राजस्थान के नगर निकाय चुनाव में पार्षदों के फैसले आने के बाद अब स्थानीय शासन के शीर्ष पदों पर आसीन होने वाले चेहरों को लेकर चुनावी तस्वीर काफी तेजी से करवट ले रही है. राज्य के कई प्रमुख शहरों में बोर्ड बनाने के लिए प्रमुख राजनीतिक दल अपने-अपने खेमों को मजबूत करने, पार्षदों को एकजुट रखने और आवश्यक समर्थन हासिल करने की जद्दोजहद में जुटे हुए हैं. हालांकि, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह क्षेत्र भरतपुर और उससे सटे डीग जिले में बनी राजनीतिक परिस्थितियों ने प्रदेश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग परिदृश्य पेश किया है. यहां जोड़-तोड़ की लंबी प्रक्रिया के बजाय अधिकांश निकायों में शीर्ष पदों पर सर्वसम्मति अथवा नामांकन वापसी के जरिए निर्विरोध निर्वाचन का रास्ता साफ हो चुका है.
भरतपुर जिले के प्रशासनिक ढांचे में आने वाले कुल 6 नगर निकायों में से 5 निकायों के भीतर अध्यक्ष पद का चयन पूरी तरह से निर्विरोध संपन्न हो गया है. इनमें सबसे महत्वपूर्ण भरतपुर नगर निगम रहा, जहां मेयर के पद पर उम्मीदवार का चयन बिना किसी मतदान के पूरा हुआ. इसके समानांतर पड़ोसी जिले डीग के सभी नगर निकायों में भारतीय जनता पार्टी का बोर्ड स्थापित होने की स्थिति पूरी तरह तय हो चुकी है. नामांकन दाखिल करने और नाम वापस लेने के चरण में जिस तरह के समीकरण बने, उसने कई स्थानों पर चुनावी मुकाबले को पूरी तरह समाप्त कर दिया. अब सबकी निगाहें 21 सितंबर को होने वाली बोर्ड गठन की औपचारिक प्रक्रियाओं पर टिकी हुई हैं.
भरतपुर के छह में से पांच निकायों में तय हुआ निर्विरोध नेतृत्व
भरतपुर जिले में नगर निकाय चुनाव की मतगणना के तुरंत बाद अध्यक्ष और मेयर की कुर्सी को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर पहुंच गई थीं. 14 सितंबर को जब पार्षदों के परिणाम सामने आए, तब दोनों प्रमुख दल अपने-अपने बोर्ड गठित करने के लिए जादुई आंकड़े जुटाने की रणनीति तैयार कर रहे थे. इसके बावजूद नामांकन की जांच और नाम वापसी की अवधि के दौरान स्थानीय स्तर पर समीकरण इतनी तेजी से बदले कि कई निकायों में प्रतिद्वंद्विता की कोई गुंजाइश ही नहीं बची. जिले के 6 निकायों में से 5 निकायों में अध्यक्ष पद पर निर्विरोध निर्वाचन दर्ज किया गया.
मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र होने के कारण भरतपुर नगर निगम के मेयर चुनाव पर पूरे प्रदेश की राजनीतिक बिरादरी की गहरी नजरें टिकी हुई थीं. इस प्रतिष्ठित नगर निगम में मेयर का पद निर्विरोध तय होने से सत्ताधारी दल के लिए बोर्ड गठन की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक पड़ाव आसानी से पूरा हो गया. इसी प्रकार जिले के अन्य चार निकायों में भी अध्यक्ष पद पर किसी प्रतिद्वंद्वी के मैदान में न टिक पाने से स्थानीय स्तर पर होने वाली संभावित खींचतान पर पूरी तरह विराम लग गया.
डीग के सभी नगर निकायों में एकतरफा हुआ मुकाबला
भरतपुर से अलग होकर बने डीग जिले में भी चुनावी परिदृश्य पूरी तरह एकतरफा साबित हुआ. जिले के तमाम नगर निकायों में भारतीय जनता पार्टी का बोर्ड गठित होने का रास्ता पूरी तरह साफ हो चुका है. पार्षद चुनाव संपन्न होने के तुरंत बाद यह माना जा रहा था कि अध्यक्ष पद की कुर्सी के लिए दोनों खेमों में कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा, लेकिन नामांकन पत्रों की वापसी के बाद यह संभावित संघर्ष पूरी तरह खत्म हो गया.
डीग क्षेत्र के स्थानीय राजनीतिक समीकरणों और आपसी तालमेल ने इस पूरी चुनावी प्रक्रिया को निर्णायक मोड़ दिया. पार्षदों के परिणाम सार्वजनिक होते ही सभी गुट अपने पक्ष में बहुमत सिद्ध करने की रूपरेखा बना रहे थे. इसी बीच रणनीतिक कदमों के जरिए पार्षदों के समूह को एकजुट रखा गया और शीर्ष पद के लिए जरूरी समर्थन सुनिश्चित किया गया. नतीजतन, कई स्थानों पर नाम वापसी की अंतिम समय सीमा समाप्त होते ही चुनावी मैदान पूरी तरह खाली हो गया और मुकाबला एकतरफा बनकर रह गया.
होटलों की बाड़ेबंदी बनाम निर्विरोध आम सहमति
राजस्थान के अन्य संभागों और जिलों में इन दिनों पार्षदों को एकजुट रखने के लिए रिसॉर्ट और होटलों में ठहराने का चलन सबसे बड़ा सियासी मुद्दा बना हुआ है. कई जिलों में भारतीय जनता पार्टी के चुने हुए पार्षद सुरक्षित ठिकानों पर रखे गए हैं, तो कई क्षेत्रों में कांग्रेस अपने पार्षदों को बिखरने से बचाने के लिए निरंतर निगरानी कर रही है. इसके साथ ही कई निकायों में निर्दलीय पार्षदों का रुख सत्ता की चाबी अपने पास रखे हुए है, जिससे वहां पल-पल समीकरण बदल रहे हैं.
इसके ठीक उलट भरतपुर और डीग के परिदृश्य में यह पूरी उठापटक नदारद रही. यहां अध्यक्ष और मेयर पद पर निर्विरोध निर्वाचन का परिणाम यह निकला कि पार्षदों की बाड़ेबंदी करने और वोट हासिल करने के लिए किए जाने वाले शक्ति प्रदर्शन की आवश्यकता ही नहीं पड़ी. इसी विशिष्टता के कारण राजनीतिक विश्लेषक इस अंचल के परिणामों को राजस्थान की सामान्य चुनावी गहमागहमी से बिल्कुल अलग मानकर देख रहे हैं.
राज्य के 25 निकायों में बिना मतदान के हुआ फैसला
राजस्थान में इस समय नगर पालिका अध्यक्ष, नगर परिषद सभापति और नगर निगम मेयर के पदों को लेकर व्यापक स्तर पर कवायद चल रही है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अब तक समूचे प्रदेश के 25 निकायों में विभिन्न दलों के प्रत्याशी निर्विरोध रूप से चुन लिए गए हैं. इन कुल 25 निकायों में भरतपुर और डीग अंचल की हिस्सेदारी सबसे प्रमुख मानी जा रही है.
निर्विरोध निर्वाचन की संवैधानिक स्थिति तब बनती है जब नाम वापसी के बाद चुनाव मैदान में केवल एक ही वैध प्रत्याशी शेष रह जाता है. ऐसी दशा में निर्वाचन नियमों के तहत मतदान कराने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है और उस अकेले उम्मीदवार को विजयी घोषित कर दिया जाता है. हालांकि, जिन स्थानों पर दो या उससे अधिक प्रत्याशी मैदान में डटे हुए हैं, वहां पार्षदों का समर्थन हासिल करने के लिए अंतिम क्षणों तक राजनीतिक दांवपेच जारी हैं.
21 सितंबर को होगा शेष बोर्डों के गठन का फैसला
स्थानीय निकाय चुनाव में पार्षदों के परिणाम 14 सितंबर को घोषित होने के बाद अब अध्यक्ष पदों की संवैधानिक प्रक्रिया अपने अंतिम चरण की ओर अग्रसर है. प्रदेश के जिन निकायों में एक से अधिक प्रत्याशी चुनाव मैदान में टिके हुए हैं, वहां 21 सितंबर को मतदान के जरिए फैसला किया जाएगा. यह तारीख उन शहरों के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाली है जहां किसी भी दल को अपने दम पर स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है.
ऐसे त्रिशंकु निकायों में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका सबसे अहम रहने वाली है, क्योंकि उनकी निष्ठा ही नए बोर्ड का भविष्य तय करेगी. दूसरी तरफ, भरतपुर और डीग के अधिकांश निकायों ने निर्विरोध निर्वाचन के माध्यम से अपने स्थानीय सियासी समीकरणों को 21 सितंबर से पहले ही स्पष्ट कर दिया है. अब केवल औपचारिक घोषणाएं बाकी रह गई हैं, जबकि बाकी प्रदेश में 21 सितंबर को होने वाला मतदान ही तय करेगा कि सत्ता का ताज किसके सिर सजेगा.



















