राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के अंतर्गत आने वाले जहाजपुर कस्बे में स्थापित मुनि सुव्रतनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र स्वस्तिधाम अपनी असाधारण स्थापत्य शैली के कारण विशिष्ट पहचान रखता है। इस तीर्थ स्थल का पूरा ढांचा एक विशाल समुद्री जहाज के प्रतिरूप के रूप में तैयार किया गया है। मंदिर का मुख्य द्वार, हवादार खिड़कियां तथा बाहरी स्वरूप जलपोत जैसा आभास कराते हैं, जिसे निहारने और दर्शन करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
भूमि उत्खनन में मिली थीं दुर्लभ प्रतिमाएं
इस पावन स्थल की प्रसिद्धि के पीछे भूमि के गर्भ से ऐतिहासिक जिन प्रतिमाओं का प्रकट होना भी एक प्रमुख कारण है। इस क्षेत्र में मूर्तियों के मिलने की शुरुआत वर्ष 1984 से मानी जाती है। इसके पश्चात 23 अप्रैल 2013 को महावीर जयंती के पावन पर्व पर एक मकान के निर्माण हेतु नींव की खुदाई चल रही थी। उसी समय भूमि से 11 प्राचीन जिन प्रतिमाएं तथा पद्मासन मुद्रा में चार प्रतिमाएं सुरक्षित प्राप्त हुईं। इनमें तीर्थंकर मुनि सुव्रतनाथ की मुख्य प्रतिमा शामिल थी। श्रद्धालुओं में इस प्रतिमा के समय के साथ आभा और रंग बदलने को लेकर गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है।
पंचकल्याणक प्रतिष्ठा और तलवार वास्तुकला
स्वस्तिधाम परिसर में 31 जनवरी से 7 फरवरी 2020 की अवधि के दौरान आचार्य ज्ञानसागर सागर के पावन सानिध्य में भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ था। इस धार्मिक अनुष्ठान के संपन्न होने के उपरांत भगवान मुनि सुव्रतनाथ की प्रतिमा को गर्भगृह में पूर्ण विधि-विधान से प्रतिष्ठित किया गया। मंदिर की पहली मंजिल पर धवल संगमरमर के पत्थरों से निर्मित एक विशाल प्रार्थना कक्ष बनाया गया है। इस तल पर स्थित सहस्त्रकूट वेदी पर कुल 1008 जिन प्रतिमाएं विराजमान की गई हैं।
स्वर्ण सज्जा और शिखर तल की संरचना
मंदिर की दूसरी मंजिल पर स्वर्ण नक्काशी से अलंकृत मुख्य वेदी स्थापित की गई है, जहां मूलनायक के रूप में भगवान मुनि सुव्रतनाथ विराजमान हैं। मुख्य वेदी के दाईं तरफ प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की वेदी है, जबकि बाईं तरफ भगवान महावीर स्वामी की वेदी स्थित है। संरचना के सबसे ऊपरी तल पर जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों को समर्पित 24 स्वतंत्र वेदियां निर्मित की गई हैं। इसके अतिरिक्त मुख्य प्रवेश द्वार के बाहरी परिसर में एक सुविशाल मानस्तंभ भी स्थापित किया गया है।
जहाजपुर तक आवागमन के साधन
सड़क परिवहन के माध्यम से जहाजपुर कस्बा भीलवाड़ा, शाहपुरा, देवली तथा कोटा शहरों से भली-भांति जुड़ा हुआ है। जिला मुख्यालय भीलवाड़ा और कोटा शहर दोनों से ही जहाजपुर की दूरी लगभग 100 किलोमीटर पड़ती है। रेल मार्ग से यात्रा करने वाले श्रद्धालु भीलवाड़ा या कोटा रेलवे स्टेशन तक ट्रेन से पहुंच सकते हैं, जहां से नियमित बस सेवा अथवा निजी टैक्सी किराए पर लेकर सीधे मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।



















