राजस्थान के विभिन्न जिलों में रबी सीजन की बुवाई शुरू होने के साथ ही खेतों के लिए जरूरी रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर डीएपी और यूरिया के वितरण को लेकर सियासी और जमीनी स्तर पर तनातनी तेज हो गई है। कई ग्रामीण इलाकों और कस्बों में खाद बिक्री केंद्रों पर सुबह से ही किसानों की भारी भीड़ देखी जा रही है। जहां एक ओर काश्तकार समय पर खाद न मिलने और कथित रूप से पिछली खिड़की से आपूर्ति करने के आरोप लगा रहे हैं, वहीं राज्य प्रशासन और सत्ता पक्ष का स्पष्ट कहना है कि गोदामों में खाद की कोई कमी नहीं है। सरकारी तंत्र की ओर से आपूर्ति और निगरानी के कड़े बंदोबस्त किए जाने के दावों के बीच कई क्षेत्रों में खाद पाने की जद्दोजहद जारी है।
धौलपुर और बारां में किसानों का रोष, घंटों कतार में बीत रहा समय
धौलपुर जिले में प्राथमिक कृषि ऋण सोसायटियों और खुदरा दुकानों के बाहर किसान सुबह की पहली किरण फूटने से पहले ही पहुंचने लगे हैं। कई किसान सुबह पांच बजे से तो कई सुबह सात बजे से कतारों में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। कई किसानों को एक कट्टा हासिल करने के लिए लगातार दूसरे और तीसरे दिन भी केंद्रों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। रबी की बुवाई का समय सीमित होता है और अगर समय पर खेत में डीएपी नहीं पहुंचा तो पूरी फसल चक्र प्रभावित होने की आशंका रहती है।
इसी कतार में लगे राजू नाम के एक स्थानीय किसान ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए आरोप लगाया कि सहकारी समिति के मुख्य द्वार को बंद रखकर पिछले रास्ते से चहेतों को खाद के कट्टे बांटे जा रहे हैं। वहीं लीलाधर त्यागी नाम के किसान ने अपनी परेशानी साझा करते हुए बताया कि वे सुबह सात बजे से लाइन में लगे हुए हैं। किसानों का कहना है कि वे पहले कई घंटों तक सीधे खड़े रहते हैं, फिर थककर जमीन पर बैठ जाते हैं, लेकिन दोपहर बीत जाने के बाद भी उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता है। इन आरोपों पर स्वतंत्र रूप से कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगी है, मगर खाद केंद्रों पर उमड़ रही भीड़ किसानों की परेशानी को उजागर कर रही है। दूसरी तरफ बारां जिले में भी खाद की किल्लत से आक्रोशित किसानों ने सड़क पर उतरकर चक्काजाम किया और जल्द आपूर्ति की मांग उठाई।
कोटा से जयपुर के लिए नरेश मीणा का पैदल कूच और प्रशासनिक कवायद
उर्वरक संकट के इसी दौर में किसान नेता नरेश मीणा ने आंदोलन की राह पकड़ ली है। वे किसानों और अपने समर्थकों के साथ कोटा से राजधानी जयपुर की ओर कूच कर रहे हैं। इस यात्रा के दौरान उनके पैरों में छाले पड़ने की स्थिति भी बनी, जिसके बाद उन्हें कुछ दूरी ठेले पर बैठकर तय करते देखा गया। उनका यह अभियान मुख्य रूप से किसानों को पर्याप्त डीएपी खाद दिलाने और वितरण में पारदर्शिता लाने की मांग पर केंद्रित है।
इस कूच के दौरान टोंक की जिला कलेक्टर टीना डाबी और नरेश मीणा के बीच फोन पर हुई बातचीत का एक वीडियो भी सामने आया। इस संवाद में जिला कलेक्टर ने किसान नेता से काश्तकारों को समझाने और शांति बनाए रखने का आग्रह किया। उन्होंने आश्वस्त किया कि जिले में खाद का संकट नहीं है और वितरण व्यवस्था को तेजी से दुरुस्त कराया जाएगा। साथ ही यह बात भी रेखांकित की गई कि किसानों को डीएपी निर्धारित सरकारी दरों पर मिले और उसके साथ जबरन कोई गैर-जरूरी उत्पाद न थमाया जाए। इस प्रशासनिक चर्चा ने जमीनी आंदोलन और सरकारी दावों के बीच चल रहे गतिरोध को और स्पष्ट कर दिया।
कांग्रेस और बीजेपी के बीच सियासी आरोप-प्रत्यारोप
खाद के मुद्दे ने राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में भी तीखी बहस छेड़ दी है। विपक्षी दल कांग्रेस का आरोप है कि प्रदेश का अन्नदाता खाद की एक-एक बोरी के लिए सड़कों पर धक्के खा रहा है, लेकिन मौजूदा सरकार किसानों की इस बुनियादी जरूरत पर ध्यान देने के बजाय पंचायती राज चुनावों की राजनीतिक जोड़-तोड़ में मशगूल है। कांग्रेस नेता प्रताप खाचरियावास ने इस संबंध में सरकार के प्रबंधन पर सीधे सवाल खड़े करते हुए लापरवाही बरतने का आरोप लगाया।
इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए विपक्ष पर ही निशाना साधा है। सत्ता पक्ष का कहना है कि विपक्ष राजनीतिक लाभ हासिल करने के मकसद से खाद की बनावटी कमी का भ्रम फैला रहा है और कालाबाजारी को हवा दे रहा है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने मजबूती से पक्ष रखते हुए कहा कि राजस्थान में खाद का पर्याप्त भंडार मौजूद है और सरकार किसानों तक खाद पहुंचाने के लिए लगातार काम कर रही है। उन्होंने साफ किया कि आपूर्ति व्यवस्था को लेकर हर स्तर पर कदम उठाए जा रहे हैं ताकि किसानों को खेती के दौरान किसी भी कमी का सामना न करना पड़े।
गोदामों में मौजूद स्टॉक के सरकारी आंकड़े और अंतरराष्ट्रीय निर्भरता
राज्य सरकार ने वितरण और जमाखोरी की रोकथाम के लिए प्रशासनिक निगरानी को और सख्त कर दिया है। 6 अक्टूबर को आयोजित एक उच्च स्तरीय राज्यस्तरीय समीक्षा बैठक में अधिकारियों को सख्त हिदायत दी गई कि रबी सीजन में किसानों की आवश्यकता के अनुसार खाद उपलब्ध कराई जाए और किसी भी प्रकार की जमाखोरी या कालाबाजारी को कड़ाई से कुचला जाए।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में राज्य के भीतर विभिन्न खादों का बड़ा भंडार उपलब्ध है, जिसमें
- 3.73 लाख मीट्रिक टन यूरिया का स्टॉक मौजूद है।
- 1.04 लाख मीट्रिक टन डीएपी का स्टॉक उपलब्ध कराया गया है।
- 95 हजार मीट्रिक टन एनपीके खाद का भंडार दर्ज है।
- 2.09 लाख मीट्रिक टन एसएसपी का स्टॉक भी केंद्रों में उपलब्ध है।
इन आंकड़ों के बावजूद जमीनी स्तर पर कतारें लगने के पीछे मुख्य वजह मांग और स्थानीय आपूर्ति का तालमेल न बैठ पाना माना जा रहा है। रबी मौसम शुरू होते ही खेतों में डीएपी की मांग एकाएक कई गुना बढ़ जाती है। इसके अलावा भारत अपनी डीएपी और इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा वैश्विक बाजारों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले किसी भी उतार-चढ़ाव का सीधा असर स्थानीय आपूर्ति पर पड़ता है। हालांकि केंद्र सरकार के आंकड़ों में इस बार रबी से पूर्व डीएपी का राष्ट्रीय स्टॉक पिछले वर्ष की तुलना में अधिक दर्ज किया गया है, लेकिन राज्य से लेकर जिला और ग्राम स्तर तक वितरण की रफ्तार में अंतर आने से कई जगहों पर अचानक भीड़ जमा हो जाती है।
आधार कार्ड और टोकन प्रणाली से वितरण को पारदर्शी बनाने का प्रयास
कालाबाजारी पर लगाम कसने और बिक्री केंद्रों पर अव्यवस्था को रोकने के लिए कई जिलों में प्रशासन ने टोकन व्यवस्था लागू की है। इसके तहत किसानों को उनके आधार कार्ड के सत्यापन के आधार पर ही खाद के कट्टे दिए जा रहे हैं। कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में एक किसान को अधिकतम एक से तीन कट्टे ही दिए जाने की सीमा तय की गई है। इस नियंत्रित व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपलब्ध स्टॉक का लाभ अधिक से अधिक जरूरतमंद किसानों तक पहुंचे और कोई भी बिचौलिया या बड़ा खरीदार जरूरत से ज्यादा स्टॉक उठाकर उसे अवैध रूप से न बेच सके।























