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राजस्थान निकाय चुनाव: भाजपा और कांग्रेस में टिकट के लिए महाभारत, जयपुर से अजमेर तक हंगामा और बगावतराजस्थान
30 अग॰ 2026, 9:45 am (54 मिनट पहले)· 2

राजस्थान निकाय चुनाव: भाजपा और कांग्रेस में टिकट के लिए महाभारत, जयपुर से अजमेर तक हंगामा और बगावत

राजस्थान नगर निकाय चुनाव 2026 के टिकट बंटवारे को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों में घमासान मच गया है। जयपुर की बैठकों और कांग्रेस वार रूम में नेताओं के बीच तीखी झड़पें और विवाद सामने आए हैं, जिससे दोनों पार्टियों के नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

राजस्थान में वर्ष 2026 के नगर निकाय चुनाव के लिए टिकट तय करने की प्रक्रिया जैसे-जैसे अंतिम चरण में पहुंच रही है, राजनीतिक दलों के भीतर सुलग रहा असंतोष अब पूरी तरह सतह पर आ चुका है। राज्य के दोनों सबसे बड़े दल यानी भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी में उम्मीदवारी को लेकर मची खींचतान किसी महासंग्राम से कम नहीं नजर आ रही है। राजधानी जयपुर में दोनों ही दलों की बैठकों के दौरान जो नजारा देखने को मिला, उसने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी हैरान कर दिया है। वार्ड स्तर पर अपने चहेतों को टिकट दिलाने की होड़ में नेताओं के बीच मर्यादाएं तार-तार होती दिखी हैं, जिससे चुनावी रण में उतरने से पहले ही आंतरिक कलह जगजाहिर हो गई है।

भाजपा की बैठक में चप्पल और दुपट्टे का विवाद

भारतीय जनता पार्टी के भीतर भरतपुर संभाग के नगर निकाय चुनाव के लिए प्रत्याशियों के नामों पर मंथन करने के लिए जयपुर में चुनाव प्रभारी अशोक परनामी के आवास पर एक अहम बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक में भरतपुर संभाग के विभिन्न निकायों के वार्डों से ताल्लुक रखने वाले संभावित उम्मीदवारों के नामों पर गहराई से विचार किया जा रहा था। इसी दौरान टिकटों के आवंटन को लेकर नेताओं के बीच आपसी मतभेद इस कदर बढ़े कि बात हाथापाई और अपमानजनक स्थिति तक पहुंच गई। मामले ने उस वक्त तूल पकड़ लिया जब पूर्व विधायक राजकुमारी जाटव और भाजपा जिलाध्यक्ष गोविंद सिंह जादौन के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि राजकुमारी जाटव की ओर से चप्पल दिखाने की बात सामने आई, तो वहीं दूसरी ओर जिलाध्यक्ष गोविंद सिंह जादौन द्वारा अपने दुपट्टे से अपनी ही गर्दन कसने की बात भी सामने आई। मौके पर मौजूद अन्य पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने तुरंत बीच-बचाव किया और दोनों को अलग कर किसी तरह हालात को काबू में किया। इस बैठक में केवल टिकटों का मुद्दा ही नहीं, बल्कि संगठन के पुराने और दबे हुए विवाद भी खुलकर सामने आ गए, जिससे स्थानीय स्तर पर प्रबंधन की कलई खुल गई। कई वार्डों में एक से अधिक मजबूत दावेदार होने के कारण पार्टी के लिए किसी एक नाम पर मुहर लगाना बेहद पेचीदा साबित हो रहा है, और कुछ नेता पुराने कार्यकर्ताओं तथा स्थानीय समीकरणों को सबसे ऊपर रखने की मांग कर रहे हैं।

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जयपुर के विभिन्न क्षेत्रों में टिकट के लिए घेराबंदी

भाजपा की टिकट चयन प्रक्रिया के दौरान केवल संभाग स्तर पर ही नहीं, बल्कि जयपुर शहर के अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में भी संभावित प्रत्याशियों के नाम पर भारी असहमति और खींचतान देखने को मिली है। सिविल लाइंस विधानसभा क्षेत्र में पर्यवेक्षक की तरफ से आलाकमान को तीन नाम भेजे जाने को लेकर कड़ा विवाद खड़ा हो गया। इसी तरह मालवीय नगर क्षेत्र में किसी विधायक से जुड़े करीबी व्यक्ति का नाम चर्चा में आने पर भी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गईं। विद्याधर नगर इलाके में तो स्थिति यह हो गई कि अकेले एक ही वार्ड के लिए चार अलग-अलग नाम सामने आ गए, जिससे पार्टी के चुनाव प्रबंधकों के सामने चयन का पेच बुरी तरह फंस गया है। टिकट के तमाम दावेदार अपने समर्थन में संगठन के बड़े और वरिष्ठ नेताओं की परिक्रमा करने में जुटे हैं और अपनी दावेदारी पुख्ता बता रहे हैं। पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे और योग्य उम्मीदवारों के चयन की है जिनकी स्थानीय जनता के बीच गहरी पकड़ हो ताकि मतदान के बाद बगावत की स्थिति से बचा जा सके।

कांग्रेस के वार रूम में नेताओं की आमने-सामने भिड़ंत

सत्तारूढ़ दल में मची कलह के बाद अब मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के खेमे में भी टिकट वितरण को लेकर आंतरिक घमासान खुलकर सामने आ चुका है। जयपुर स्थित कांग्रेस के वार रूम में अजमेर संभाग की विभिन्न सीटों के लिए संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मंथन चल रहा था, तभी माहौल अचानक गर्मा गया। बैठक के दौरान पूर्व मंत्री रामलाल जाट और धीरज गुर्जर के बीच किसी बात को लेकर तीखी बहस छिड़ गई जो देखते ही देखते गाली-गलौज तक जा पहुंची। इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के दौरान दोनों नेताओं के समर्थक भी आमने-सामने आ गए और स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर होती दिखी। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और वहां मौजूद अन्य कार्यकर्ताओं ने तुरंत बीच-बचाव किया और किसी तरह माहौल को शांत कराने का प्रयास किया। सूत्रों के अनुसार इस गर्मागर्म बहस और अपमानजनक स्थिति के तुरंत बाद रामलाल जाट बैठक को बीच में ही छोड़कर बाहर निकल गए। यह पूरी माथापच्ची उस वक्त हुई जब कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली खुद वहीं मौजूद थे, जिसके चलते पार्टी के लिए यह स्थिति बेहद असहज करने वाली बन गई है।

अजमेर में कार्यकर्ताओं की नाराजगी और बगावत की चेतावनी

राजधानी जयपुर से बाहर अजमेर जिले में भी टिकट बंटवारे से ठीक पहले कांग्रेस के भीतर भयंकर असंतोष और बगावत के स्वर तेज हो गए हैं। संभावित उम्मीदवारों के नामों की सुगबुगाहट के बीच स्थानीय कार्यकर्ताओं और टिकट के दावेदार ने अभी से खुला विरोध जताना शुरू कर दिया है। स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि यदि उनकी पसंद के व्यक्ति को टिकट नहीं मिला, तो बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने और सड़कों पर टायर जलाने तक की चेतावनी तक दे डाली गई है। पार्टी संगठन के सामने इस समय सबसे बड़ा सिरदर्द उन विवादित वार्डों पर आम सहमति बनाना है जहां एक से बढ़कर एक कई मजबूत दावेदार ताल ठोक रहे हैं। यदि किसी एक को भी टिकट थमाया गया, तो बाकी के नाराज दावेदारों और उनके समर्थकों के बगावती तेवर अपनाने की पूरी आशंका बनी हुई है। चूंकि निकाय चुनावों में स्थानीय नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका सबसे अहम होती है, इसलिए टिकट फाइनल होने के बाद पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार की बगावत को रोकना दोनों ही दलों के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन गया है।

अंतिम दौर में पहुंचा टिकटों का पेंच और भविष्य की चुनौती

भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दल अब अपने प्रत्याशियों की सूचियों को अंतिम रूप देने के बेहद निर्णायक दौर में पहुंच चुके हैं। अलग-अलग संभागवार बैठकों का दौर लगातार जारी है और संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मंथन किया जा रहा है, लेकिन عین वक्त पर सामने आ रहे इन विरोध के स्वरों ने पार्टी आकाओं की नींद उड़ा दी है। आम चुनावों या विधानसभा चुनावों की तुलना में स्थानीय नगर निकाय चुनावों में जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे ज्यादा प्रभावी साबित होते हैं। वार्ड स्तर पर उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, सामाजिक ताना-बाना और स्थानीय कार्यकर्ताओं का अटूट समर्थन ही सीधे तौर पर चुनाव के परिणामों को तय करता है, और यही कारण है कि टिकट के लिए नेताओं में इतनी गलाकाट प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। अब राजनीतिक पंडितों और आम जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दोनों दल इन उलझे हुए और विवादित वार्डों पर किस प्रकार समझौता कराते हैं और किन चेहरों को मैदान में उतारते हैं। आधिकारिक घोषणा के बाद असंतुष्ट नेताओं का अगला कदम क्या होगा, यह भी चुनाव के नतीजों को तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगा, क्योंकि यदि बागी नेता निर्दलीय ताल ठोकते हैं या भीतरघात करते हैं, तो पार्टी का चुनावी गणित पूरी तरह बिगड़ सकता है।

सवाल-जवाब

राजस्थान में नगर निकाय चुनाव किस वर्ष के लिए आयोजित हो रहे हैं?
राजस्थान में नगर निकाय चुनाव 2026 के लिए उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया चल रही है।
भाजपा की बैठक में किन नेताओं के बीच विवाद हुआ?
भाजपा की बैठक के दौरान पूर्व विधायक राजकुमारी जाटव और जिलाध्यक्ष गोविंद सिंह जादौन के बीच विवाद हुआ।
कांग्रेस की बैठक में किस बात को लेकर झड़प हुई?
कांग्रेस के वार रूम में अजमेर संभाग के टिकटों पर चर्चा के दौरान पूर्व मंत्री रामलाल जाट और धीरज गुर्जर के बीच तीखी बहस हुई।
कांग्रेस की बैठक में कौन से वरिष्ठ नेता मौजूद थे?
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली की मौजूदगी में टिकटों पर चर्चा हो रही थी।
अजमेर में कार्यकर्ताओं ने क्या चेतावनी दी है?
अजमेर में टिकट नहीं मिलने पर कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन करने और टायर जलाने की चेतावनी दी है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·अभी

यह आंतरिक कलह चुनावी मैदान में उतरने से पहले प्रशासनिक और सार्वजनिक सुरक्षा दोनों के लिए खतरे की घंटी है। जब दल के भीतर ही अनुशासनहीनता और हिंसक झड़पें होने लगें, तो यह स्पष्ट संकेत है कि स्थानीय कानून-व्यवस्था और मतदान के दौरान बूथ प्रबंधन पर इसका सीधा नकारात्मक असर पड़ेगा। आने वाले दिनों में यह बगावत अन्य जिलों में भी फैल सकती है, जिससे पुलिस और प्रशासन को सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने होंगे।

Rohan Verma@rohan-verma·अभी

यह स्पष्ट है कि टिकट वितरण में मची यह भगदड़ न केवल राजनीतिक दलों के भीतर समन्वय की कमी को दर्शाती है, बल्कि आने वाले चुनाव प्रचार और मतदान के दौरान बूथ स्तर पर भारी विरोध का कारण बनेगी। जब प्रमुख नेताओं के बीच सरेआम हाथापाई और अनुशासनहीनता सामने आती है, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है और इसका सीधा लाभ विरोधियों को मिलता है। उत्तर प्रदेश और अन्य चुनावी राज्यों के अनुभवों से साफ है कि यदि शीर्ष नेतृत्व ने समय रहते इस असंतोष को नहीं कुचला, तो यह बगावत पार्टी के भीतर स्वतंत्र उम्मीदवारों के रूप में चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बिगाड़ देगी।

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