भादो के महीने में मध्य प्रदेश के बघेलखंड अंचल के ग्रामीण घरों में पारंपरिक व्यंजनों की खास महक बिखरने लगती है। इन लोक-स्वादों में अरबी के पत्तों से तैयार होने वाली रकचिया, जिसे कई जगहों पर पतौड़ा भी कहा जाता है, बेहद लोकप्रिय मानी जाती है। बाहर से बेहद कुरकुरी और भीतर से तीखे-चटपटे मसालों से भरी यह डिश चाय की चुस्कियों के साथ नाश्ते में जितनी पसंद की जाती है, दाल-चावल के साथ सूखी सब्जी या भाजी के रूप में भी उतनी ही चाव से खाई जाती है। सतना निवासी मीना द्विवेदी के अनुसार, घर पर पारंपरिक विधि से इसे बनाना थोड़ा धैर्य और मेहनत का काम जरूर है, लेकिन बनने के बाद इसका अनूठा स्वाद सारी मेहनत को सार्थक कर देता है।
पत्तों का सही चुनाव और सफाई की जरूरी प्रक्रिया
रकचिया तैयार करने की शुरुआत अरबी के बिल्कुल ताजे, हरे और कोमल पत्तों के चुनाव से होती है। सख्त या बहुत पुराने पत्तों की तुलना में मुलायम पत्तों को मोड़ना काफी आसान होता है। पत्तों को सबसे पहले साफ पानी से अच्छी तरह धोकर सुखाया जाता है ताकि उन पर लगी धूल-मिट्टी पूरी तरह साफ हो जाए। इसके बाद पत्तों को उलटा करके उनके पिछले हिस्से पर उभरी हुई मोटी और सख्त नसों को एक धारदार चाकू की सहायता से सावधानीपूर्वक छीलकर निकाल दिया जाता है। इस चरण का विशेष महत्व है, क्योंकि मोटी नसें हटा देने से पत्ते रोल करते समय टूटते या फटते नहीं हैं। साथ ही, इन सख्त नसों को निकालने से अरबी के पत्तों में प्राकृतिक रूप से मौजूद वह तत्व भी काफी हद तक कम हो जाता है, जिससे खाते समय गले में हल्की चुभन या खराश महसूस होती है।
मसालेदार बेसन का गाढ़ा लेप तैयार करना
पत्तों की तैयारी पूरी होने के बाद बेसन का खास लेप तैयार किया जाता है। एक चौड़े और गहरे बर्तन में पर्याप्त मात्रा में बेसन लेकर उसमें हल्दी पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर, गरम मसाला, हींग और स्वादानुसार नमक मिलाया जाता है। स्वाद को अधिक चटपटा और तीखा बनाने के लिए इसमें लहसुन, अदरक और ताजी हरी मिर्च का बारीक कुटा हुआ पेस्ट शामिल किया जाता है।
इस लेप की सबसे अहम सामग्री खटाई होती है, जिसके लिए इसमें अमचूर पाउडर या फिर इमली का गाढ़ा रस डाला जाता है। खटाई न केवल रकचिया के स्वाद को चटपटा उभार देती है, बल्कि अरबी के पत्तों में पाई जाने वाली स्वाभाविक खराश और खुजली को पूरी तरह शांत करने का काम भी करती है। इन सभी सूखे और गीले मसालों को बेसन के साथ अच्छी तरह मिलाने के बाद इसमें आवश्यकतानुसार थोड़ा-थोड़ा पानी डाला जाता है। पानी एक साथ डालने के बजाय धीरे-धीरे मिलाया जाता है ताकि बेसन में गुठलियां न पड़ें और एक ऐसा गाढ़ा, चिकना लेप बन सके जो पत्तों की सतह पर आसानी से फैलकर चिपक जाए।
चार पत्तों की मदद से टाइट रोल बांधने की कला
मसाला लेप तैयार होने के बाद रोल बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके लिए एक समतल और साफ सतह पर अरबी का सबसे बड़ा पत्ता उलटा करके बिछाया जाता है। इस पत्ते की पूरी सतह पर बेसन के मसालेदार लेप की एक पतली और एकसमान परत हाथों या चम्मच की मदद से लगाई जाती है। इसके ऊपर दूसरा पत्ता रखा जाता है, लेकिन ध्यान रखा जाता है कि उसकी दिशा पहले पत्ते के विपरीत हो। विपरीत दिशा में पत्ते बिछाने से रोल का संतुलन बना रहता है और वह बीच से ढीला नहीं पड़ता।
दूसरे पत्ते पर भी बेसन का लेप लगाने के बाद तीसरे और चौथे पत्ते को क्रमानुसार बिछाकर प्रत्येक पर लेप की परत लगाई जाती है। इस प्रकार चार पत्तों की एक मजबूत और संतुलित परत तैयार हो जाती है। इसके बाद पत्तों के दोनों बाहरी किनारों को थोड़ा-थोड़ा अंदर की ओर मोड़ा जाता है ताकि मसाला बाहर न निकले। फिर नीचे के सिरे से शुरू करते हुए ऊपर की दिशा में हल्का दबाव देते हुए एक बेहद टाइट बेलनाकार रोल तैयार कर लिया जाता है।
भाप में पकाना और ठंडा होने का इंतजार
तैयार किए गए बेलनाकार रोल को पकाने के लिए भाप की विधि अपनाई जाती है। इसे एक बड़े कुकर या स्टीमर में उबलते हुए पानी के ऊपर जालीदार बर्तन में रखकर लगभग 15 से 20 मिनट तक अच्छी तरह भाप में पकाया जाता है। इस अवधि के दौरान बेसन की परतें भाप की गर्मी से अंदर तक पूरी तरह पक जाती हैं और ठोस रूप ले लेती हैं।
भाप से निकालने के तुरंत बाद गर्म रोल को काटने की गलती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि गर्म अवस्था में बेसन और पत्ते बेहद मुलायम होते हैं और चाकू लगाने पर रोल बिखर सकता है। इसलिए रोल को पहले कमरे के सामान्य तापमान पर पूरी तरह ठंडा होने दिया जाता है। जैसे-जैसे रोल ठंडा होता है, वह सख्त और सुदृढ़ हो जाता है, जिससे उसे काटना बेहद आसान और साफ-सुथरा हो जाता है।
आधा इंच के टुकड़ों में कटाई और तवे पर कुरकुरा तड़का
पूरी तरह ठंडा हो जाने के बाद रोल को एक तेज धार वाले चाकू से लगभग आधा-आधा इंच मोटे गोल चक्रों में काटा जाता है। कटने के बाद इन टुकड़ों के भीतर अरबी के पत्तों और बेसन की गोलाकार परतें स्पष्ट और सुंदर दिखाई देती हैं, जो देखने में बेहद आकर्षक लगती हैं।
इसके बाद एक तवे या उथले पैन में थोड़ा सा शुद्ध सरसों का तेल डालकर गर्म किया जाता है। तेल गर्म होते ही उसमें राई के दाने, चुटकी भर हींग और सफेद तिल का तड़का लगाया जाता है। जैसे ही तिल और राई चटकने लगें, कटे हुए रकचिया के टुकड़ों को तवे पर एक-एक करके रख दिया जाता है। इन्हें धीमी से मध्यम आंच पर दोनों तरफ से उलट-पुलटकर तब तक सेंका जाता है जब तक कि बाहरी परत सुनहरी और पूरी तरह कुरकुरी न हो जाए।
पोषण से भरपूर और परोसने के कई अनूठे अंदाज
अरबी के पत्तों में शरीर के लिए आवश्यक विटामिन ए, विटामिन सी और आयरन जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह व्यंजन संतुलित माना जाता है क्योंकि इसे पहले भाप में पकाया जाता है और बाद में तवे पर बहुत सीमित सरसों के तेल में हल्का सेंका जाता है।
बघेलखंड में रकचिया को कई अलग-अलग तरीकों से खानपान की थाली में शामिल किया जाता है। शाम के समय इसे गरमा-गरम चाय और पुदीने-धनिया की तीखी हरी चटनी के साथ कुरकुरे नाश्ते के रूप में खाया जाता है। दोपहर के भोजन में दाल-चावल के साथ यह एक बेहतरीन साइड डिश या सूखी भाजी का काम करती है। यदि घर पर विशेष मेहमान आए हों, तो प्याज, टमाटर और खड़े गरम मसालों से तरीदार ग्रेवी तैयार करके इन कुरकुरे टुकड़ों को उसमें डालकर लजीज रसेदार सब्जी बनाई जा सकती है। इसके अतिरिक्त, पारंपरिक रूप से छाछ और मसालों के साथ कढ़ी बनाकर उसमें भी इन टुकड़ों को डुबोकर परोसा जाता है। यही विविधता और पारंपरिक सादगी इस घरेलू पकवान को बेहद खास बनाती है।



















