राजस्थान के पाली जिले में सोजत कस्बे की एक रिहायशी कॉलोनी में उस समय अफरातफरी मच गई जब स्थानीय निवासियों ने पानी के भूमिगत टांके में एक अजीबोगरीब जीव को फंसा हुआ देखा। नजदीक जाकर देखने पर पता चला कि यह विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुका अत्यंत दुर्लभ पैंगोलिन है, जिसे मारवाड़ की स्थानीय बोली में चींटीखोर के नाम से जाना जाता है। आवासीय इलाके में बने पानी के टैंक में इस संकोची वन्यजीव के गिरने की खबर फैलते ही आसपास के लोगों का भारी जमावड़ा लग गया। हालात की नजाकत को समझते हुए लोगों ने तुरंत वन्यजीव बचाव दल और स्नेक कैचर अजय कुमार को मौके पर बुलाया।
सोजत के टांके से सतर्कतापूर्ण रेस्क्यू ऑपरेशन
सूचना मिलते ही स्नेक कैचर अजय कुमार बिना किसी देरी के घटनास्थल पर पहुंचे। टांके की गहराई और उसमें गिरे वन्यजीव की संवेदनशील स्थिति को देखते हुए रेस्क्यू अभियान बेहद सावधानी से शुरू किया गया। काफी देर चली मशक्कत के बाद अजय कुमार ने अपनी तकनीकी दक्षता और सतर्कता का परिचय देते हुए इस मूक बेजुबान को बिना किसी चोट या नुकसान के सुरक्षित बाहर निकाल लिया। टांके से बाहर आने के बाद यह दुर्लभ स्तनपायी पूरी तरह स्वस्थ पाया गया। स्थानीय स्तर पर सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया पूरी होते ही वन विभाग के अधिकारियों को मौके पर सूचित किया गया और इस अनमोल जीव को उनके सुपुर्द कर दिया गया, ताकि चिकित्सीय मुआयने के बाद इसे इसके प्राकृतिक जंगलों में छोड़ा जा सके।
बिना दांतों वाला अनोखा स्तनपायी: मारवाड़ का चींटीखोर
पैंगोलिन शारीरिक बनावट और आदतों के मामले में प्रकृति की सबसे अनोखी कृतियों में गिना जाता है। सामान्य तौर पर वयस्क पैंगोलिन की शारीरिक लंबाई लगभग 2 फीट होती है और इसका कुल वजन 8 से 10 किलोग्राम के बीच रहता है। इसकी समूची पीठ और बाहरी शरीर बेहद सख्त, नुकीले शल्कों से ढका होता है, जो किसी भी शिकारी जानवर के हमले के वक्त ढाल का काम करते हैं। इस जीव की सबसे हैरान करने वाली जैविक विशेषता यह है कि इसके मुंह में एक भी दांत नहीं होता है। भोजन ग्रहण करने के लिए कुदरत ने इसे लगभग 40 सेंटीमीटर लंबी, पतली और चिपचिपी जीभ प्रदान की है। यह जीभ इतनी विलक्षण होती है कि इसकी लंबाई इसके समूचे शरीर की लंबाई से लगभग दोगुनी तक पहुंच जाती है। इसी विशेष जीभ के सहारे यह दीमक और चींटियों के 40 सेंटीमीटर तक गहरे भूमिगत बिलों में सीधे प्रवेश कर कीटों को अपना आहार बनाता है।
पर्यावरण और उपजाऊ मिट्टी का मूक रक्षक
पारिस्थितिकी तंत्र के संदर्भ में पैंगोलिन को जंगलों और खेतों का खामोश रक्षक माना जाता है। अपनी खुराक के लिए यह रोजाना भारी तादाद में चींटियों और दीमकों को चट कर जाता है। दीमक का यह प्राकृतिक नियंत्रण फसलों, पेड़-पौधों और हरित आवरण को समय से पहले नष्ट होने से बचाता है। इसके अलावा जमीन की गहराई में दीमक के बिलों को कुरेदने और उन्हें नष्ट करने से भूमि की प्राकृतिक उपजाऊ शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इस सतत प्रक्रिया से मिट्टी के भीतर हवा का आवागमन बेहतर होता है और जमीन में स्वाभाविक वातन बना रहता है, जिसके कारण पर्यावरणविद इसे इकोसिस्टम का साइलेंट वर्कर भी कहते हैं।
जवाई के बाद पाली में दूसरी दुर्लभ मौजूदगी
भारत भर में पैंगोलिन की आबादी तेजी से घटती जा रही है और पूरे देश में इस समय इनकी कुल अनुमानित संख्या मात्र 6000 के आसपास सिमट कर रह गई है। गंभीर संकट का सामना कर रही इस प्रजाति का मारवाड़ क्षेत्र के सूखे धरातल पर दिखाई देना वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक सुखद संकेत है। इससे पहले पाली जिले के विख्यात जवाई क्षेत्र में करीब दो साल पूर्व एक पैंगोलिन की उपस्थिति दर्ज की गई थी। अब सोजत शहर में टांके से इसका सुरक्षित निकलना इस बात की तस्दीक करता है कि इलाके में जैव विविधता अभी भी सांस ले रही है, जिसे बचाने के लिए सघन सामुदायिक जागरूकता बेहद जरूरी है।


















