अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस से ठीक पहले राजस्थान से एक उत्साह बढ़ाने वाली खबर आई है। प्रदेश के पांच बाघ अभयारण्यों में बाघों की कुल संख्या अब 149 पर पहुंच गई है, जो पिछले साल दर्ज हुए आंकड़े से कहीं ज्यादा है। कभी जिन जंगलों से बाघ की दहाड़ लगभग गायब हो चली थी, वही जंगल अब राजस्थान को देश के अहम बाघ राज्यों की कतार में खड़ा कर रहे हैं। हालांकि यह कामयाबी अपने साथ नई मुश्किलें भी लेकर आई है, क्योंकि इतने बाघों के लिए जंगल में जगह अब कम पड़ने लगी है और आगे की रणनीति बनाना वन विभाग के लिए जरूरी हो गया है।
135 से 149 तक: कैसे बढ़ा आंकड़ा
रणथम्भौर, सरिस्का, धौलपुर-करौली, मुकुंदरा हिल्स और रामगढ़ विषधारी, इन पांचों अभयारण्यों को मिलाकर बाघ, बाघिन और शावकों की गिनती इस साल 149 दर्ज हुई है, जबकि पिछले साल यह संख्या 135 थी। मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के.सी. अरुण प्रसाद के अनुसार, इस साल इन पांचों अभयारण्यों में 54 बाघिनों ने कुल 53 शावकों को जन्म दिया। पिछले साल यानी 2025 में 52 बाघिनों से 43 शावक पैदा हुए थे। यानी बाघिनों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी के बावजूद शावकों के जन्म में अच्छी खासी बढ़त दर्ज हुई है, जो बताती है कि प्रजनन के हालात लगातार बेहतर हो रहे हैं। सबसे ज्यादा शावक इस बार सरिस्का बाघ अभयारण्य में जन्मे, यहां अकेले 28 शावकों ने जन्म लिया, जो जाहिर करता है कि सरिस्का अब प्रजनन के लिहाज से राजस्थान का सबसे सक्रिय अभयारण्य बन चुका है।
रणथम्भौर सबसे आगे, सरिस्का ने भी लगाई छलांग
प्रदेश के सभी अभयारण्यों में सबसे ज्यादा बाघ रणथम्भौर में ही हैं, यहां संख्या पिछले साल के 66 से बढ़कर अब 72 हो गई है। सरिस्का भी पीछे नहीं है, वहां बाघों की तादाद 50 से बढ़कर 56 पर पहुंच गई है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़ोतरी सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि इस बात का सबूत है कि राजस्थान के जंगलों में संरक्षण की कोशिशें असल में रंग ला रही हैं। बाघ जंगल की खाद्य श्रृंखला में सबसे ऊपर बैठा शिकारी होता है, इसलिए उसकी मौजूदगी और बढ़ती संख्या को जंगल के स्वस्थ होने की सबसे बड़ी निशानी माना जाता है। जिस जंगल में बाघों की तादाद बढ़ती है, वहां शिकार के लिए जरूरी शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या और घासभूमि की सेहत भी अपने आप बेहतर स्थिति में मानी जाती है।
जब सिर्फ 18 से 20 बाघ बचे थे
आज की तस्वीर देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल है कि करीब दो दशक पहले राजस्थान में बाघों का वजूद ही खतरे में आ गया था। उस दौर में प्रदेशभर में मुश्किल से 18 से 20 बाघ ही बचे रह गए थे, और आशंका यहां तक जताई जाने लगी थी कि आने वाले वर्षों में राजस्थान से बाघ पूरी तरह गायब हो सकते हैं। वहां से यहां तक का सफर राजस्थान को देश के प्रमुख बाघ आवासों में शामिल कर चुका है। मौजूदा समय में पांचों अभयारण्यों में वयस्क बाघ-बाघिनों की संख्या करीब 96 है, और शावकों को जोड़ने के बाद कुल आंकड़ा 149 तक पहुंचता है। अकेले रणथम्भौर में करीब 50 वयस्क बाघ-बाघिन और 22 शावक मौजूद हैं। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, बाघों के जन्म और उनके जीवित बचे रहने के लिहाज से रणथम्भौर देश के सबसे कामयाब बाघ अभयारण्यों में गिना जाता है। पर्यटकों के आने और बाघ देखने के मौके के लिहाज से भी यह बाकी अभयारण्यों से आगे निकल चुका है, जिसका सीधा फायदा आसपास के इलाके की पर्यटन अर्थव्यवस्था को भी मिलता है।
सूखा जंगल और भरपूर शिकार, रणथम्भौर की असली ताकत
रणथम्भौर करीब 1,500 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला है, लेकिन फिलहाल बाघ सक्रिय रूप से इसमें से करीब 700 वर्ग किलोमीटर हिस्से में ही घूमते हैं। रणथम्भौर के उपवन संरक्षक मानस सिंह के मुताबिक, यहां की सबसे बड़ी खूबी शिकार के लिए मौजूद प्रजातियों की भरमार है। सांभर, चीतल जैसे शाकाहारी वन्यजीव यहां बड़ी तादाद में मिलते हैं, और साथ ही विकसित घासभूमि बाघों के रहने लायक बेहतरीन माहौल तैयार करती है। यही वजह है कि रणथम्भौर में बाघों के जीवित रहने की दर करीब 80 प्रतिशत मानी जाती है, जो देश के तमाम बड़े बाघ अभयारण्यों में सबसे अच्छी दरों में गिनी जाती है। इसके अलावा रणथम्भौर का जंगल घना नहीं बल्कि शुष्क किस्म का है, जिसकी वजह से यहां बाघों को देख पाना घने जंगलों के मुकाबले काफी आसान रहता है। यही कारण है कि देशी हों या विदेशी, सैलानियों की पहली पसंद रणथम्भौर ही बना रहता है, और यही चीज इसे बाकी अभयारण्यों से अलग खड़ा करती है।
मछली की विरासत, जिसने कई जंगल फिर से बसाए
रणथम्भौर में बाघ संरक्षण की बात हो और मशहूर बाघिन मछली यानी टी-16 का जिक्र न आए, ऐसा मुमकिन नहीं। करीब दो दशक तक रणथम्भौर की सल्तनत पर राज करने वाली मछली ने अपने जीवनकाल में 18 शावकों को जन्म दिया था। उसकी संतानों ने आगे चलकर सरिस्का, मुकुंदरा हिल्स और रामगढ़ विषधारी जैसे अभयारण्यों को दोबारा बाघों से आबाद करने में बड़ी भूमिका निभाई। साल 2008 में सरिस्का से बाघ पूरी तरह गायब हो गए थे, जिसके बाद रणथम्भौर से बाघों को वहां भेजकर बसाया गया और सरिस्का में एक बार फिर बाघ लौट आए। यह पूरा घटनाक्रम आज भी वन्यजीव प्रबंधन में एक कामयाब पुनर्वास मॉडल के तौर पर देखा जाता है। मछली की याद में भारत सरकार ने साल 2013 में उस पर एक डाक टिकट भी जारी किया था। रणथम्भौर के जोगी महल में उसकी याद में एक स्मारक बना हुआ है, और वन विभाग ने उसके नाम पर 'मछली पुरस्कार' की शुरुआत भी की है, जो आज भी बाघ संरक्षण से जुड़े कामों को सम्मानित करने के लिए दिया जाता है।
अब जगह कम पड़ने लगी है
लेकिन बाघों की यही बढ़ती तादाद अब वन विभाग के लिए सिरदर्द भी बन रही है। रणथम्भौर में मौजूद जगह अब सीमित पड़ने लगी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यहां की आवास क्षमता महज 40 से 50 बाघों के लायक मानी जाती है, जबकि यहां बाघों की संख्या पहले ही 72 तक पहुंच चुकी है, यानी क्षमता से कहीं ज्यादा बाघ इस समय रणथम्भौर में मौजूद हैं। वन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि एक वयस्क नर बाघ को घूमने और शिकार के लिए 40 से 50 वर्ग किलोमीटर के इलाके की जरूरत होती है, जबकि एक बाघिन को करीब 20 वर्ग किलोमीटर इलाका चाहिए होता है। यही वजह है कि करीब तीन साल की उम्र पार करते ही जवान बाघ अपने लिए नया ठिकाना तलाशने की गरज से जंगल की सीमाओं से बाहर निकलने लगते हैं, जिससे इंसानी बस्तियों के आसपास बाघ के दिखने की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं।
मध्य प्रदेश तक जा पहुंचते हैं रणथम्भौर के बाघ
टाइगर वॉच से जुड़े वन्यजीव विशेषज्ञ धर्मेन्द्र खांडल के मुताबिक, नई जगह की तलाश में रणथम्भौर के बाघ कई बार मुकुंदरा हिल्स, रामगढ़ विषधारी, और कई मामलों में तो मध्य प्रदेश के जंगलों तक जा पहुंचते हैं। उनका कहना है कि बाकी बाघ अभयारण्यों में बसे गांवों का विस्थापन अब तक पूरी तरह नहीं हो सका है, और यही वजह है कि बाघों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित ठिकाना तैयार करने के लिए गांवों का सुनियोजित पुनर्वास और वन प्रबंधन में सुधार जरूरी हो गया है। खांडल के अनुसार रणथम्भौर के साथ-साथ कैलादेवी अभयारण्य को भी बाघों के लिहाज से अनुकूल बनाने पर तेजी से काम करने की जरूरत है, ताकि बढ़ती आबादी को संभालने के लिए वन विभाग के पास और जगह उपलब्ध हो सके और आने वाले सालों में यह सफलता कायम रह सके।



















