गुजरात के ऐतिहासिक शहर भरूच में स्थित चौदहवीं शताब्दी की जामी मस्जिद की धार्मिक पहचान को लेकर कानूनी और सामाजिक बहस तेज हो चुकी है। यह मामला राज्य की शीर्ष अदालत के समक्ष विचाराधीन है, जहां याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि इस ऐतिहासिक ढांचे के निचले तल में जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ की मूर्ति मौजूद है। इस आधार पर अदालत से आग्रह किया गया है कि समूचे परिसर को जैन और हिंदू तीर्थ स्थल के तौर पर मान्यता दी जाए। साथ ही याचिका में स्थल का नामकरण अश्वबोध तीर्थ और शकुनिका विहार करने के अलावा जैन धर्मावलंबियों को नियमित उपासना करने की अनुमति मांगी गई है। इस पर संज्ञान लेते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने छब्बीस अक्टूबर को केंद्र और राज्य सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई, भरूच के जिला कलेक्टर और मस्जिद प्रबंधन को नोटिस जारी करके दो नवंबर तक अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया था।
अदालत के भीतर पक्षों का क्या रहा रुख
गुजरात हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के विधिक प्रतिनिधियों ने जोर देकर कहा कि इमारत के भीतर मौजूद धार्मिक प्रतीकों, मूर्तियों और पुरातात्विक महत्व के चिह्नों की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि एएसआई को इन प्राचीन धरोहरों के संरक्षण का स्पष्ट निर्देश दिया जाए और समुदाय को वहां धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करने की छूट मिले। सुनवाई के समय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने ढांचे के अंदर प्रतिमा के विद्यमान होने के तथ्य को नकारा नहीं। वहीं राज्य सरकार के वकील ने भी प्रतिमा की हिफाजत पर विशेष बल दिया। सरकारी पक्ष का कहना था कि इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षक होने के नाते वहां मौजूद प्राचीन धरोहर को अक्षुण्ण रखना अनिवार्य है, जिसके लिए वर्तमान स्थिति यानी यथास्थिति बनाए रखने की आवश्यकता है। इसके विपरीत मस्जिद ट्रस्ट का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ताओं ने दलील रखी कि करीब एक सौ बाईस वर्षों से यह स्थल मस्जिद के तौर पर अभिलेखों में दर्ज है और लंबे समय से पुरातत्व विभाग के संरक्षण में सुचारू रूप से संचालित हो रहा है।
विवाद का घटनाक्रम और सामाजिक गतिविधियां
इस ऐतिहासिक ढांचे से जुड़ा तनाव वर्ष 2026 में उस वक्त अधिक गहराया जब राष्ट्रीय धरोहर संरक्षण समिति नामक संगठन ने इस इमारत के प्राचीन स्वरूप को लेकर जनजागरण अभियान शुरू किया। मई के महीने से संगठन ने हस्ताक्षर जुटाने और विभिन्न सार्वजनिक आयोजनों के माध्यम से परिसर को जैन धार्मिक धरोहर घोषित कराने के प्रयास तेज कर दिए। जून आते-आते यह गतिविधि स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा तंत्र की प्राथमिक चिंताओं में शामिल हो गई। वडोदरा सर्किल के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कार्यालय ने दस जून को भरूच के जिला कलेक्टर को औपचारिक पत्र प्रेषित कर चेतावनी दी कि इंटरनेट मीडिया पर भारी संख्या में लोगों को इस इमारत के पास एकत्रित करने की अपील की जा रही है। पुरातत्व विभाग ने आगाह किया कि इस तरह के जमावड़े से राष्ट्रीय महत्व के स्मारक को क्षति पहुंच सकती है और इलाके में कानून-व्यवस्था व सामाजिक सौहार्द बिगड़ने का अंदेशा बन सकता है।
प्रशासनिक कदम और दोनों पक्षों के आरोप
पुरातत्व विभाग ने जिला प्रशासन को लिखे अपने पत्र में स्पष्ट किया था कि छब्बीस मई 1909 की गजट अधिसूचना के तहत जामी मस्जिद एक संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक घोषित है। इसी वैधानिक प्रावधान के तहत केंद्रीय एजेंसी ने स्थानीय अधिकारियों से तत्काल सुरक्षात्मक और निवारक कदम उठाने की अपील की थी। दूसरी ओर मस्जिद का प्रबंधन संभालने वाले ट्रस्ट ने भी पुलिस और प्रशासनिक अमले से संपर्क साधकर सुरक्षा की गुहार लगाई थी। ट्रस्ट ने गंभीर आरोप लगाया कि तीन मार्च को कुछ बाहरी लोग अनधिकृत रूप से मस्जिद परिसर के भीतर दाखिल हुए और उन्होंने वहां दीपक जलाने तथा पुष्प अर्पित करने जैसी धार्मिक रस्में निभाईं। प्रबंधन का यह भी आरोप था कि उस दौरान मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों ने उस समूह को भीतर जाने से नहीं रोका, जिससे वहां तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई।
संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक के रूप में एएसआई का दायित्व
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण देश की प्राचीन इमारतों, स्थापत्य कला और ऐतिहासिक स्थलों की भौतिक बनावट को बिना किसी फेरबदल के सुरक्षित रखने के लिए उत्तरदायी है। वर्ष 1909 के राजपत्र के जरिए भरूच की जामी मस्जिद को संरक्षित श्रेणी में रखे जाने के कारण इसकी मूल वास्तुकला में कोई भी बदलाव करना प्रतिबंधित है। इस कानूनी विवाद में पुरातत्व एजेंसी की भूमिका बेहद अहम बन गई है क्योंकि एक पक्ष इमारत के भीतर मिले प्रतीकों और प्रतिमा के आधार पर इसकी ऐतिहासिक पहचान की नए सिरे से व्याख्या और संरक्षण की मांग कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सौ साल से अधिक पुरानी प्रशासनिक स्थिति और मौजूदा संरक्षण व्यवस्था को बनाए रखने पर अडिग है। उच्च न्यायालय द्वारा सभी पक्षों से मांगे गए जवाब के बाद अब इस मामले की कानूनी दिशा तय होगी।




















