राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित आराध्यदेव भगवान सारणेश्वर महादेव का दो दिवसीय ऐतिहासिक मेला देवझूलनी एकादशी के पावन अवसर पर पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ शुरू होता है। यह उत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि सिरोही रियासत के शूरवीरों और स्थानीय देवासी समाज द्वारा अलाउद्दीन खिलजी की हमलावर सेना के विरुद्ध दिखाए गए अद्वितीय पराक्रम और ऐतिहासिक विजय का जीवंत प्रतीक भी है। देवझूलनी एकादशी के दिन सिरोही के राजमहल से ठाकुरजी की विशाल और भव्य रेवाड़ी पूरे राजसी वैभव और ठाठ-बाठ के साथ निकाली जाती है। सिरोही राजपरिवार के सदस्य देववत सिंह के अनुसार, इस मेले की गौरवशाली शुरुआत वर्ष 1298 मानी जाती है, जिसकी जड़ें सदियों पुरानी एक ऐतिहासिक सैन्य घटना से जुड़ी हुई हैं।
खिलजी की सेना पर ऐतिहासिक विजय और सिरनवा पहाड़ियों का संघर्ष
इतिहास के पन्नों को पलटें तो विक्रम संवत 1355 में भाद्रपद माह की ग्यारस तिथि पर इस अभूतपूर्व संघर्ष की नींव पड़ी थी। उस समय सिरोही रियासत की बागडोर महाराव विजयराज देवड़ा के हाथों में थी। खिलजी की आक्रांता सेना गुजरात के सिद्धपुर स्थित प्रसिद्ध रुद्रमाल को लूटकर वहां से पवित्र शिवलिंग अपने साथ ले जा रही थी। जब इस घटना की जानकारी सिरोही के शासक को मिली, तो उन्होंने पवित्र शिवलिंग को खिलजी की सेना के चंगुल से मुक्त कराने के लिए अपनी सेना के साथ हमला करने का साहसिक फैसला लिया। सिरोही स्थित सिरनवा पहाड़ियों की तलहटी में दोनों सेनाओं के बीच अत्यंत भीषण और निर्णायक युद्ध लड़ा गया। इस रणभूमि में स्थानीय देवासी समाज ने अद्भुत वीरता दिखाते हुए महाराव विजयराज देवड़ा और सिरोही की सेना का डटकर साथ दिया। दोनों के संयुक्त पराक्रम के आगे खिलजी की सेना टिक नहीं सकी और मैदान छोड़कर भागने पर विवश हो गई।
देवासी समाज के अदम्य साहस को समर्पित सदियों पुरानी परंपरा
खिलजी की सेना के खिलाफ मिली इस गौरवपूर्ण विजय के उपलक्ष्य में महाराव विजयराज देवड़ा ने देवासी समाज के त्याग और पराक्रम का सर्वोच्च सम्मान किया। इसी जीत की स्मृति में महाराव ने देवासी समाज को देवझूलनी एकादशी के दिन सारणेश्वर मेले के संपूर्ण आयोजन और प्रबंधन का विशेष अधिकार प्रदान किया था। इसके साथ ही एक दिन के लिए मंदिर का प्रबंध देवासी समाज को सौंपने की अनूठी प्रथा शुरू हुई, जो सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी पूरी निष्ठा से निभाई जा रही है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के चलते देवझूलनी एकादशी का यह मेला आज भी देवासी समाज के साहस, स्वाभिमान और बलिदान का प्रतीक माना जाता है।
राजमहल के पद्मनाभ मंदिर से निकलती है शाही रेवाड़ी
देवझूलनी एकादशी के पावन अवसर पर सदियों से चली आ रही यह राजसी रस्म पूरी भव्यता के साथ संपन्न की जाती है। वर्ष 1425 में सिरोही राज्य की स्थापना के समय राजमहल के समीप ही भव्य पद्मनाभ मंदिर का निर्माण कराया गया था। नियमानुसार इसी मंदिर से ठाकुरजी की सबसे पहली पालकी राजसी ठाठ-बाठ के साथ रवाना की जाती है। जैसे-जैसे यह शोभायात्रा शहर के मुख्य मार्गों से आगे बढ़ती है, विभिन्न मोहल्लों से स्थानीय पालकियां भी इसमें शामिल होती जाती हैं। इस शाही रेवाड़ी में सजे-धजे घोड़ों पर सवार घुड़सवार और कदमताल करते पैदल सैनिक शामिल होकर यात्रा को बेहद भव्य और ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान करते हैं। यह रेवाड़ी नगर के प्रमुख रास्तों से गुजरती हुई अंततः शहर के छोटे तालाब पर पहुंचती है।
तालाब पर ठाकुरजी का पावन स्नान और मेले का भव्य विस्तार
छोटे तालाब पर पहुंचने के बाद ठाकुरजी को पारंपरिक विधि-विधान से पावन स्नान कराया जाता है, जिसके साथ ही पालकी यात्रा का विधिवत समापन होता है। इस धार्मिक अनुष्ठान के पूर्ण होते ही सारणेश्वर महादेव में भव्य मेले का आयोजन आरंभ हो जाता है। अगले दिन तक इस मेले में देवासी समाज के हजारों श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं। सिरोही जिले के अतिरिक्त समूचे राजस्थान और पड़ोसी राज्य गुजरात से भी भारी संख्या में देवासी समाज के लोग यहां एकत्रित होते हैं और युद्ध में शौर्य दिखाने वाले अपने वीर पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें याद करते हैं। भगवान सारणेश्वर महादेव न केवल सिरोही राजपरिवार के कुलदेवता हैं, बल्कि सिरोही, जालोर और पाली जिलों के भी प्रमुख आराध्य देव माने जाते हैं। दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान के जन-जन में भगवान सारणेश्वर के प्रति अटूट आस्था है, जिसके चलते देवझूलनी एकादशी पर कई जिलों से लाखों श्रद्धालु महादेव के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचते हैं।























