झारखंड के देवघर में स्थित प्रसिद्ध बाबा मंदिर के सिंह दरवाजा के निकट पहुंचते ही घी और भुनी हुई सूजी की महक आने-जाने वालों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। यहां मिलने वाला पारंपरिक मोहनभोग अपने खास जायके और बनावट के कारण वर्षों से लोगों का पसंदीदा बना हुआ है। शुद्ध घी, सूजी, खोवा और मेवे के मेल से तैयार होने वाला यह व्यंजन आम मिठाइयों की तुलना में बिल्कुल अलग पहचान रखता है। इस मिठाई को बनाने में किसी तरह की जल्दबाजी नहीं की जाती, बल्कि कारीगर इसे धीमी आंच और पूरी सावधानी के साथ करीब 6 से 7 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद तैयार करते हैं। लंबे समय तक पकाए जाने के कारण इसका स्वाद गहरा और टेक्सचर एकदम अनूठा हो जाता है। स्थानीय निवासियों के अलावा मंदिर में पूजा-अर्चना करने पहुंचे श्रद्धालु भी यहां पहुंचकर गर्मागर्म मोहनभोग का लुत्फ उठाते हैं। व्रत और उपवास के नियमों का पालन करने वाले लोग इसे फलाहारी व्यंजन के रूप में भी चाव से खाते हैं।
पचास साल पुरानी विरासत और पारंपरिक बनाने का तरीका
दुकान का संचालन करने वाले ज्ञानदेव जजवारे के अनुसार, इस प्रतिष्ठान से मोहनभोग की यह यात्रा आज की नहीं, बल्कि 50 वर्ष से भी अधिक पुरानी है। आधी सदी से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी इसे पकाने की पारंपरिक पद्धति में कोई फेरबदल नहीं किया गया है। देवघर के सिंह दरवाजा से सटी संकरी गलियों में यह व्यंजन अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। बदलते दौर के साथ बाजार में खान-पान के कई आधुनिक विकल्प आए, लेकिन इस पुराने व्यंजन की लोकप्रियता जरा भी कम नहीं हुई। यही वजह है कि आज भी स्थानीय नियमित ग्राहकों के साथ-साथ शहर से बाहर से आने वाले लोगों का तांता इस दुकान पर लगा रहता है।
प्रतिदिन पचास किलो की खपत और दूर-दराज तक मांग
दुकानदार बताते हैं कि प्रतिदिन लगभग 50 किलो मोहनभोग की खपत आसानी से हो जाती है। बाबा मंदिर में पूजा संपन्न करने के उपरांत कई भक्त इसे पावन प्रसाद समझकर अपने साथ घर ले जाते हैं। देवघर से बाहर रहने वाले कई लोग भी विशेष रूप से यहां से मोहनभोग मंगवाते हैं। सिंह दरवाजा की संकरी गली से शुरू हुआ यह पारंपरिक व्यंजन अब केवल देवघर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दूसरे शहरों में बसे लोगों के बीच भी इसकी मांग निरंतर बनी हुई है।
दो सौ रुपये प्रति किलो दाम और अन्य लोकप्रिय व्यंजन
दुकान पर आने वाले एक ग्राहक अमन द्वारी का कहना है कि वे बीते करीब 20 सालों से नियमित रूप से यहां के मोहनभोग का स्वाद ले रहे हैं। शुद्ध खोवा और देसी घी की प्रचुर मात्रा होने की वजह से यह मुंह में रखते ही घुल जाता है और इसकी मिठास लंबे समय तक बनी रहती है। वर्तमान समय में यह मोहनभोग करीब 200 रुपये प्रति किलो के भाव पर उपलब्ध कराया जा रहा है। मोहनभोग के अलावा इस दुकान पर देवघर की गाढ़ी लस्सी और गाजर का हलवा भी ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय है। इस प्रकार बाबा धाम में पूजा-अर्चना के साथ-साथ इस पारंपरिक स्वाद का आनंद लेने की परंपरा आज भी बदस्तूर जारी है।



















