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पाली के फुटपाथ पर सात दशकों से पारंपरिक कला सहेज रहीं बुजुर्ग हसकी देवीराजस्थान
25 सित॰ 2026, 1:03 pm (39 मिनट पहले)· 0

पाली के फुटपाथ पर सात दशकों से पारंपरिक कला सहेज रहीं बुजुर्ग हसकी देवी

राजस्थान के पाली में 85 वर्षीय हसकी देवी पिछले सत्तर वर्षों से मिट्टी के पारंपरिक खिलौने बेचकर अपनी प्राचीन संस्कृति को जिंदा रखने के संघर्ष में जुटी हैं.

राजस्थान के पाली शहर में आधुनिकता की चकाचौंध के बीच एक ऐसा कोना भी है, जहां गुजरे जमाने की यादें आज भी सजीव नजर आती हैं. प्रतापनगर स्थित लेबर कोर्ट के बाहर पगडंडी पर बैठी पचासी साल की हसकी देवी की दास्तान वक्त के थपेड़ों और अपनी मिट्टी से गहरे जुड़ाव का जीवंत उदाहरण है. चेहरे पर उम्र की लकीरें और हाथों में कपकपाहट होने के बावजूद वह रोज सुबह पूरी लगन के साथ मिट्टी की छोटी-छोटी कृतियां सजाकर बैठती हैं. जब इस इलाके के रास्ते कच्चे हुआ करते थे और शहरीकरण इतना हावी नहीं था, तब से वे इसी जगह पर अपनी छोटी सी दुकान लगाती आ रही हैं.

बदलते दौर में प्लास्टिक और स्क्रीन का दबदबा

एक वक्त था जब बच्चे मिट्टी की बनी गुल्लक, छोटे बर्तन, हाथी और घोड़ों को देखकर खुशी से मचल जाते थे और उन्हें खरीदने के लिए अपने माता-पिता के सामने मचलते थे. समय बीतने के साथ ही खेल और मनोरंजन के मायने पूरी तरह बदल चुके हैं. बाजार अब प्लास्टिक से बने उत्पादों से भर गया है और नई पीढ़ी का अधिकतर वक्त मोबाइल स्क्रीन या वीडियो गेम में बीतने लगा है. इसके चलते मिट्टी से बने खिलौनों की चमक लगभग खो चुकी है, मगर हसकी देवी अपनी इस प्राचीन धरोहर को बचाने के लिए अडिग खड़ी हैं.

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पारंपरिक शिल्प से अटूट लगाव

सत्तर साल के लंबे सफर में इस बुजुर्ग महिला ने वक्त को तेजी से बदलते देखा है. उनके मुताबिक अब इन पारंपरिक चीजों के कद्रदान बेहद कम रह गए हैं. हसकी देवी बताती हैं कि वे मिट्टी से गहरा प्यार करती हैं और अंतिम सांस तक अपनी विरासत की रक्षा करती रहेंगी. जिस उम्र में इंसान को पूरी तरह दूसरों के सहारे और आराम की जरूरत होती है, उस पड़ाव पर भी वे किसी से मदद की गुहार लगाने के बजाय अपने हुनर के दम पर डटी हुई हैं. उनके चेहरे पर लाचारी से ज्यादा इस बात की फिक्र दिखती है कि यह कला धीरे-धीरे हमेशा के लिए खत्म न हो जाए.

लुप्त होती विधा और नई पीढ़ी का रुख

हसकी देवी बताती हैं कि उनके पूर्वज पीढ़ियों से इसी माटी को गढ़कर खिलौने तैयार करते थे और वे खुद भी उसी सिलसिले को आगे बढ़ाती रहीं. उनका मानना है कि आने वाली पीढ़ी शायद इस कठिन और कम आमदनी वाले काम को बिल्कुल नहीं अपनाएगी. आजकल चारों तरफ प्लास्टिक की चीजें ही बिकती हैं और मिट्टी की बनी चीजें ढूंढने से भी मुश्किल से मिलती हैं. वे इस उम्मीद के साथ रोज अपनी दुकान खोलती हैं कि शायद कोई खरीदार इन पारंपरिक खिलौनों की कद्र समझेगा और इस शिल्प की लौ जलती रहेगी.

सवाल-जवाब

हसकी देवी कौन हैं और वे कहां बैठती हैं?
हसकी देवी 85 वर्षीय बुजुर्ग महिला हैं, जो राजस्थान के पाली में प्रतापनगर लेबर कोर्ट के बाहर फुटपाथ पर दुकान लगाती हैं.
हसकी देवी कितने समय से मिट्टी के खिलौने बेच रही हैं?
वे पिछले 70 सालों यानी सात दशकों से उसी स्थान पर मिट्टी के पारंपरिक खिलौने बेच रही हैं.
उनकी दुकान पर किस तरह के खिलौने मिलते हैं?
उनकी दुकान पर मिट्टी की नन्हीं गुल्लक, छोटे बर्तन तथा मिट्टी के बने हाथी और घोड़े मिलते हैं.
मिट्टी के खिलौनों की मांग कम क्यों हो गई है?
प्लास्टिक के सस्ते खिलौनों और बच्चों के वीडियो गेम व डिजिटल स्क्रीन की तरफ आकर्षित होने से इनकी मांग घट गई है.
क्या नई पीढ़ी इस शिल्प को आगे बढ़ा रही है?
हसकी देवी के अनुसार आने वाली पीढ़ियां इस पारंपरिक काम को आगे नहीं बढ़ाना चाहती हैं क्योंकि इसमें आमदनी नहीं बची है.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·20 मिनट पहले

उम्र के इस पड़ाव पर भी इनकी मेहनत कमाल की है, पर सिर्फ परंपरा बचाने से घर का खर्च कैसे चलता होगा?

Karan Malhotra@karan-malhotra·19 मिनट पहले

रोहन भाई, बात तो सही है आपकी। पर क्या स्थानीय प्रशासन या समाज के किसी वर्ग ने इनकी कभी कोई सुध ली या नहीं?

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