राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित गढ़बोर के प्रसिद्ध चारभुजा नाथ मंदिर में जलझूलनी एकादशी के मौके पर सदियों पुरानी आस्था और राजसी ठाठ-बाट का अनूठा संगम देखने को मिला। करीब 5500 साल पुराने बताए जाने वाले इस ऐतिहासिक धाम से ठाकुरजी विशेष शोभायात्रा के साथ नगर भ्रमण पर निकले। इस दौरान मेवाड़ की प्राचीन धार्मिक विरासत और राजसी रवायतों का भव्य प्रदर्शन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
सोने की पालकी और शाही लवाजमे के साथ नगर भ्रमण
जलझूलनी एकादशी के अवसर पर इस भव्य आयोजन का प्रमुख आकर्षण भगवान चारभुजा नाथ की सोने की पालकी रही। विशेष अनुष्ठानों के बाद ठाकुरजी को सोने की भव्य पालकी में विराजमान किया गया। इसके उपरांत शाही लवाजमे के साथ यह शोभायात्रा मंदिर परिसर से रवाना हुई। शोभायात्रा के आगे और साथ में सजे-धजे हाथी और घोड़े चल रहे थे। पुजारी परिवार के सदस्य पारंपरिक लाल पाग धारण कर पूरी निष्ठा के साथ ठाकुरजी के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे।
सोने-चांदी के पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों का प्रदर्शन
इस ऐतिहासिक परंपरा में मंदिर के सदियों पुराने पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों का प्रदर्शन भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। शोभायात्रा के दौरान सोने और चांदी से बनी गदा, भाले, तलवारें और बंदूक सहित अन्य प्राचीन हथियारों को मंदिर के गर्भगृह से बाहर निकाला गया। इन दिव्य शस्त्रों को भगवान के पराक्रम, शक्ति और राजसी वैभव का प्रतीक माना जाता है। पुजारी परिवार पूरी जिम्मेदारी के साथ इन पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों की पूजा-अर्चना और देखरेख का कार्य संभालता है। इन दुर्लभ अस्त्रों का शोभायात्रा में शामिल होना इस आयोजन को अन्य धार्मिक यात्राओं की तुलना में विशिष्ट पहचान देता है।
2 किलोमीटर तक बिछी गुलाल की चादर
नगर भ्रमण के दौरान जब ठाकुरजी की पालकी आगे बढ़ी, तो पूरे मार्ग पर आस्था का उल्लास छा गया। श्रद्धालु पूरे रास्ते जमकर गुलाल उड़ाते रहे, जिससे करीब दो किलोमीटर लंबा पूरा शोभायात्रा मार्ग गुलाबी रंग में सराबोर नजर आया। भगवान के गगनभेदी जयकारों के बीच श्रद्धालु इस पारंपरिक उत्सव में झूमते हुए नजर आए।
दूधतलाई में परिक्रमा और पवित्र स्नान
नगर भ्रमण संपन्न होने के बाद ठाकुरजी की पालकी दूधतलाई पहुंची। यहां सबसे पहले ठाकुरजी के साथ दूधतलाई की परिक्रमा की गई। परिक्रमा पूर्ण होने के बाद जलझूलनी एकादशी के विधान के अनुसार भगवान को विधि-विधान से पवित्र स्नान कराया गया। इसी स्नान के कारण इस पर्व को जलझूलनी एकादशी की परंपरा से जोड़ा जाता है। गढ़बोर के चारभुजा नाथ धाम में सोने की पालकी, लाल पाग पहने पुजारी, प्राचीन अस्त्र-शस्त्र, हाथी-घोड़े और गुलाल का यह संगम मेवाड़ की समृद्ध विरासत को आज भी जीवंत बनाए हुए है।


















