकान महज आजीविका का जरिया नहीं, बल्कि एक सदी पुराना पुश्तैनी सफर है। आजादी से पूर्व अस्तित्व में आई इस भट्टी में लोहे को लाल कर औजारों में ढालने की कला पीढ़ियों से एक से दूसरे हाथों में सौंपी जा रही है। दुकान के समीप ही इस परिवार का 80 साल पुराना पुश्तैनी मकान मौजूद है। इस ऐतिहासिक मकान की दीवारों पर आज भी '1947' अंकित है, जो देश के विभाजन और स्वतंत्रता के दौर का मूक गवाह बना हुआ है। वक्त बदला और कई दशक गुजर गए, लेकिन इस परिवार का अपने काम के प्रति समर्पण और आसपास के समुदाय के साथ अटूट भाईचारा जस का तस कायम रहा।

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भगवान शिव के त्रिशूल और आरती के कुपेड़ा का निर्माण

दुकान में कड़ाही, तवा, चूल्हा और खुरपी जैसे रोजमर्रा के घरेलू व कृषि औजार तो बनते ही हैं, लेकिन प्रमुख आकर्षण देव स्थानों के लिए तैयार किए जाने वाले धार्मिक उपकरण हैं। परिवार के कारीगर 60 वर्षीय अय्यूब का कहना है कि उनके पूर्वज भी यही काम करते थे और वे स्वयं भगवान भोलेनाथ की भक्ति का प्रतीक त्रिशूल बड़ी बारीकी से तैयार करते हैं। इसके अतिरिक्त मंदिरों में प्रतिदिन होने वाली पूजा-आरती में प्रयुक्त होने वाला विशेष पात्र 'कुपेड़ा' भी इन्हीं मुस्लिम कारीगरों के हाथों भट्टी में तपकर आकार लेता है। सोमनाथ मंदिर के बिल्कुल समीप गूंजती हथौड़ों की थाप दोनों समुदायों की साझा आस्था का प्रतीक प्रतीत होती है।

स्थानीय लोगों का विश्वास और अटूट सामाजिक सौहार्द

क्षेत्र के स्थानीय निवासी इस परिवार के हुनर और सद्भाव के कायल हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार वे बचपन से इस परिवार की पीढ़ियों को मंदिर के उपयोगी उपकरण तैयार करते देखते आ रहे हैं और पूजा का कुपेड़ा विशेष रूप से इसी दुकान से लिया जाता रहा है। कई पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी इस परिवार के हाथों की कारीगरी और स्थानीय समाज के साथ उनका आपसी प्रेम कभी कम नहीं हुआ। जब मुस्लिम लोहारों द्वारा गढ़े गए त्रिशूल और पूजा सामग्री हिंदू देवालयों में पहुंचते हैं, तो यह साझा जीवन मूल्यों और इंसानियत का सशक्त संदेश प्रस्तुत करता है।

सवाल-जवाब

पाली में यह लोहार की दुकान कितने साल पुरानी है?
यह दुकान लगभग 100 साल यानी एक सदी पुरानी है और भारत की आजादी से पहले से चल रही है।
वर्तमान में इस पुश्तैनी काम को कौन संभाल रहा है?
इस विरासत को परिवार के उस्मान, इब्राहिम और 60 वर्षीय अय्यूब मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं।
दुकान में कौन-कौन से धार्मिक और घरेलू औजार बनाए जाते हैं?
यहां भगवान शिव का त्रिशूल और आरती का कुपेड़ा बनाने के अलावा कड़ाही, तवे, चूल्हे और खुरपी जैसे घरेलू औजार बनते हैं।
यह दुकान किस प्रमुख धार्मिक स्थल के निकट स्थित है?
यह दुकान राजस्थान के पाली में स्थित ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के बिल्कुल पास स्थित है।
कारीगरों के पुश्तैनी मकान की क्या खासियत है?
इनका 80 साल पुराना मकान पास ही स्थित है, जिसकी दीवार पर आज भी '1947' उकेरा हुआ है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·8 मिनट पहले

ज़मीनी स्तर पर सामाजिक-आर्थिक अंतर्निर्भरता ही भारत की वास्तविक ताक़त है, जो अक्सर राजनीतिक ध्रुवीकरण के शोर को ख़ारिज करती है। इस तरह के पारंपरिक और पुश्तैनी कौशल न केवल सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखते हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द को भी मज़बूती देते हैं। नीतिगत दृष्टिकोण से, इस तरह के असंगठित सूक्ष्म कारीगरों को सरकारी संरक्षण और वित्तीय सहायता देना बेहद ज़रूरी है ताकि हमारी साझी विरासत और रोज़गार दोनों सुरक्षित रह सकें।

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 मिनट पहले

कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के नजरिए से देखें तो इस तरह का सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी आर्थिक निर्भरता जमीनी स्तर पर शांति बनाए रखने का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। जब समाज के दोनों पक्ष आपस में इस कदर जुड़े होते हैं, तो असामाजिक तत्वों के लिए विभाजनकारी साजिशें रचना और कानून-व्यवस्था को बिगाड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है। यह आपसी भरोसा और सांझी संस्कृति पुलिस व प्रशासन के लिए भी एक सुरक्षा कवच का काम करती है, जिससे हिंसा की गुंजाइश खत्म होती है और सार्वजनिक शांति बनी रहती है।

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