राजस्थान की प्रसिद्ध सांस्कृतिक एवं पर्यटन नगरी उदयपुर अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के साथ-साथ अद्भुत शिल्पकला के लिए भी पूरी दुनिया में विशेष पहचान रखती है। इसी शहर के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त सूक्ष्म स्वर्ण शिल्पी डॉ. इकबाल सक्का ने जन्माष्टमी के पावन अवसर पर अपनी अनूठी कला का प्रदर्शन करते हुए एक नया इतिहास रच दिया है। उन्होंने अपने सूक्ष्म कौशल से भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़े सबसे बहुचर्चित और पौराणिक दृश्य को धातु के सूक्ष्म टुकड़ों पर जीवंत कर दिखाया है। इस कलाकृति में उस ऐतिहासिक प्रसंग को दर्शाया गया है, जब वासुदेव अपने नवजात शिशु बाल कृष्ण को कंस के क्रूर अत्याचारों से बचाने के लिए तूफानी रात में उफनती हुई यमुना नदी पार करके गोकुल ले जाते हैं। उन्होंने इस पूरे दृश्य की रचना के लिए तांबे और चांदी के अत्यंत बारीक संयोजन का उपयोग किया है।
पौराणिक प्रसंग और सूक्ष्म शिल्पकला का संगम
इस अनूठी सूक्ष्म कृति का निर्माण अत्यंत जटिल, कलात्मक और समय लेने वाली तकनीक के माध्यम से किया गया है। डॉ. इकबाल सक्का ने सबसे पहले तांबे की धातु से एक छोटा सा कलात्मक पात्र तैयार किया और उसमें जल भरा, जो उफनती हुई यमुना नदी के तेज़ बहाव और लहरों का सजीव एहसास कराता है। इस कृत्रिम नदी के ठीक बीचों-बीच तांबे से निर्मित मात्र 1 सेंटीमीटर आकार की वासुदेव की आकृति को स्थापित किया गया है। वासुदेव के ठीक पीछे मूसलाधार बारिश और यमुना की उठती लहरों से सुरक्षा देने के उद्देश्य से 1 सेंटीमीटर का ही तांबे से बना पंचमुखी कालिया नाग का छत्र तैयार किया गया है। नाग का यह फन पौराणिक आख्यान के अनुसार वासुदेव और बालक कृष्ण को छांव प्रदान करता है, जिससे पूरा प्रसंग देखने में एकदम यथार्थवादी और अलौकिक प्रतीत होता है।
56 घंटे का कड़ा परिश्रम और 1 मिलीमीटर के लड्डू गोपाल
शिल्पकार की इस अद्भुत कलाकृति की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी अभूतपूर्व सूक्ष्मता और संजीदगी है। वासुदेव की मूर्ति के सिर पर चांदी की धातु से निर्मित मात्र 2 मिलीमीटर की एक टोकरी बनाई गई है। इस बेहद छोटी टोकरी के अंदरूनी हिस्से को मुलायम मखमल के लाल कपड़े से बेहद करीने से सजाया गया है। टोकरी के भीतर मूंग के दाने से भी छोटे, यानी लगभग 1 मिलीमीटर आकार के लड्डू गोपाल को विश्राम या निद्रा की मुद्रा में स्थापित किया गया है। डॉ. सक्का के अनुसार, इस सूक्ष्म कृति को अंतिम आकार देने में उन्हें 56 घंटे से भी अधिक समय का निरंतर और कठिन परिश्रम करना पड़ा। निर्माण की प्रक्रिया के दौरान हर एक हिस्से को बेहद एकाग्रता, धैर्य और सावधानी के साथ तराशा गया, ताकि धातु का कोई भी सूक्ष्म भाग क्षतिग्रस्त न हो।
आवर्धक कांच से दर्शन और पर्यटन स्थलों पर प्रदर्शन
यह शिल्पकला आकार में इतनी छोटी है कि इसे सामान्य नग्न आंखों से स्पष्ट रूप से देख पाना असंभव सा लगता है। हालांकि, जबइसे मैग्नीफाइंग लेंस या आवर्धक कांच के माध्यम से देखा जाता है, तो टोकरी में शांति से सोए हुए बाल कृष्ण का रूप, वासुदेव के चेहरे के बारीक भाव और पंचमुखी नाग के छत्र की एक-एक रेखा साफ और स्पष्ट दिखाई देती है। जन्माष्टमी के पावन पर्व पर डॉ. इकबाल सक्का अपने निजी संग्रहालय में श्रद्धालुओं और कला प्रेमियों के लिए इस अलौकिक कलाकृति को निशुल्क प्रदर्शित करेंगे। इसके अतिरिक्त, वे उदयपुर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों जैसे फतेहसागर झील, प्रसिद्ध सहेलियों की बाड़ी, दूध तलाई और मोती मगरी में भी इस कृति को लेकर जाएंगे, ताकि वहां आने वाले हजारों देशी और विदेशी पर्यटक भारतीय सूक्ष्म शिल्पकला की इस बेजोड़ मिसाल का प्रत्यक्ष दर्शन कर सकें।





















